भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ४३ भी शब्द के द्वारा बोध लोकव्यवहार में देखा जाता है, अतः बौद्ध शब्द का बौद्ध अर्थ के साथ सम्बन्ध नित्य है । मूलम्—अथवा द्रव्य एव पदार्थ एष विग्रहो न्याय्यः—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति । द्रव्यं हि नित्यमाकृतिरनित्या । कथं ज्ञायते ? एवं हि दृश्यते लोके मृत्कयाचिदाकृत्या युक्ता पिण्डो भवति, पिण्डाकृतिमुप- मृद्य घटिकाः क्रियन्ते, घटिकाकृतिमपमृद्य कुण्डिकाः क्रियन्ते । तथा सुवर्णं कयाचिदा- कृत्या युक्तं पिण्डो भवति, पिण्डाकृतिमपमृद्य रुचकाः क्रियन्ते, रुचकाकृतिमपमृद्य कटकाः क्रियन्ते । कटकाकृतिमपमृद्य स्वस्तिकाः क्रियन्ते । पुनरावृत्तः सुवर्णपिण्डः पुनरपरयाकृत्या युक्तः खदिराङ्गारसवर्णे कुण्डले भवतः । आकृतिरन्या चान्या च भवति, द्रव्यं पुनस्तदेव । आकृत्युपमर्देन द्रव्यमेवावशिष्यते । प्रदीपः — द्रव्यं हि नित्यमिति । असत्योपाध्यवच्छिन्नं ब्रह्मतत्त्वं द्रव्यशब्द- वाच्यमित्यर्थः । आकृतिरिति । संस्थानम् । ब्रह्मदर्शने च गोत्वादिजातेरप्यसत्यत्वाद- नित्यत्वम्, “आत्मैवेदं सर्वम्” इति श्रुतिवचनात् । अनुवाद — अथवा द्रव्य को ही पदार्थ मानकर यह विग्रह (करना) न्याय्य है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के नित्य होने पर । क्योंकि द्रव्य नित्य है, आकृति अनित्य । (यह) कैसे जाना जाता है ? क्योंकि ऐसा लोक में देखा जाता है कि मिट्टी किसी आकृति से युक्त पिण्ड होती है, पिण्ड की आकृति को मिटाकर घड़ियां बनाई जाती हैं, घड़ियों की आकृति को मिटाकर कुण्डिकायें बनाई जाती हैं । उसी प्रकार सुवर्ण किसी आकृति से युक्त पिण्ड होता है, पिण्ड की आकृति को मिटाकर रुचक (आभूषण विशेष) बनाये जाते हैं, रुचक की आकृति को मिटाकर कटक (कड़े) बनाये जाते हैं । कड़ों की आकृति को मिटाकर स्वस्तिक बनाये जाते हैं । फिर लौटकर सुवर्णपिण्ड बना हुआ सोना फिर दूसरी आकृति से युक्त हुआ खदिराङ्गार के समान दो कुण्डल हो जाते हैं । आकृति और-और होती जाती है । (बदलती रहती है), द्रव्य फिर भी वही है । आकृति के नाश होने पर द्रव्य ही शेष रह जाता है । उषा—शब्द के द्वारा यदि द्रव्यरूप अर्थ को भी वाच्य माना जाये तो भी शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध तीनों की नित्यता सिद्ध की जा सकती है, अर्थात् द्रव्य रूप में भी अर्थ नित्य हो सकता है । द्रव्य की नित्यता और आकृति की अनित्यता को सिद्ध करने के लिए पतञ्जलि ने एक दृष्टान्त प्रस्तुत किया है कि मिट्टी किसी एक आकृति से युक्त होकर पिण्ड बन जाती है, उसे ही तोड़कर फिर घटिका, कुण्डिका आदि विभिन्न आकृति रूपों में परिणत किया जा सकता है । सुवर्णपिण्ड को भी पुनः पुनः तोड़कर रुचक, कटक, कुण्डल आदि विभिन्न आकृति