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व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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३२ महाभाष्यम् प्रतिपत्ति में (उनका) प्रतिपद पाठ करना चाहिए । गौ, अश्व, पुरुष, हस्ती, शकुनि, मृग, ब्राह्मण इत्यादि प्रकार के शब्दों का पृथक्-पृथक् पाठ होना चाहिए ? (पाणिनि ने) ऐसा नहीं कहा। शब्दप्रतिपादन के लिए प्रतिपदपाठ कोई उपाय नहीं है । ऐसा सुना जाता है कि—“बृहस्पति ने इन्द्र के लिए सहस्र दिव्य वर्षों तक प्रतिपद शब्दों का पारायण किया, (फिर भी) समाप्त नहीं हो पाया ।” बृहस्पति प्रवक्ता और इन्द्र अध्येता । सहस्र दिव्य वर्ष अध्ययन काल । फिर भी समाप्त नहीं हो पाया, फिर आजकल (तो बात ही) क्या । जो बहुत जीता है, सौ साल तक जी लेता है । चार प्रकार से विद्या का उपयोग होता है— अध्ययन काल, स्वाध्याय काल, अध्यापन काल और (अधीत विद्या का) यज्ञ आदि व्यवहार में विनियोग । वहाँ अध्ययन काल में ही सारी आयु समाप्त हो जायेगी । इसलिए शब्दों के प्रतिपादन में (उनका) प्रतिपद पाठ कोई उपाय नहीं है । तो फिर इन शब्दों का प्रतिपादन कैसे होना चाहिए ? कुछ सामान्य और विशेष (नियमों) वाला लक्षण शास्त्र बनाना चाहिए जिससे अल्प प्रयत्न से महान् शब्दराशि का प्रतिपादन हो सके । फिर वह क्या (हो) ? उत्सर्ग और अपवाद । कोई उत्सर्ग नियम किया जायेगा, कोई अपवाद नियम । किस प्रकार का उत्सर्ग और किस प्रकार का अपवाद करना चाहिए । सामान्य रूप से उत्सर्ग (का कथन) करना चाहिए, जैसे “कर्मण्यण्”। उसका विशेष नियम अपवाद, जैसे—“आतोऽनुपसर्गे कः ।” उषा—सप्तद्वीपा वसुमती, तीन लोक, षडङ्ग तथा रहस्य सहित चार वेद, उनकी विभिन्न शाखायें, स्मृति साहित्य, इतिहास, पुराण, वैद्यक इस महान् शब्द प्रयोग के विषयभूत लोक में अनन्त शब्दों का प्रयोग होता है । उन समस्त साधु शब्दों का भी प्रतिपद व्याख्यान सम्भव नहीं है । अतः शब्दानुशासन करने के लिए गौ, अश्व, पुरुष, हस्ती, शकुनि, मृग, ब्राह्मण इत्यादि रूप में प्रतिपद शब्दों का पाठ करके उनका व्याख्यान करना लघु, ऋत एव स्वीकार्य उपाय नहीं हो सकता । इस सन्दर्भ में महाभाष्यकार ने एक ऐतिहासिक आख्यान प्रस्तुत किया है कि सुरगुरु बृहस्पति सुरेश्वर इन्द्र को एक सहस्र दिव्य वर्षों तक इसी पद्धति से शब्दोपदेश करते रहे, परन्तु शब्दपारायण समाप्त नहीं हो पाया। आज के युग में तो सौ वर्ष से अधिक आयु की सम्भावना ही नहीं की जा सकती। इस पर भी आगम, स्वाध्याय, प्रवचन और व्यवहार रूप में चार प्रकार से विद्या का उपयोग इस पद्धति की प्रासङ्गिकता पर और भी प्रश्न चिह्न लगा देता है । “शब्दानां शब्दपारायणम्” के रूप में भासमान पुनरुक्ति का वारण करने के लिए यहाँ कैयट ने “शब्दपारायण” को योगरूढ अर्थ में ग्रन्थविशेष का वाचक