व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३३ माना है। वस्तुतः यह स्वतन्त्र ग्रन्थ का वाचक शब्द है अथवा वैदिक शैली का प्रभावमात्र, यह सन्देहास्पद है । विद्या की प्राप्ति का समय आगम-काल, अभ्यास स्वाध्याय-काल, अध्यापन प्रवचन-काल तथा उसका याज्ञिक क्रियाओं में उपयोग व्यवहार-काल है। नागेश के अनुसार 'आगमकालेन' इत्यादि शब्दों में विद्योपयोग के आधारभूत कालों में करणत्व की विवक्षा से तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है, अर्थात् चार कालों में विद्या का उपयोग होता है। आगम और स्वाध्याय काल में इसका उपयोग आदर पूर्वक अन्नवस्त्रादि लाभरूप है, प्रवचन-काल में इसका उपयोग प्रतिष्ठा, अर्थप्राप्ति आदि तथा याज्ञिक व्यवहार के समय इसका उपयोग दक्षिणादि-लाभ में पर्यवसित होता है। 'नैषधीयचरितम्' महाकाव्य के प्रणेता श्रीहर्ष ने भी विद्या की इन चार दशाओं का उल्लेख किया है, परन्तु वहाँ इसका क्रम महाभाष्य के क्रम से किञ्चित् परिवर्तित है। वहाँ अध्ययन तथा स्वाध्याय के अनन्तर पहले व्यवहार तथा उसके अनन्तर प्रवचन-काल का उल्लेख है— अधीतिबोधाचरणप्रचारणै- र्दशाश्चतस्रः प्रणयन्नुपाधिभिः । नैषध० १।४. परन्तु आज के युग में कहा जा सकता है कि सर्वप्रथम अध्ययन काल तथा उसके अनन्तर प्रवचन और व्यवहार काल को युगपत् लिया जा सकता है। स्वाध्याय-काल तो विद्याध्ययन के समय भी तथा उससे भी अधिक अध्यापनकाल में भी आवश्यक है। प्रतिपद पाठ रूप उपाय के शब्दानुशासन में अनभ्युपायभूत सिद्ध हो जाने पर 'सामान्यवत् लक्षण' को इसके उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अल्प यत्न से ही महान् शब्द राशि का प्रतिपादक होने के कारण लघु उपाय है। उत्सर्ग और अपवाद रूप सूत्रों का निर्माण करके विस्तृत शब्दराशि को अनुशिष्ट किया जा सकता है। सामान्य नियम उत्सर्ग कहलाता है, विशेष नियम अपवाद । यथा 'कर्मण्यण्' सूत्र कर्म कारक उपपद होने पर धातु मात्र से अण् प्रत्यय का विधान करता है, किन्तु उसका विशेष अपवाद सूत्र "आतोऽनुपसर्गे कः" कर्मकारक के उपपद होने पर उपसर्ग रहित आकारान्त धातुओं से 'क' प्रत्यय का उपदेश करता है। मूलम्—किं पुनराकृतिः पदार्थः आहो स्विद् द्रव्यम् ? उभयमित्याह । कथं ज्ञायते ?