भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) २६ अनुवाद—(व्याकरण का विषयभूत) शब्द कह दिया गया है। (शब्द का) स्वरूप भी कहा गया है। (प्रसङ्गानुसार) प्रयोजन भी बताये गये हैं। अब शब्दा- नुशासन करना चाहिए। तो वह कैसे करना चाहिए। क्या (साधु) शब्दों का उपदेश करना चाहिए अथवा अपशब्दों का उपदेश अथवा दोनों का उपदेश (करना चाहिए)। किसी एक के उपदेश से काम हो सकता है। जैसे कि भक्ष्य (पदार्थों) का नियम करने से अभक्ष्य का प्रतिषेध समझा जाता है। 'पाँच पञ्चनख प्राणियों का भक्षण करना चाहिए, ऐसा कहने पर समझा जाता है कि इसके अतिरिक्त अभक्ष्य हैं। इसी प्रकार अभक्ष्य के प्रतिषेध से भक्ष्य पदार्थों का नियम (किया जाता है)। जैसे 'ग्राम्य-कुक्कुट अभक्ष्य है,' 'ग्राम्य शूकर अभक्ष्य है,' ऐसा कहने पर आरण्य (कुक्कुट अथवा सूकर) भक्ष्य है, ऐसा समझा जाता है। यही बात यहाँ भी है। यदि (साधु) शब्दों का उपदेश किया जाता है, (तो) 'गो:' ऐसा उपदेश करने से यह समझ लिया जाता है कि 'गावी' आदि अपशब्द हैं। और भी यदि अपशब्दोपदेश किया जाता है तो 'गावी' आदि का उपदेश होने पर यह (स्वयं) समझ लिया जाता है कि 'गो:' यह शब्द है। फिर यहाँ श्रेष्ठ कौन सा है ? लघु होने से (साधु) शब्दोपदेश। शब्दोपदेश लघु है, अपशब्दोपदेश में गौरव है। (क्योंकि) एक-एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश है। जैसे कि 'गो:' इस (एक) शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अपभ्रंश हैं। और फिर इष्ट का अनुशासन भी होता है। उषा—शब्द स्वरूप प्रतिपादन व्याकरण शास्त्र का विषयभूत है। सर्वप्रथम उसका निरूपण किया गया है। तदनन्तर व्याकरणाध्ययन के मुख्य और गौण प्रयोजनों का विवेचन है। सम्बन्ध और अधिकारी का पृथक् निर्देश यद्यपि नहीं है तथापि विषय और प्रयोजनों के प्रसङ्ग में उनका भी उल्लेख हो ही गया है। कहा जा सकता है कि शब्दज्ञान रूप प्रमेय और शब्दानुशासन रूप साधन का परस्पर बोध्यबोधक भाव सम्बन्ध है तथा "तेभ्य एव विप्रतिपन्नबुद्धिभ्योऽध्येतव्यम्:" इत्यादि के द्वारा शास्त्र के अधिकारी का निरूपण है। अनुबन्धचतुष्टय का विवेचन करने के अनन्तर शास्त्र का प्रारम्भ होता है। साधु शब्दज्ञान तीन प्रकार से करवाया जा सकता है—(१)साधु शब्दों के उपदेश द्वारा, (२)अपशब्दों के उपदेश द्वारा, (३) साधु तथा असाधु उभयशब्दोपदेश द्वारा। इनमें से उभय शब्दोपदेश रूप तृतीय साधन यद्यपि विषय के स्पष्ट प्रतिपादन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, परन्तु यह गौरव दोष से दूषित है। इसीलिए शब्दानुशासन की कथंकर्त्तव्यता पर विचार करते हुए इसका त्याग ही