भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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३० महाभाष्यम् कर दिया गया है, तथा अन्यतर उपदेश की बात कही गई है, तरप् प्रत्यय दो वस्तुओं की अपेक्षा-बुद्धि में प्रयुक्त होता है । "पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः" इत्यादि रूप में भक्ष्य पदार्थों का नियमन अपने से अतिरिक्त पदार्थों में अभक्ष्यत्व की प्रतीति करवाता है अथवा कहा जा सकता है कि इसका अर्थबोध तदितर पदार्थों के भक्ष्यत्व प्रतिषेध में पर्यवसित होता है । इसी प्रकार से सास्नादिमत्पदार्थ में अनुशिष्ट 'गो' शब्द इस बात का बोधक है कि इस अर्थ में प्रयुक्त होने वाले अन्य 'गावी' इत्यादि शब्द असाधु हैं । मीमांसादर्शन में यह उदाहरण नियमविधि का नहीं प्रत्युत परिसंख्या विधि का माना गया है— विधिरत्यन्तमप्राप्तौ नियमः पाक्षिके सति । तत्र चान्यत्र च प्राप्तौ परिसंख्येति गीयते ॥ अर्थात् अत्यन्त अप्राप्त क्रिया की ज्ञापक विधि, अनेक विकल्पों के प्राप्त होने पर उनमें से एक का विधान नियम तथा अन्य वस्तुओं की निवृत्तफलकता परिसंख्या है । प्रस्तुत सन्दर्भ में नियम और परिसंख्या में अप्राप्तांशपूरणरूपफल- बोधन द्वारा अन्य अर्थों की निवृत्ति रूप समानता होने के कारण नियम शब्द का प्रयोग परिसंख्या के अर्थ में किया गया है, ऐसा उद्योतकार का मत है। यहाँ भक्ष्य नियम का अर्थ है—भक्ष्यानुमतिरूप उपदेश । इसी प्रकार से 'गावी' आदि अपशब्दों का अनुशासन करने से यह ज्ञात हो जाता है कि इनके अतिरिक्त 'गो' शब्द साधु है जिसका सास्नादिमत्पदार्थ के बोधन में प्रयोग किया जाना चाहिए । इन दोनों में से भी साधु शब्दों का उपदेश लघु है, अपशब्दों के उपदेश से पुनः गौरव दोष आ जाता है । क्योंकि साधु शब्द एक ही होता है परन्तु देश और कालादि के भेद से उसके प्राकृत रूप अनेक बन जाते हैं । यथा सास्नादिमत्पदार्थ के बोधक एक ही 'गो' शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अनेक अपभ्रष्ट रूप हैं । असाधु शब्दों के उपदेश में इन सभी का अनुशासन करना होगा, जो निश्चय ही साधु शब्दों के उपदेश की अपेक्षा गुरु है। अतः शब्दानुशासन में साधु शब्दों का प्रयोग ही ज्यायान् है । इसके अतिरिक्त साधु शब्द में अभ्युदय और निःश्रेयस् साधकत्व है और शास्त्र का उद्देश्य भी यही है । इसके विपरीत असाधु शब्द अधर्म का साधन है अतः उनका उपदेश करने से शास्त्र अनिष्टोपदेश के दूषण से दूषित हो जायेगा । यही बात वाक्यपदीयकार ने भी इन शब्दों में कही है— धर्मे ये प्रत्यये चाङ्ग सम्बन्धाः साध्वसाधुषु । १।२५. ते लिङ्गंश्च स्वशब्दैश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुपवर्णिताः । १।२६.