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व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ४५ द्रव्य में तो उपलब्ध होती ही है । अथवा यह नित्य होने का लक्षण नहीं है (कि) जो ध्रुव, स्वरूप में अवस्थित नित्य सुस्थित, परिणाम, विपरिणाम, विकाररहित, उत्पत्तिरहित, वृद्धिरहित और क्षयरहित हो, वही नित्य है । वह भी नित्य है, जिसमें तत्त्व नष्ट नहीं होता । फिर तत्त्व क्या है ? उस वस्तु का (स्व) भाव तत्त्व है । आकृति में भी तत्त्व नष्ट नहीं होता । अथवा इससे क्या कि यह नित्य है, अथवा यह अनित्य है । जो भी नित्य है, उसे पदार्थ मानकर यह विग्रह किया जाता है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के सिद्ध होने पर । उषा—पद का अर्थ आकृतिरूप मानकर भी शब्द, अर्थ और सम्बन्ध इन तीनों की नित्यता को सिद्ध किया जा सकता है। यहाँ 'आकृति' पद का अर्थ 'जाति' है । 'अपि' शब्द के प्रयोग से द्रव्य का ग्रहण किया गया है अर्थात् द्रव्य रूप में तो अर्थ नित्य है ही, जाति रूप में भी नित्य है । किसी एक द्रव्य में अनभिव्यक्त होती हुई भी जाति सर्वत्र अप्रत्यक्ष नहीं हो जाती । एक स्थान पर घटिका की आकृति नष्ट होकर भी सर्वत्र नष्ट नहीं होती । अन्य पदार्थों में उसका सत्त्व उसकी नित्यता बताता है । जाति की व्यञ्जिका आकृति व्यवहार काल में उत्पन्न और नष्ट होते हुए भी प्रकारान्तर से नित्य है । संसर्गानित्यता, परिणामानित्यता और प्रध्वंसानित्यता के रूप में अनित्यता तीन प्रकार की मानी गई है । लाक्षा आदि पदार्थों के संसर्ग से स्फटिक के स्वरूप का तिरोधान हो जाता है, यह संसर्गानित्यता है । बदरी आदि फलों में श्यामता का तिरोभाव होकर लौहित्य का आविर्भाव परिणामानित्यता है तथा वस्तु का सर्वात्मना विनाश प्रध्वंसानित्यता है । केवल मात्र इस तीन प्रकार की अनित्यता से रहित होना ही नित्यता का लक्षण नहीं है । इस प्रकार की नित्यता ब्रह्म से सम्बद्ध है, इसे कूटस्थ नित्यता कहते हैं । पदार्थ एक स्थान पर नष्ट होकर भी भावरूप में अन्यत्र वर्तमान रहता है, अतः उसमें प्रवाहनित्यता है । क्योंकि उसका नाश हो जाने पर भी उसका धर्म नष्ट नहीं होता । शब्द का उच्चारण तत्तदाकारा अर्थभावना को बुद्धि में व्यक्त कर देता है अतः पदार्थ को केवल बाह्य रूप में न मानकर बौद्ध रूप में स्वीकार करने से उसकी नित्यता स्वयमेव सिद्ध हो जाती है । शशशृङ्ग इत्यादि पदार्थ भी इसीलिए स्वरूपतः सिद्ध न होने पर बुद्धि में प्रतिभासित होने के कारण बोध के विषय बनते हैं । अतएव चाहे द्रव्य को पदार्थ मानकर “सिद्धे शब्दार्थ सम्बन्धे” का विग्रह