व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ महाभाष्यम् किया जाये अथवा जाति को पदार्थ मानकर, दोनों ही दृष्टियाँ उपयुक्त हैं । पाणिनि ने दोनों प्रकार के अर्थों की नित्यता को स्वीकार किया है । मूलम्—कथं पुनर्ज्ञायते—सिद्धः शब्दोऽर्थः सम्बन्धश्चेति । लोकतः । यल्लोकेऽर्थमर्थमुपादाय शब्दान्प्रयुञ्जते, नैषां निर्वृत्तौ यत्नं कुर्वन्ति । ये पुनः कार्या भावा निर्वृत्तौ तावत्तेषां यत्नः क्रियते । तद्यथा—घटेन कार्यं करिष्य- न्कुम्भकारकुलं गत्वाह—कुरु घटं कार्यमनेन करिष्यामीति । न तावच्छब्दान्प्रयुयुक्ष- माणो वैयाकरणकुलं गत्वाह—कुरु शब्दान्प्रयोक्ष्य इति । तावत्येवार्थमुपादाय शब्दा- न्प्रयुञ्जते । प्रदीपः—लोकत इति । अन्यथा कार्येषु लोकव्यवहारः, अन्यथा नित्येषु । शाब्दश्च व्यवहारोऽनादिवृद्धव्यवहारपरम्पराव्युत्पत्तिपूर्वक इति शब्दादीनां नित्यत्वम् । घटादयस्त्वर्थक्रियार्थिभिरन्यत आनीयन्त उत्पादविनाशयुक्ताश्चोपलभ्यन्ते । नैवं शब्दादयः । तावत्येवार्थमिति । बुद्ध्या वस्तु निरूप्येत्यर्थः । अनुवाद—फिर (यह) कैसे जाना जाता है कि शब्द, अर्थ और सम्बन्ध नित्य है । लोक से । क्योंकि लोक में तत्तदर्थ को कहने के लिए शब्दों का प्रयोग करते हैं । (परन्तु) इनके निर्माण में यत्न नहीं करते । जो कार्य भाव हैं उनके निर्माण में यत्न किया जाता है । जैसे कि घड़े से काम करना चाहता हुआ कुम्भकार कुल में जाकर कहता है—'घड़ा बनाइये, मैं इससे कार्य करूंगा,' उसी प्रकार शब्दों के प्रयोग की इच्छा करता हुआ वैयाकरणकुल में जाकर नहीं कहता—'शब्द बनाओ, मैं प्रयोग करूँगा । वैसे ही अर्थ को लेकर शब्दों का प्रयोग करता है । उषा—शास्त्र लोक से अनुप्राणित होता है अथवा लोक शास्त्र से अनुशिष्ट, इसी प्रश्न को मन में रखकर भाष्यकार ने यह निर्णय दिया है कि शब्द, अर्थ और उसके सम्बन्ध की नित्यता का प्रमाण लोकव्यवहार है। शब्द से अर्थबोधन का व्यवहार अनादिकाल से चला आ रहा है, व्याकरण तो केवल उस लोकव्यवहार का अनुशासन मात्र करता है। अतः लोक प्रधान है, शास्त्र गौण । इसी बात को पुष्ट करने के लिए पतञ्जलि ने एक सुन्दर आख्यान प्रस्तुत किया है। घट का प्रयोग करने की इच्छा से जिस प्रकार व्यक्ति कुम्भकार के पास जाकर घट ले आता है, उसी प्रकार शब्दों का प्रयोग करने का इच्छुक व्यक्ति वैयाकरण के पास जाकर शब्दों की याचना नहीं करता प्रत्युत वह अपनी इच्छा से लोक में प्रचलित शब्दों का प्रयोग कर लेता है। व्याकरण उसके विषय में शुद्ध और अशुद्ध का विवेचन करके धर्म की प्रतिष्ठापना मात्र करता है। न केवल पतञ्जलि प्रत्युत उनसे पूर्व स्वयं पाणिनि लोकव्यवहार को ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण के रूप में स्वीकार कर चुके थे—