भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ४७ प्रधानप्रत्ययार्थवचनमर्थस्यान्यप्रमाणत्वात् । इसी की व्याख्या करते हुए काशिकाकार ने कहा है— “अन्यो लोकः । शब्दैरर्थाभिधानं स्वाभाविकम् । लोकत एवार्थगतेः ।” मूलम्— यदि तर्हि लोक एषु प्रमाणं, किं शास्त्रेण क्रियते ? *लोकतोऽर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः । लोकतोऽर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः क्रियते । किमिदं धर्मनियम इति । धर्माय नियमो धर्मनियमः, धर्मार्थो वा नियमो धर्मनियमः, धर्मप्रयोजनो वा नियमो धर्मनियमः । प्रदीपः—अत्र भाष्यकारेण सम्भवन्तीमप्येकवाक्यतामनाश्रित्य वाक्यत्रयं व्यवस्थापितम् । सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे शास्त्रं प्रवृत्तमित्येकं वाक्यम् । कथं ज्ञायत इति प्रश्ने लोकतो ज्ञायते इति द्वितीयम् । लोकत इत्यस्यावृत्त्या लोकतोऽर्थप्रयुक्ते इत्यादि तृतीयम् । शब्दप्रयोग इति प्रयोगग्रहणेन “प्रयोगाद्धर्मो न तु ज्ञानमात्राद्” इत्युक्तं भवति । अर्थेनात्मप्रत्यायनाय प्रयुक्तोऽर्थप्रयुक्तः । धर्माय नियम इति । धर्मार्थत्वान्नियम एव धर्मशब्देनाभिधीयत इति कर्मधारयः समासः । धर्मप्रयोजन इति । लिङादिविषयेण नियोगाख्येन धर्मेण प्रयुक्त इत्यर्थः । अनुवाद—यदि लोक इसमें प्रमाण है तो शास्त्र से क्या किया जाता है ? लोक में अर्थ विशेष में प्रयुक्त शब्द के प्रयोग में शास्त्र से धर्म का नियम । लोक में अर्थ विशेष में प्रयुक्त (प्रसिद्ध) शब्द के प्रयोग में शास्त्र से धर्म का नियमन किया जाता है । धर्म के लिए धर्मनियम है अथवा धर्मरूप नियम धर्म नियम है अथवा धर्म का प्रयोजक नियम धर्मनियम है । उषा—“शब्दार्थ सम्बन्धों की नित्यता यदि लोक व्यवहार से ही सिद्ध है है तो शास्त्र निष्प्रयोजन होकर रह जाता है", पूर्वपक्षी की इस शङ्का का समाधान प्रकृत वार्तिक से किया गया है । लोक में अर्थ के द्वारा आत्मप्रत्यायन के लिए प्रयुक्त शब्दों का शास्त्र के द्वारा धर्मनियम किया जाता है । “शब्दप्रयोगे" में प्रयोग शब्द का ग्रहण करके यह निर्देश किया गया है कि साधु शब्दों के व्यवहार में प्रयोग से धर्म की प्राप्ति होती है, केवल ज्ञान से नहीं । 'धर्मनियमः' पद की भाष्यकार ने तीन प्रकार से व्युत्पत्ति प्रदर्शित की है— (१) धर्माय नियमः (२) धर्मार्थो नियमः (३) धर्मप्रयोजनो नियमः । प्रदीपकार के अनुसार प्रथम व्युत्पत्ति में चतुर्थी विभक्ति तादर्थ्य सम्बन्ध को बताने के लिए है, अतः 'धर्म' पद 'अपूर्व' अर्थ में पर्यवसित होता है । धर्मार्थ ही होने के कारण द्वितीय व्युत्पत्ति में नियम को ही 'धर्म' शब्द से कहा गया है, अतः यहाँ कर्म-