व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ३६ अथवा व्याख्यान से विशेष बोध होता है, सन्देह भर से (लक्षण) अलक्षण नहीं हो जाता, इसलिए (यहाँ) नित्य के पर्यायवाची सिद्ध शब्द का ग्रहण है (ऐसा) व्याख्यान करेंगे । उषा—सिद्धान्ती ने "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" वार्त्तिक में सिद्ध शब्द को नित्य का पर्यायवाची स्वीकार करके अपना विवेचन प्रस्तुत किया था । पूर्वपक्षी इस पर आशंका करता हुआ कहता है कि सिद्ध शब्द जिस प्रकार से नित्य भावों के व्याख्यान में प्रयुक्त होता है, उसी प्रकार से क्रियानिष्पन्न पदार्थों को कहने में भी इस शब्द का प्रयोग लोक में देखा जाता है, यथा ओदन सिद्ध है, यवागू सिद्ध है, इत्यादि । इसलिए बिना आधार के इसे केवल मात्र अविनाशी तथा नित्य अवस्थित पदार्थों का वाचक नहीं माना जा सकता । सिद्धान्ती ने पूर्वपक्षी की इस आशंका का चार प्रकार से समाधान किया है— (१) भाष्यकार का प्रथम तर्क संग्रहग्रन्थ को प्रमाण रूप मानकर प्रस्तुत किया गया है । संग्रह ग्रन्थ में सिद्ध शब्द को कार्य के प्रतिपक्षी अर्थ का अभिधान करने में प्रयुक्त किया गया है। समान शास्त्रीय विषय होने के कारण सम्भवतः यह प्रस्तुत वार्त्तिक में उसी अर्थ का अभिधान करता है । परन्तु यह आवश्यक नहीं कि जो सिद्धान्त संग्रह ग्रन्थ में व्याडि द्वारा स्वीकृत किये गये हों, वही वार्त्तिक कार कात्यायन को भी अभिमत हों । ऐसी स्थिति में तो व्याडि सम्मत द्रव्य पदार्थ- वाद का सिद्धान्त भी वार्त्तिककार को स्वीकृत होना चाहिए था । अतः कुछ अन्य तर्कों का भी उपस्थापन किया गया है । (२) लोक में "अब्भक्षः", "वायुभक्षः" आदि प्रयोग जल का ही भक्षण करता है, अथवा, वायु का ही भक्षण करता है, इन अर्थों में पर्यवसित होते हैं । यहाँ अर्थात्मक अवधारणा में 'एव' शब्द का प्रयोग निश्चयात्मकता को बताता है । जब शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को सिद्ध कहा जाता है तो यहाँ वह सिद्ध ही है, इस रूप में ग्रहण किया जायेगा । अन्य कार्य पदार्थ प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव की स्थिति में सिद्ध नहीं होते । (३) संज्ञा के रूप में प्रसिद्ध 'देवदत्त' इत्यादि शब्द अपने संक्षिप्त रूप 'दत्त' आदि से ही सम्पूर्ण अर्थ की प्रतीति करवा देते हैं क्योंकि सम्पूर्ण के लिए प्रयुज्यमान संज्ञा अपने अवयवों में भी सम्पृक्त हो जाती है । अपि च, एक सम्बन्धि ज्ञान अपने से सम्बद्ध अन्य वस्तु का भी स्मारक होता ही है । इसी प्रकार से 'दत्त' शब्द अपने से सम्बन्धित 'देव' शब्द का भी स्मरण करवाता है और 'देवदत्त' उस सम्पूर्ण अर्थ की प्रतीति होती है । और यह व्यवहार केवल संज्ञाओं में ही नहीं, अन्यत्रापि दृष्टिगत होता है । यहाँ भी 'सिद्ध' शब्द वस्तुतः सम्पूर्ण शब्द 'अत्यन्त सिद्ध' का लघु रूप है । ऐसी स्थिति में सिद्ध शब्द नित्य वस्तु का ही पर्याय हो सकता है, कार्य पदार्थ का नहीं ।