भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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३८ महाभाष्यम् अथवा व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षणमिति नित्यपर्याय- वाचिनो ग्रहणमिति व्याख्यास्यामः । प्रदीपः—ननु चेति । सिद्धशब्दात्क्रियानिष्पन्नोऽप्यर्थोऽवगम्यत इत्यर्थः । संग्रहे तावदिति । तत्र हि “किं कार्यः शब्दोऽथ सिद्ध” इति पक्षद्वयविचारः कृतः । तत्र कार्यप्रतिपक्षार्थाभिधायी सामर्थ्यात्सिद्धशब्द इति स्थितम् । तत्समान- तन्त्रत्वाद्विहापि तथैव युक्तमित्यर्थः । अथवेति । एवशब्दप्रयोगे द्विपदमवधारणं, द्योतकत्वेनैव शब्दस्यापेक्षणात् । यदा तु द्योतकमन्तरेण सामर्थ्यादवधारणं गम्यते तदा तदेकपदमित्युच्यते । तत्र सर्व एवापो भक्षयन्तीत्यब्भक्षश्रुतिः सामर्थ्यान्नियममवगमयति—अप एव भक्षयन्तीति । इहापि नित्यानित्यव्यतिरेकेण राश्यन्तराभावात्सिद्धशब्दोपादानान्नियमोऽवगम्यते सिद्ध एवेति । कार्याणां तु पदार्थानां प्रागभावप्रध्वंसाभावयोरपि सत्त्वात्सिद्धता नास्तीति न ते सिद्धा एव । अथवेति । कथं पुनर्देवदत्तशब्दे संज्ञात्वेन विनियुक्ते एकदेशः प्रयुज्यते । न ह्यसौ संज्ञात्वेन विनियुक्तः । न चैकदेशात्स्मर्यमाणस्य समुदायस्य वाचकत्वमुपपद्यते । प्रतीयमानस्य प्रत्यायकत्वासम्भवादुच्चार्यमाणस्यैव वाचकत्वात् । एवं तर्ह्यनु- निष्पादिन्योऽवयवरूपाः संज्ञा विनियोगकाले विनियुक्ता एव । लोपस्तु वर्णानां साधुत्वं मा भूदित्यन्वाख्यायते । इहापि नित्यानित्ययोर्निष्पन्नतवाविशेषात्सिद्ध- श्रुतिरुपात्ता प्रकर्षं गमयति— अत्यन्तसिद्ध इति । न्यायाद्वा नित्यत्वं शब्दादीनां स्थितमित्याह—अथवेति । न हि सन्देहमात्रा- दलक्षणता भवति, पुनः प्रमाणान्तरेण निश्चयोत्पादात् । अनुवाद—अरे ! इस प्रकार से तो (सिद्ध शब्द) कार्य (पदार्थों) में भी (प्रयुक्त होता) है। जैसे कि—ओदन सिद्ध हैं (बन गये हैं), दाल सिद्ध है, यवागु (खिचड़ी) सिद्ध है इत्यादि । जब यह कार्य (पदार्थों) में भी (प्रयुक्त होता है), फिर कैसे वहाँ नित्य पर्यायवाची (सिद्ध शब्द का) ही ग्रहण है, कार्य के पर्याय सिद्ध शब्द का नहीं । संग्रह (नामक ग्रन्थ) में कार्य (पदार्थों) के विरोधी भाव में प्रयुक्त होने के कारण (हम) समझते हैं (कि वहाँ भी) नित्य के पर्याय रूप में (सिद्ध शब्द का) ग्रहण है । (इसलिए यहाँ भी वैसा ही हो । अथवा एक ही पद से अवधारण (नियम) देखे जाते हैं, जैसे कि अब्भक्षः, वायुभक्षः आदि से पानी ही पीता है, वायु ही खाता है, ऐसा समझा जाता है । इसलिए यहाँ भी सिद्ध ही है, साध्य नहीं, (ऐसा समझा जाना चाहिए) अथवा यहाँ पूर्व पद का लोप समझना चाहिए, अत्यन्तसिद्ध (को) सिद्ध (कहते हैं) । जैसे कि देवदत्त को दत्त (और) सत्यभामा को भामा (इत्यादि)