व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३७ "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" अर्थात् शब्द, अर्थ और उसके सम्बन्ध के नित्य होने पर । अब सिद्ध शब्द का क्या अर्थ है ? सिद्ध शब्द नित्य (शब्द) का पर्यायवाची है । (यह) कैसे जाना जाता है ? क्योंकि यह कूटस्थ (स्वरूप में स्थित) और अविचालित (नित्य सुस्थित) भावों में आता है । जैसे कि—द्युलोकं सिद्ध है, पृथिवी सिद्ध है, आकाश सिद्ध है (इत्यादि) । उषा—शब्द और अर्थ का सम्बन्ध यदि नित्य और लोकसिद्ध है तो शास्त्र का आरम्भ व्यर्थ ही है और यदि यह सम्बन्ध सिद्ध नहीं है तो शास्त्र का अनुशासन हो ही नहीं सकता है । अत एव यह प्रश्न उठाया गया है कि पाणिनि का शब्दानु- शासन किस अभिप्राय को लेकर प्रवृत्त हुआ है, अर्थात् पाणिनि के शासनतन्त्र की सीमाओं में शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध नित्य है अथवा अनित्य । इस प्रश्न के उत्तर में भाष्यकार ने एक वार्त्तिक उद्धृत किया है— "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" अर्थात् शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को नित्य मानते हुए । यहाँ सिद्ध शब्द नित्य शब्द का पर्यायवाची है, क्योंकि यह प्रायः अविनाशी तथा नित्य अवस्थित भावों को अभिव्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होता है । जाति स्फोट अथवा व्यक्ति स्फोट रूप शब्द नित्य है । जो शब्द को अनित्य मानते हैं उनके मत में भी शब्द में प्रवाहनित्यता तो है ही । जाति रूप में अर्थ नित्य है, द्रव्यपक्ष में असत्योपाध्यवच्छिन्न ब्रह्मतत्त्व ही समस्त शब्दों के द्वारा वाच्य है, अतः नित्य है । व्यवहार परम्परा के अनादि होने के कारण शब्द और अर्थ का सम्बन्ध भी नित्य है । मूलम्—ननु च भोः कार्येष्वपि वर्तते, तद्यथा सिद्ध ओदनः, सिद्धः सूपः, सिद्धा यवागूरिति । यावता कार्येष्वपि वर्तते, तत्र कुत एतन्नित्यपर्यायवाचिनो ग्रहणं न पुनः कार्ये यः सिद्ध शब्द इति । संग्रहे तावत्कार्यप्रतिद्वन्द्विभावान्मन्यामहे नित्यपर्यायवाचिनो ग्रहणमिति । इहापि तदेव । अथवा सन्त्येकपदान्यप्यवधारणानि । तद्यथा अब्भक्षो, वायुभक्ष इति— अप एव भक्षयति, वायुमेव भक्षयतीति गम्यते । एवमिहापि । सिद्ध एव न साध्य इति । अथवा पूर्वपदलोपोऽत्र द्रष्टव्यः । अत्यन्तसिद्धः सिद्ध इति । तद्यथा देवदत्तो दत्तः, सत्यभामा भामेति ।