भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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३६ महाभाष्यम् का अनुभव करते हुए यह प्रश्न उठाया गया है । परन्तु भाष्यकार ने यहाँ इसकी अप्रासङ्गिकता को बताते हुए कहा है कि इस प्रकार का विस्तृत विवेचन पहले ही आचार्य व्याडि के संग्रह (नामक ग्रन्थ) में हो चुका है । यहाँ उन सब उक्तियों का दोहराना पिष्टपेषण ही होगा । इन दोनों ही पक्षों के सूक्ष्म पर्यालोचन के अनन्तर वहाँ यह निर्णय दिया गया है कि शब्द को चाहे नित्य माना जाये अथवा कार्य, दोनों ही परिस्थितियों में उसके साधुत्व का अनुशासन आरम्भणीय है । व्याडि पाणिनि के मातुल अथवा बलदेव उपाध्याय के शब्दों में मातुलपुत्र थे । उनके द्वारा विरचित संग्रहग्रन्थ के विषय में सर्वप्रथम सूचना महाभाष्य से प्राप्त होती है, जहाँ शब्दनित्यत्व और कार्यत्व जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों को भी व्याडिप्रमाण कहकर छोड़ दिया गया है, जो व्याडि की प्रामाणिकता सिद्ध करता है । भर्तृहरि ने महाभाष्य के उक्त प्रसङ्ग की टीका करते हुए इस ग्रन्थ के विषय में कहा है कि इसमें १४ सहस्र दार्शनिक वस्तुओं की परीक्षा की गई है । पुण्यराज ने वाक्यपदीय की टीका में इसे लक्षग्रन्थपरिमाण वाला कहा है । इसकी पुष्टि प्रदीपोद्द्योत से भी होती है । युधिष्ठिर मीमांसक ने अनेक स्थानों पर उद्धृत संग्रह ग्रन्थ के उद्धरणों का संकलन करके उसे प्रकाशित किया है । मूलम् — कथं पुनरिदं भगवतः पाणिनेराचार्यस्य लक्षणं प्रवृत्तम् ? “सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे” (वा०) । सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति । अथ सिद्धशब्दस्य कः पदार्थः ? नित्यपर्यायवाची सिद्धशब्दः । कथं ज्ञायते । यत्कूटस्थेष्वविचालिषु भावेषु वर्तते । तद्यथा सिद्धा द्यौः सिद्धा पृथिवी, सिद्धमाकाशमिति । प्रदीपः— कथं पुनरिति । किमाचार्य एव स्रष्टा शब्दार्थसम्बन्धानाम्, अथ स्मर्तेति प्रश्नः । सिद्ध इति । तत्र नित्यः शब्दो जातिस्फोटलक्षणो व्यक्तिस्फोटलक्षणो वा । कार्यशाब्दिकानामपि मते प्रवाहनित्यता । अर्थस्यापि जातिलक्षणस्य नित्यत्वम् । द्रव्यपक्षेऽपि सर्वशब्दानामसत्योपाध्यवच्छिन्नं ब्रह्मतत्त्वं वाच्यमिति नित्यता प्रवाह- नित्यता वा । सम्बन्धस्यापि व्यवहारपरम्परयाऽनादित्वात्नित्यता । सिद्ध शब्दस्य नित्यानित्ययोर्दर्शनात्पृच्छति— अथेति । नित्येति । नित्यलक्षणस्यार्थस्य पर्यायेण वाचकस्तमेवार्थं कदाचिन्नित्यशब्द आह कदाचित्सिद्धशब्द इत्यर्थः । कूटस्थेष्विति । देशान्तरप्राप्तिरहितेषु । अनुवाद — फिर कैसे (किस अभिप्राय से भगवान् आचार्य पाणिनि का लक्षण (शास्त्र) प्रवृत्त हुआ है ?