भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 96 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 49

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३५ का विधान करने के लिए "सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ" आदि सूत्र अनर्थक हो जायेंगे । अतः व्याकरण मत में व्यक्ति और जाति दोनों में ही पदार्थत्व वर्त्तमान है। बल्कि सच तो यह है कि जाति और व्यक्ति अभिन्न हैं, उन्हें पृथक् नहीं किया जा सकता । यह बात अलग है कि किसी स्थल पर वाच्यत्व जाति में होता है, अन्यत्र व्यक्ति में। मुख्य वाच्य यदि जाति हो तो व्यक्ति गौण होता है और व्यक्ति यदि मुख्य रूप से वाच्य हो तो जाति में गौणता होती है। यही बात भर्तृहरि ने भी कही है— "पदार्थानामपोद्धारे जातिर्वा द्रव्यमेव वा" । मूलम्—किं पुनर्नित्यः शब्दः, आहो स्वित्कार्यः ? संग्रह एतत्प्राधान्येन परीक्षितम्—नित्यो वा स्यात् कार्यों वेति । तत्रोक्ता दोषाः, प्रयोजनान्यप्युक्तानि । तत्र त्वेष निर्णयः—यद्येव नित्यः, अथापि कार्यः, उभयथापि लक्षणं प्रवर्त्यमिति । प्रदीपः—किं पुनरिति । विप्रतिपत्त्या संशयः । केचिद्ध्वनिव्यङ्ग्यं वर्णात्मकं नित्यं शब्दमाहुः । अन्ये वर्णव्यतिरिक्तं पदस्फोटमिच्छन्ति । वाक्यस्फोटमपरे संगिरन्ते । अन्ये तु ध्वनिरेव शब्दः स च कार्यस्तद्व्यतिरेकेणान्यस्यानुपलम्भादि- त्याचक्षते । संग्रह इति । ग्रन्थविशेषे । अनुवाद—क्या शब्द नित्य है, अथवा कार्य (अनित्य) ? संग्रह (नामक ग्रन्थ) में मुख्य रूप से इसकी परीक्षा की गई है कि (शब्द) नित्य है अथवा कार्य । वहाँ (उभय पक्षों में प्रसक्त) दोष कहे गये हैं, (शास्त्रारम्भ के) प्रयोजन भी बताये गये हैं। वहाँ यह निर्णय किया गया है कि यद्यपि (शब्द) नित्य है, अथवा कार्य, दोनों ही परिस्थितियों में लक्षणशास्त्र (व्याकरण) का उपदेश होना चाहिए । उषा—विभिन्न दर्शनों में तत्तद्दर्शनतन्त्र की सीमाओं के अनुरूप शब्द के स्वरूप पर विचार किया गया है । उनकी मान्यतायें न केवल भिन्न-भिन्न प्रत्युत परस्पर विरोधी भी हैं। मीमांसा ध्वनि रूप वर्णात्मक शब्द को नित्य स्वीकार करता है, न्यायदर्शन को इसकी नित्यता स्वीकार्य नहीं क्योंकि उनके मत में श्रूयमाण ध्वनिरूप ही शब्द है। कुछ वैयाकरण वर्णों के अतिरिक्त पदस्फोट की सत्ता को स्वीकार करते हैं परन्तु पदों में वर्णों की स्थिति जिस प्रकार से कल्पित है, उसी प्रकार से वाक्य में पदों की स्थिति भी काल्पनिक है, अतः अन्य वैयाकरणों की दृष्टि में वाक्यस्फोट ही प्रधान रूप से शब्दत्वेन स्थित है । एवं च, शब्दानुशासन करने से पूर्व इन परस्पर विसंवादी मान्यताओं के मध्य शब्दनित्यत्व और कार्यत्व के प्रश्न का समाधान कर लेने की अनिवार्यता

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक) · पृष्ठ 49, कुल 96 में से · BharatKosha