व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३७ "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" अर्थात् शब्द, अर्थ और उसके सम्बन्ध के नित्य होने पर । अब सिद्ध शब्द का क्या अर्थ है ? सिद्ध शब्द नित्य (शब्द) का पर्यायवाची है । (यह) कैसे जाना जाता है ? क्योंकि यह कूटस्थ (स्वरूप में स्थित) और अविचालित (नित्य सुस्थित) भावों में आता है । जैसे कि—द्युलोकं सिद्ध है, पृथिवी सिद्ध है, आकाश सिद्ध है (इत्यादि) । उषा—शब्द और अर्थ का सम्बन्ध यदि नित्य और लोकसिद्ध है तो शास्त्र का आरम्भ व्यर्थ ही है और यदि यह सम्बन्ध सिद्ध नहीं है तो शास्त्र का अनुशासन हो ही नहीं सकता है । अत एव यह प्रश्न उठाया गया है कि पाणिनि का शब्दानु- शासन किस अभिप्राय को लेकर प्रवृत्त हुआ है, अर्थात् पाणिनि के शासनतन्त्र की सीमाओं में शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध नित्य है अथवा अनित्य । इस प्रश्न के उत्तर में भाष्यकार ने एक वार्त्तिक उद्धृत किया है— "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" अर्थात् शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को नित्य मानते हुए । यहाँ सिद्ध शब्द नित्य शब्द का पर्यायवाची है, क्योंकि यह प्रायः अविनाशी तथा नित्य अवस्थित भावों को अभिव्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होता है । जाति स्फोट अथवा व्यक्ति स्फोट रूप शब्द नित्य है । जो शब्द को अनित्य मानते हैं उनके मत में भी शब्द में प्रवाहनित्यता तो है ही । जाति रूप में अर्थ नित्य है, द्रव्यपक्ष में असत्योपाध्यवच्छिन्न ब्रह्मतत्त्व ही समस्त शब्दों के द्वारा वाच्य है, अतः नित्य है । व्यवहार परम्परा के अनादि होने के कारण शब्द और अर्थ का सम्बन्ध भी नित्य है । मूलम्—ननु च भोः कार्येष्वपि वर्तते, तद्यथा सिद्ध ओदनः, सिद्धः सूपः, सिद्धा यवागूरिति । यावता कार्येष्वपि वर्तते, तत्र कुत एतन्नित्यपर्यायवाचिनो ग्रहणं न पुनः कार्ये यः सिद्ध शब्द इति । संग्रहे तावत्कार्यप्रतिद्वन्द्विभावान्मन्यामहे नित्यपर्यायवाचिनो ग्रहणमिति । इहापि तदेव । अथवा सन्त्येकपदान्यप्यवधारणानि । तद्यथा अब्भक्षो, वायुभक्ष इति— अप एव भक्षयति, वायुमेव भक्षयतीति गम्यते । एवमिहापि । सिद्ध एव न साध्य इति । अथवा पूर्वपदलोपोऽत्र द्रष्टव्यः । अत्यन्तसिद्धः सिद्ध इति । तद्यथा देवदत्तो दत्तः, सत्यभामा भामेति ।
३८ महाभाष्यम् अथवा व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षणमिति नित्यपर्याय- वाचिनो ग्रहणमिति व्याख्यास्यामः । प्रदीपः—ननु चेति । सिद्धशब्दात्क्रियानिष्पन्नोऽप्यर्थोऽवगम्यत इत्यर्थः । संग्रहे तावदिति । तत्र हि “किं कार्यः शब्दोऽथ सिद्ध” इति पक्षद्वयविचारः कृतः । तत्र कार्यप्रतिपक्षार्थाभिधायी सामर्थ्यात्सिद्धशब्द इति स्थितम् । तत्समान- तन्त्रत्वाद्विहापि तथैव युक्तमित्यर्थः । अथवेति । एवशब्दप्रयोगे द्विपदमवधारणं, द्योतकत्वेनैव शब्दस्यापेक्षणात् । यदा तु द्योतकमन्तरेण सामर्थ्यादवधारणं गम्यते तदा तदेकपदमित्युच्यते । तत्र सर्व एवापो भक्षयन्तीत्यब्भक्षश्रुतिः सामर्थ्यान्नियममवगमयति—अप एव भक्षयन्तीति । इहापि नित्यानित्यव्यतिरेकेण राश्यन्तराभावात्सिद्धशब्दोपादानान्नियमोऽवगम्यते सिद्ध एवेति । कार्याणां तु पदार्थानां प्रागभावप्रध्वंसाभावयोरपि सत्त्वात्सिद्धता नास्तीति न ते सिद्धा एव । अथवेति । कथं पुनर्देवदत्तशब्दे संज्ञात्वेन विनियुक्ते एकदेशः प्रयुज्यते । न ह्यसौ संज्ञात्वेन विनियुक्तः । न चैकदेशात्स्मर्यमाणस्य समुदायस्य वाचकत्वमुपपद्यते । प्रतीयमानस्य प्रत्यायकत्वासम्भवादुच्चार्यमाणस्यैव वाचकत्वात् । एवं तर्ह्यनु- निष्पादिन्योऽवयवरूपाः संज्ञा विनियोगकाले विनियुक्ता एव । लोपस्तु वर्णानां साधुत्वं मा भूदित्यन्वाख्यायते । इहापि नित्यानित्ययोर्निष्पन्नतवाविशेषात्सिद्ध- श्रुतिरुपात्ता प्रकर्षं गमयति— अत्यन्तसिद्ध इति । न्यायाद्वा नित्यत्वं शब्दादीनां स्थितमित्याह—अथवेति । न हि सन्देहमात्रा- दलक्षणता भवति, पुनः प्रमाणान्तरेण निश्चयोत्पादात् । अनुवाद—अरे ! इस प्रकार से तो (सिद्ध शब्द) कार्य (पदार्थों) में भी (प्रयुक्त होता) है। जैसे कि—ओदन सिद्ध हैं (बन गये हैं), दाल सिद्ध है, यवागु (खिचड़ी) सिद्ध है इत्यादि । जब यह कार्य (पदार्थों) में भी (प्रयुक्त होता है), फिर कैसे वहाँ नित्य पर्यायवाची (सिद्ध शब्द का) ही ग्रहण है, कार्य के पर्याय सिद्ध शब्द का नहीं । संग्रह (नामक ग्रन्थ) में कार्य (पदार्थों) के विरोधी भाव में प्रयुक्त होने के कारण (हम) समझते हैं (कि वहाँ भी) नित्य के पर्याय रूप में (सिद्ध शब्द का) ग्रहण है । (इसलिए यहाँ भी वैसा ही हो । अथवा एक ही पद से अवधारण (नियम) देखे जाते हैं, जैसे कि अब्भक्षः, वायुभक्षः आदि से पानी ही पीता है, वायु ही खाता है, ऐसा समझा जाता है । इसलिए यहाँ भी सिद्ध ही है, साध्य नहीं, (ऐसा समझा जाना चाहिए) अथवा यहाँ पूर्व पद का लोप समझना चाहिए, अत्यन्तसिद्ध (को) सिद्ध (कहते हैं) । जैसे कि देवदत्त को दत्त (और) सत्यभामा को भामा (इत्यादि)
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ३६ अथवा व्याख्यान से विशेष बोध होता है, सन्देह भर से (लक्षण) अलक्षण नहीं हो जाता, इसलिए (यहाँ) नित्य के पर्यायवाची सिद्ध शब्द का ग्रहण है (ऐसा) व्याख्यान करेंगे । उषा—सिद्धान्ती ने "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" वार्त्तिक में सिद्ध शब्द को नित्य का पर्यायवाची स्वीकार करके अपना विवेचन प्रस्तुत किया था । पूर्वपक्षी इस पर आशंका करता हुआ कहता है कि सिद्ध शब्द जिस प्रकार से नित्य भावों के व्याख्यान में प्रयुक्त होता है, उसी प्रकार से क्रियानिष्पन्न पदार्थों को कहने में भी इस शब्द का प्रयोग लोक में देखा जाता है, यथा ओदन सिद्ध है, यवागू सिद्ध है, इत्यादि । इसलिए बिना आधार के इसे केवल मात्र अविनाशी तथा नित्य अवस्थित पदार्थों का वाचक नहीं माना जा सकता । सिद्धान्ती ने पूर्वपक्षी की इस आशंका का चार प्रकार से समाधान किया है— (१) भाष्यकार का प्रथम तर्क संग्रहग्रन्थ को प्रमाण रूप मानकर प्रस्तुत किया गया है । संग्रह ग्रन्थ में सिद्ध शब्द को कार्य के प्रतिपक्षी अर्थ का अभिधान करने में प्रयुक्त किया गया है। समान शास्त्रीय विषय होने के कारण सम्भवतः यह प्रस्तुत वार्त्तिक में उसी अर्थ का अभिधान करता है । परन्तु यह आवश्यक नहीं कि जो सिद्धान्त संग्रह ग्रन्थ में व्याडि द्वारा स्वीकृत किये गये हों, वही वार्त्तिक कार कात्यायन को भी अभिमत हों । ऐसी स्थिति में तो व्याडि सम्मत द्रव्य पदार्थ- वाद का सिद्धान्त भी वार्त्तिककार को स्वीकृत होना चाहिए था । अतः कुछ अन्य तर्कों का भी उपस्थापन किया गया है । (२) लोक में "अब्भक्षः", "वायुभक्षः" आदि प्रयोग जल का ही भक्षण करता है, अथवा, वायु का ही भक्षण करता है, इन अर्थों में पर्यवसित होते हैं । यहाँ अर्थात्मक अवधारणा में 'एव' शब्द का प्रयोग निश्चयात्मकता को बताता है । जब शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को सिद्ध कहा जाता है तो यहाँ वह सिद्ध ही है, इस रूप में ग्रहण किया जायेगा । अन्य कार्य पदार्थ प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव की स्थिति में सिद्ध नहीं होते । (३) संज्ञा के रूप में प्रसिद्ध 'देवदत्त' इत्यादि शब्द अपने संक्षिप्त रूप 'दत्त' आदि से ही सम्पूर्ण अर्थ की प्रतीति करवा देते हैं क्योंकि सम्पूर्ण के लिए प्रयुज्यमान संज्ञा अपने अवयवों में भी सम्पृक्त हो जाती है । अपि च, एक सम्बन्धि ज्ञान अपने से सम्बद्ध अन्य वस्तु का भी स्मारक होता ही है । इसी प्रकार से 'दत्त' शब्द अपने से सम्बन्धित 'देव' शब्द का भी स्मरण करवाता है और 'देवदत्त' उस सम्पूर्ण अर्थ की प्रतीति होती है । और यह व्यवहार केवल संज्ञाओं में ही नहीं, अन्यत्रापि दृष्टिगत होता है । यहाँ भी 'सिद्ध' शब्द वस्तुतः सम्पूर्ण शब्द 'अत्यन्त सिद्ध' का लघु रूप है । ऐसी स्थिति में सिद्ध शब्द नित्य वस्तु का ही पर्याय हो सकता है, कार्य पदार्थ का नहीं ।
४० महाभाष्यम् (४) अपि च, इस प्रकार के सन्दिग्ध पदों का व्याख्यान करके उनके विशिष्ट और प्रासङ्गिक अर्थ को ग्रहण करना चाहिए । सन्देहमात्र के ही उत्पन्न होने पर कोई लक्षण अलक्षण नहीं बन जाता । प्रमाणान्तर से उसके विशिष्ट अर्थ का विनिश्चय करना चाहिए । एवमेव 'सिद्ध' शब्द यहाँ नित्य का पर्यायवाची है, इसकी प्रतीति व्याख्यान से की जा सकती है, सिद्ध शब्द के प्रयोग को ही अनुचित कह देना उचित नहीं । मूलम् — किं पुनरनेन वर्ण्येन । किं न महता कण्ठेन नित्यशब्द एवोपात्तः यस्मिन्नुपादीयमानेऽसंदेहः स्यात् ? माङ्गलिक आचार्यो महतः शास्त्रौघस्य मङ्गलार्थं सिद्धशब्दमादितः प्रयुङ्क्ते । मङ्गलादीनि हि शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरुषाणि च भवन्ति, आयुष्यत्पुरुषाणि चाध्येतारश्च सिद्धार्था यथा स्युरिति । अयं खलु नित्यशब्दो नावश्यं कूटस्थेष्वविचालिषु भावेषु वर्तते । किं तर्हि ? आभीक्ष्ण्येऽपि वर्तते । तद्यथा नित्यप्रहसितो, नित्यप्रजल्पित इति । यावता- ऽभीक्ष्ण्येऽपि वर्तते तत्राप्यनेनैवार्थः स्यात् — "व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्नहि सन्देहा- दलक्षणम्" इति । पश्यति त्वाचार्यो मङ्गलार्थश्चैव सिद्धशब्द आदितः प्रयुक्तो भविष्यति, शक्ष्यामि चनं नित्यपर्यायवाचिनं वर्णयितुमिति । अतः सिद्धशब्द एवोपात्तो न नित्यशब्द इति । प्रदीपः — वर्ण्येनेति । प्रयत्नव्याख्यातव्येनेत्यर्थः । माङ्गलिक इति । अगर्हिता- भीष्टार्थसिद्धिर्मङ्गलं तत्प्रयोजन आचार्यो माङ्गलिकः । प्रथन्त इति । अध्ययनस्या- विच्छेदात् । वीरपुरुषाणीति । श्रोतॄणां परैरपराजयात् । आयुष्यत्पुरुषाणीति । शास्त्रानुष्ठाने धर्मोपचयादायुर्वर्धनात् । सिद्धार्था इति । अध्ययननिवृत्तिरेव तेषां सिद्धिः । नावश्यमिति । ततश्चाभीक्ष्ण्येन ये शब्दाः प्रयुज्यन्ते आगोपालाङ्गनं तेषामेवा- न्वाख्यानं स्याद् न विरलप्रयोगाणाम् । विनापि च क्रियापदप्रयोगेणाभीक्ष्ण्य- वृत्तिर्नित्यशब्दः प्रयुज्यते । यथा आश्चर्यमनित्ये नित्यवीप्सयोरिति । अनुवाद — फिर इस प्रयत्नव्याख्यातव्य (सिद्ध शब्द से) क्या प्रयोजन ? क्यों नहीं खुले गले से नित्य शब्द का ही पाठ किया गया जिसके उपादान से सन्देह ही नहीं होता ? माङ्गलिक आचार्य महान् शास्त्रसमुदाय के मङ्गल के लिए सिद्ध शब्द का आदि में प्रयोग करता है । (क्योंकि) आदि मङ्गल (लक्षणों से युक्त) शास्त्र प्रसिद्ध होते हैं, (इनके ज्ञाता) वीर पुरुष होते हैं और दीर्घायु होते हैं, अथ च (उनके) पढ़ने वाले सिद्धार्थ होते हैं । यह नित्य शब्द भी आवश्यक रूप से कूटस्थ और अविचालि भावों में प्रयुक्त नहीं होता ।
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ४१ तो (फिर) कहाँ (होता है) ? 'आवृत्ति' अर्थ में भी आता है । जैसे कि नित्य हँसता (बहुत अधिक हँसता) है, नित्य बोलता है (बहुत बोलता है) इत्यादि । जब (नित्य शब्द) आभीक्ष्ण्य में प्रयुक्त होता, तब भी "व्याख्यान से विशेष प्रतिपत्ति होती है, सन्देह से (लक्षण) अलक्षण नहीं हो जाता," इस नियम से ही अर्थ (सिद्ध हो सकता) है । आचार्य ने देखा (विचार किया) कि मङ्गलार्थक शब्द आदि में प्रयुक्त हो जायेगा और (मैं) इसे नित्य का पर्यायवाची भी वर्णित कर सकूँगा । इसीलिए सिद्ध शब्द का प्रयोग किया है, नित्य शब्द का नहीं । उषा :—"सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" इस वार्त्तिक में 'सिद्ध' शब्द को यद्यपि यथाकथमपि नित्य का पर्यायवाची सिद्ध किया जा सकता है तथापि यह प्रयत्न- व्याख्यातव्य अवश्य है तथा सन्देह को उत्पन्न करता है । इसके स्थान पर नित्य शब्द इस सन्देह की निवृत्ति कर सकता है, अतः सिद्ध के स्थान पर स्फुट रूप से नित्य शब्द का ही प्रयोग किया जाना चाहिए था । सिद्धान्तों के अनुसार 'सिद्ध' शब्द का प्रयोग यहाँ मङ्गलाचरण के लिए किया गया है, क्योंकि भारतीय मान्यता के अनुसार आदि में मङ्गलाचरण से युक्त शास्त्र प्रसिद्धि को प्राप्त होते हैं । श्रोता अथवा पाठक अपराजय को प्राप्त करते हैं, शास्त्रानुष्ठान से धर्मलाभ करके दीर्घायु होते हैं तथा अध्ययन परिसमाप्ति रूप अर्थ (प्रयोजन) को सिद्ध करते हैं । मङ्गलाचरण के अनुष्ठान से विघ्नों का नाश होता है, अत एव ग्रन्थ की निर्विघ्न परिसमाप्ति भी हो पाती है । यद्यपि कोई श्रुति मङ्गलाचरण का विधान नहीं करती तथापि शिष्टाचार परम्परा से यह मान्यता अविच्छिन्न चली आ रही है । अपि च, जिन ग्रन्थों के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण किया गया है, वे निर्विघ्न परिसमाप्त हो गये हैं, उन्हें देखकर इस विषय में अनुमान किया जा सकता है । इसके अपवाद के रूप में, जहाँ मङ्गलाचरण होने पर भी ग्रन्थ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ, वहाँ इसका कारण यह हो सकता है कि ग्रन्थ में विघ्न मङ्गलाचरण के अनुपात से अधिक थे और इसके विपरीत जहाँ मङ्गलाचरण के बिना ही ग्रन्थ निर्विघ्न समाप्त हो गया है, वहाँ सम्भवतः ग्रन्थकार ने बाहर ही मङ्गलाचरण कर लिया था । अपि च, नित्य शब्द भी केवल मात्र अविनाशी पदार्थों को नहीं कहता, प्रत्युत सिद्ध शब्द जिस प्रकार से नित्य के अतिरिक्त अन्य (अनित्य) अर्थ को भी अभिव्यक्त करता था, नित्य शब्द भी इसके अतिरिक्त आभीक्ष्ण्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ देखा जाता है । यद्यपि इस स्थिति में भी व्याख्यान से विशिष्ट अर्थ का प्रतिपादन किया जा सकता था तथापि सिद्ध शब्द का प्रयोग ही यहाँ अधिक उपयुक्त है । क्योंकि इस शब्द का प्रयोग एक ओर मङ्गलाचरण तथा दूसरी ओर नित्य की पर्यायवाचकता दोनों का युगपत् आख्यान कर पाने में समर्थ है ।
४२ महाभाष्यम् मूलम्—अथ कं पुनः पदार्थं मत्वैष विग्रहः क्रियते—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति ? आकृतिमित्याह । कुत एतत् ? आकृतिर्हि नित्या द्रव्यमनित्यम् । अथ द्रव्ये पदार्थे कथं विग्रहः कर्त्तव्यः ? सिद्धे शब्देऽर्थसम्बन्धे चेति । नित्यो ह्यर्थवतामर्थैरभिसम्बन्धः । प्रदीपः—अर्थ सम्बन्धे चेति । द्रव्यपक्षे द्रव्यस्यानित्यत्वादर्थग्रहणं सम्बन्ध- विशेषणार्थमुपात्तम् । अनित्येऽर्थे कथं सम्बन्धस्य नित्यतेति चेद्, योग्यतालक्षणत्वा- त्सम्बन्धस्य । तस्याश्च शब्दाश्रयत्वाच्छब्दस्य नित्यत्वाददोषः । अनुवाद—फिर किसे पदार्थ मानकर (द्रव्य अथवा आकृति को) यह विग्रह किया जाता है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के सिद्ध (नित्य) होने पर ? आकृति को, ऐसा (वैयाकरण) कहता है । यह कैसे (कहा जाता है) ? क्योंकि आकृति नित्य है, द्रव्य अनित्य । फिर द्रव्य को पदार्थ मानकर कैसे विग्रह करना चाहिए ? शब्द और अर्थ सम्बन्ध के सिद्ध होने पर । शब्दों का अर्थों के साथ सम्बन्ध नित्य है । उषा—वैयाकरण आकृति (जाति) और द्रव्य दोनों को ही पद के अर्थ के रूप में स्वीकार करते हैं । अतः "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" इस वार्त्तिक में 'सिद्ध' शब्द का अर्थ 'नित्य' स्वीकार कर लेने पर यह प्रश्न उठता है कि द्रव्य रूप अर्थ को नित्य माना जाता है या जाति रूप अर्थ को, अर्थात् अर्थ नित्यता की स्थिति में गो द्रव्य नित्य हैं, अथवा गोत्व जाति । जाति को पदार्थ मानने की स्थिति में कोई आपत्ति नहीं हो सकती । जाति नित्य है, द्रव्य अनित्य । एक गो के नष्ट हो जाने पर भी गोत्व धर्म नष्ट नहीं होता । अत एव द्रव्य को पदार्थ मानने की स्थिति में विवेच्य वार्त्तिक का विग्रह "सिद्धे शब्दे, अर्थसम्बन्धे च" इस प्रकार करना होगा । अर्थात् शब्द और उसका अर्थ के साथ सम्बन्ध नित्य है । इसे ही दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि नित्य शब्द का अनित्य अर्थ के साथ नित्य सम्बन्ध है । यदि अर्थ अनित्य है तो शब्द के साथ उसका सम्बन्ध नित्य कैसे हो सकता है, इस प्रश्न का समाधान करते हुए नागेश ने कहा है कि नष्ट और भावी अर्थों का
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ४३ भी शब्द के द्वारा बोध लोकव्यवहार में देखा जाता है, अतः बौद्ध शब्द का बौद्ध अर्थ के साथ सम्बन्ध नित्य है । मूलम्—अथवा द्रव्य एव पदार्थ एष विग्रहो न्याय्यः—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति । द्रव्यं हि नित्यमाकृतिरनित्या । कथं ज्ञायते ? एवं हि दृश्यते लोके मृत्कयाचिदाकृत्या युक्ता पिण्डो भवति, पिण्डाकृतिमुप- मृद्य घटिकाः क्रियन्ते, घटिकाकृतिमपमृद्य कुण्डिकाः क्रियन्ते । तथा सुवर्णं कयाचिदा- कृत्या युक्तं पिण्डो भवति, पिण्डाकृतिमपमृद्य रुचकाः क्रियन्ते, रुचकाकृतिमपमृद्य कटकाः क्रियन्ते । कटकाकृतिमपमृद्य स्वस्तिकाः क्रियन्ते । पुनरावृत्तः सुवर्णपिण्डः पुनरपरयाकृत्या युक्तः खदिराङ्गारसवर्णे कुण्डले भवतः । आकृतिरन्या चान्या च भवति, द्रव्यं पुनस्तदेव । आकृत्युपमर्देन द्रव्यमेवावशिष्यते । प्रदीपः — द्रव्यं हि नित्यमिति । असत्योपाध्यवच्छिन्नं ब्रह्मतत्त्वं द्रव्यशब्द- वाच्यमित्यर्थः । आकृतिरिति । संस्थानम् । ब्रह्मदर्शने च गोत्वादिजातेरप्यसत्यत्वाद- नित्यत्वम्, “आत्मैवेदं सर्वम्” इति श्रुतिवचनात् । अनुवाद — अथवा द्रव्य को ही पदार्थ मानकर यह विग्रह (करना) न्याय्य है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के नित्य होने पर । क्योंकि द्रव्य नित्य है, आकृति अनित्य । (यह) कैसे जाना जाता है ? क्योंकि ऐसा लोक में देखा जाता है कि मिट्टी किसी आकृति से युक्त पिण्ड होती है, पिण्ड की आकृति को मिटाकर घड़ियां बनाई जाती हैं, घड़ियों की आकृति को मिटाकर कुण्डिकायें बनाई जाती हैं । उसी प्रकार सुवर्ण किसी आकृति से युक्त पिण्ड होता है, पिण्ड की आकृति को मिटाकर रुचक (आभूषण विशेष) बनाये जाते हैं, रुचक की आकृति को मिटाकर कटक (कड़े) बनाये जाते हैं । कड़ों की आकृति को मिटाकर स्वस्तिक बनाये जाते हैं । फिर लौटकर सुवर्णपिण्ड बना हुआ सोना फिर दूसरी आकृति से युक्त हुआ खदिराङ्गार के समान दो कुण्डल हो जाते हैं । आकृति और-और होती जाती है । (बदलती रहती है), द्रव्य फिर भी वही है । आकृति के नाश होने पर द्रव्य ही शेष रह जाता है । उषा—शब्द के द्वारा यदि द्रव्यरूप अर्थ को भी वाच्य माना जाये तो भी शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध तीनों की नित्यता सिद्ध की जा सकती है, अर्थात् द्रव्य रूप में भी अर्थ नित्य हो सकता है । द्रव्य की नित्यता और आकृति की अनित्यता को सिद्ध करने के लिए पतञ्जलि ने एक दृष्टान्त प्रस्तुत किया है कि मिट्टी किसी एक आकृति से युक्त होकर पिण्ड बन जाती है, उसे ही तोड़कर फिर घटिका, कुण्डिका आदि विभिन्न आकृति रूपों में परिणत किया जा सकता है । सुवर्णपिण्ड को भी पुनः पुनः तोड़कर रुचक, कटक, कुण्डल आदि विभिन्न आकृति
४४ महाभाष्यम् रूप प्रदान किये जा सकते हैं । इस प्रक्रिया में आकृति रूप निरन्तर परिवर्तनशील और अनित्य रहते हैं। इन विभिन्न असत्य उपाधियों से अवच्छिन्न ब्रह्म रूप द्रव्य- तत्त्व नित्य रहता है। उस तत्त्व के दर्शन को जानने पर गोत्व आदि विभिन्न जातिरूप असत्य और अनित्य होकर रह जाते हैं। "आत्मैवेदं सर्वम्" इत्यादि श्रुति- वाक्य इसमें प्रमाण हैं । मूलम् —आकृतावपि पदार्थ एष विग्रहो न्याय्यः—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति । ननु चोक्तम्—आकृतिरनित्येति । नैतदस्ति । नित्याऽऽकृतिः । कथम् ? न क्वचिदुपरतेति कृत्वा सर्वत्रोपरता भवति । द्रव्यान्तरस्था तूपलभ्यते । अथवा नेदमेव नित्यलक्षणम्—ध्रुवं कूटस्थमविचाल्यनपायोपजनविकार्य- नुत्पत्त्यवृद्ध्यव्यययोगि यत्तन्नित्यम् इति । तदपि नित्यं यस्मिंस्तत्त्वं न विहन्यते । किं पुनस्तत्त्वम् ? तद्भावस्तत्त्वम् । आकृतावपि तत्त्वं न विहन्यते । अथवा किं न एतेन—इदं नित्यमिदमनित्यमिति यन्नित्यं तं पदार्थं मत्वैष विग्रहः क्रियते—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति । प्रदीपः—न क्वचिदुपरतेति । अनभिव्यक्तेत्यर्थः । अद्वैतेन लोके व्यवहारा- भावाद् व्यवहारे चाकृतेरेकाकारपरामर्शहेतुत्वान्नित्यत्वम् । अथवेति । असत्यत्वेपि तत्त्वतो लोकव्यवहाराश्रयेण जातेर्नित्यत्वं साध्यते । त्रिविधा चानित्यता, संसर्गा- नित्यता यथा—स्फटिकस्य लाक्षाद्युपधाने स्वरूपतिरोधानेन पररूपभासः । परिणा- मानित्यता यथा बदरीफलस्य श्यामतातिरोभावे लौहित्याविर्भावः । प्रध्वंसानित्यता सर्वात्मना विनाशः । एतत्त्रिविधानित्यताप्रतिषेधेन नित्यतां प्रतिपादयितुमुक्तं ध्रुवमित्यादि । तत्र ध्रुवम् कूटस्थमिति संसर्गानित्यता परिहृता, अविचालीति परि- णामानित्यता, अनपायेत्यादिना प्रध्वंसानित्यता । यन्नित्यमिति । बुद्धिप्रतिभासः शब्दार्थो यदा यदा शब्द उच्चारितस्तदा तदाऽर्थाकारा बुद्धिरुपजायते इति प्रवाह- नित्यत्वादर्थस्य नित्यत्वमित्यर्थः । अनुवाद—आकृति को भी पदार्थ मानने पर यह विग्रह न्याय्य है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के सिद्ध रहने पर । और (अभी) जो कहा था (कि) आकृति अनित्य है । ऐसा नहीं है । आकृति नित्य है । कैसे (कहा) ? कहीं (एक स्थान पर) विलय होकर सर्वत्र विलय नहीं हो जाती । अन्य
प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ४५ द्रव्य में तो उपलब्ध होती ही है । अथवा यह नित्य होने का लक्षण नहीं है (कि) जो ध्रुव, स्वरूप में अवस्थित नित्य सुस्थित, परिणाम, विपरिणाम, विकाररहित, उत्पत्तिरहित, वृद्धिरहित और क्षयरहित हो, वही नित्य है । वह भी नित्य है, जिसमें तत्त्व नष्ट नहीं होता । फिर तत्त्व क्या है ? उस वस्तु का (स्व) भाव तत्त्व है । आकृति में भी तत्त्व नष्ट नहीं होता । अथवा इससे क्या कि यह नित्य है, अथवा यह अनित्य है । जो भी नित्य है, उसे पदार्थ मानकर यह विग्रह किया जाता है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के सिद्ध होने पर । उषा—पद का अर्थ आकृतिरूप मानकर भी शब्द, अर्थ और सम्बन्ध इन तीनों की नित्यता को सिद्ध किया जा सकता है। यहाँ 'आकृति' पद का अर्थ 'जाति' है । 'अपि' शब्द के प्रयोग से द्रव्य का ग्रहण किया गया है अर्थात् द्रव्य रूप में तो अर्थ नित्य है ही, जाति रूप में भी नित्य है । किसी एक द्रव्य में अनभिव्यक्त होती हुई भी जाति सर्वत्र अप्रत्यक्ष नहीं हो जाती । एक स्थान पर घटिका की आकृति नष्ट होकर भी सर्वत्र नष्ट नहीं होती । अन्य पदार्थों में उसका सत्त्व उसकी नित्यता बताता है । जाति की व्यञ्जिका आकृति व्यवहार काल में उत्पन्न और नष्ट होते हुए भी प्रकारान्तर से नित्य है । संसर्गानित्यता, परिणामानित्यता और प्रध्वंसानित्यता के रूप में अनित्यता तीन प्रकार की मानी गई है । लाक्षा आदि पदार्थों के संसर्ग से स्फटिक के स्वरूप का तिरोधान हो जाता है, यह संसर्गानित्यता है । बदरी आदि फलों में श्यामता का तिरोभाव होकर लौहित्य का आविर्भाव परिणामानित्यता है तथा वस्तु का सर्वात्मना विनाश प्रध्वंसानित्यता है । केवल मात्र इस तीन प्रकार की अनित्यता से रहित होना ही नित्यता का लक्षण नहीं है । इस प्रकार की नित्यता ब्रह्म से सम्बद्ध है, इसे कूटस्थ नित्यता कहते हैं । पदार्थ एक स्थान पर नष्ट होकर भी भावरूप में अन्यत्र वर्तमान रहता है, अतः उसमें प्रवाहनित्यता है । क्योंकि उसका नाश हो जाने पर भी उसका धर्म नष्ट नहीं होता । शब्द का उच्चारण तत्तदाकारा अर्थभावना को बुद्धि में व्यक्त कर देता है अतः पदार्थ को केवल बाह्य रूप में न मानकर बौद्ध रूप में स्वीकार करने से उसकी नित्यता स्वयमेव सिद्ध हो जाती है । शशशृङ्ग इत्यादि पदार्थ भी इसीलिए स्वरूपतः सिद्ध न होने पर बुद्धि में प्रतिभासित होने के कारण बोध के विषय बनते हैं । अतएव चाहे द्रव्य को पदार्थ मानकर “सिद्धे शब्दार्थ सम्बन्धे” का विग्रह
४६ महाभाष्यम् किया जाये अथवा जाति को पदार्थ मानकर, दोनों ही दृष्टियाँ उपयुक्त हैं । पाणिनि ने दोनों प्रकार के अर्थों की नित्यता को स्वीकार किया है । मूलम्—कथं पुनर्ज्ञायते—सिद्धः शब्दोऽर्थः सम्बन्धश्चेति । लोकतः । यल्लोकेऽर्थमर्थमुपादाय शब्दान्प्रयुञ्जते, नैषां निर्वृत्तौ यत्नं कुर्वन्ति । ये पुनः कार्या भावा निर्वृत्तौ तावत्तेषां यत्नः क्रियते । तद्यथा—घटेन कार्यं करिष्य- न्कुम्भकारकुलं गत्वाह—कुरु घटं कार्यमनेन करिष्यामीति । न तावच्छब्दान्प्रयुयुक्ष- माणो वैयाकरणकुलं गत्वाह—कुरु शब्दान्प्रयोक्ष्य इति । तावत्येवार्थमुपादाय शब्दा- न्प्रयुञ्जते । प्रदीपः—लोकत इति । अन्यथा कार्येषु लोकव्यवहारः, अन्यथा नित्येषु । शाब्दश्च व्यवहारोऽनादिवृद्धव्यवहारपरम्पराव्युत्पत्तिपूर्वक इति शब्दादीनां नित्यत्वम् । घटादयस्त्वर्थक्रियार्थिभिरन्यत आनीयन्त उत्पादविनाशयुक्ताश्चोपलभ्यन्ते । नैवं शब्दादयः । तावत्येवार्थमिति । बुद्ध्या वस्तु निरूप्येत्यर्थः । अनुवाद—फिर (यह) कैसे जाना जाता है कि शब्द, अर्थ और सम्बन्ध नित्य है । लोक से । क्योंकि लोक में तत्तदर्थ को कहने के लिए शब्दों का प्रयोग करते हैं । (परन्तु) इनके निर्माण में यत्न नहीं करते । जो कार्य भाव हैं उनके निर्माण में यत्न किया जाता है । जैसे कि घड़े से काम करना चाहता हुआ कुम्भकार कुल में जाकर कहता है—'घड़ा बनाइये, मैं इससे कार्य करूंगा,' उसी प्रकार शब्दों के प्रयोग की इच्छा करता हुआ वैयाकरणकुल में जाकर नहीं कहता—'शब्द बनाओ, मैं प्रयोग करूँगा । वैसे ही अर्थ को लेकर शब्दों का प्रयोग करता है । उषा—शास्त्र लोक से अनुप्राणित होता है अथवा लोक शास्त्र से अनुशिष्ट, इसी प्रश्न को मन में रखकर भाष्यकार ने यह निर्णय दिया है कि शब्द, अर्थ और उसके सम्बन्ध की नित्यता का प्रमाण लोकव्यवहार है। शब्द से अर्थबोधन का व्यवहार अनादिकाल से चला आ रहा है, व्याकरण तो केवल उस लोकव्यवहार का अनुशासन मात्र करता है। अतः लोक प्रधान है, शास्त्र गौण । इसी बात को पुष्ट करने के लिए पतञ्जलि ने एक सुन्दर आख्यान प्रस्तुत किया है। घट का प्रयोग करने की इच्छा से जिस प्रकार व्यक्ति कुम्भकार के पास जाकर घट ले आता है, उसी प्रकार शब्दों का प्रयोग करने का इच्छुक व्यक्ति वैयाकरण के पास जाकर शब्दों की याचना नहीं करता प्रत्युत वह अपनी इच्छा से लोक में प्रचलित शब्दों का प्रयोग कर लेता है। व्याकरण उसके विषय में शुद्ध और अशुद्ध का विवेचन करके धर्म की प्रतिष्ठापना मात्र करता है। न केवल पतञ्जलि प्रत्युत उनसे पूर्व स्वयं पाणिनि लोकव्यवहार को ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण के रूप में स्वीकार कर चुके थे—
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ४७ प्रधानप्रत्ययार्थवचनमर्थस्यान्यप्रमाणत्वात् । इसी की व्याख्या करते हुए काशिकाकार ने कहा है— “अन्यो लोकः । शब्दैरर्थाभिधानं स्वाभाविकम् । लोकत एवार्थगतेः ।” मूलम्— यदि तर्हि लोक एषु प्रमाणं, किं शास्त्रेण क्रियते ? *लोकतोऽर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः । लोकतोऽर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः क्रियते । किमिदं धर्मनियम इति । धर्माय नियमो धर्मनियमः, धर्मार्थो वा नियमो धर्मनियमः, धर्मप्रयोजनो वा नियमो धर्मनियमः । प्रदीपः—अत्र भाष्यकारेण सम्भवन्तीमप्येकवाक्यतामनाश्रित्य वाक्यत्रयं व्यवस्थापितम् । सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे शास्त्रं प्रवृत्तमित्येकं वाक्यम् । कथं ज्ञायत इति प्रश्ने लोकतो ज्ञायते इति द्वितीयम् । लोकत इत्यस्यावृत्त्या लोकतोऽर्थप्रयुक्ते इत्यादि तृतीयम् । शब्दप्रयोग इति प्रयोगग्रहणेन “प्रयोगाद्धर्मो न तु ज्ञानमात्राद्” इत्युक्तं भवति । अर्थेनात्मप्रत्यायनाय प्रयुक्तोऽर्थप्रयुक्तः । धर्माय नियम इति । धर्मार्थत्वान्नियम एव धर्मशब्देनाभिधीयत इति कर्मधारयः समासः । धर्मप्रयोजन इति । लिङादिविषयेण नियोगाख्येन धर्मेण प्रयुक्त इत्यर्थः । अनुवाद—यदि लोक इसमें प्रमाण है तो शास्त्र से क्या किया जाता है ? लोक में अर्थ विशेष में प्रयुक्त शब्द के प्रयोग में शास्त्र से धर्म का नियम । लोक में अर्थ विशेष में प्रयुक्त (प्रसिद्ध) शब्द के प्रयोग में शास्त्र से धर्म का नियमन किया जाता है । धर्म के लिए धर्मनियम है अथवा धर्मरूप नियम धर्म नियम है अथवा धर्म का प्रयोजक नियम धर्मनियम है । उषा—“शब्दार्थ सम्बन्धों की नित्यता यदि लोक व्यवहार से ही सिद्ध है है तो शास्त्र निष्प्रयोजन होकर रह जाता है", पूर्वपक्षी की इस शङ्का का समाधान प्रकृत वार्तिक से किया गया है । लोक में अर्थ के द्वारा आत्मप्रत्यायन के लिए प्रयुक्त शब्दों का शास्त्र के द्वारा धर्मनियम किया जाता है । “शब्दप्रयोगे" में प्रयोग शब्द का ग्रहण करके यह निर्देश किया गया है कि साधु शब्दों के व्यवहार में प्रयोग से धर्म की प्राप्ति होती है, केवल ज्ञान से नहीं । 'धर्मनियमः' पद की भाष्यकार ने तीन प्रकार से व्युत्पत्ति प्रदर्शित की है— (१) धर्माय नियमः (२) धर्मार्थो नियमः (३) धर्मप्रयोजनो नियमः । प्रदीपकार के अनुसार प्रथम व्युत्पत्ति में चतुर्थी विभक्ति तादर्थ्य सम्बन्ध को बताने के लिए है, अतः 'धर्म' पद 'अपूर्व' अर्थ में पर्यवसित होता है । धर्मार्थ ही होने के कारण द्वितीय व्युत्पत्ति में नियम को ही 'धर्म' शब्द से कहा गया है, अतः यहाँ कर्म-
धारय समास होगा—"धर्मश्चासौ नियमः।" तृतीय व्युत्पत्ति में धर्म का अर्थ नियोग है । उद्योतकार ने इन व्युत्पत्तियों को प्रकारान्तर से भी प्रदर्शित किया है । "धर्माय नियमः" इससे, प्रत्यवाय-परिहार रूप धर्म के लिए यह नियम है, ऐसा ग्रहण किया जाता है, क्योंकि असाधु शब्द के प्रयोग से अधर्म होता है। "धर्मार्थो नियमः" इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'धर्म' का अर्थ यागादि है। "नानृतं वदेत्" इत्यादि कर्माङ्गनिषेधक वाक्य यागादि का अङ्ग होने के कारण याग ही होते हैं और उन्हें 'धर्म' पद से कहा जाता है। तृतीय व्युत्पत्ति में 'धर्म' पद से 'अपूर्व' अर्थ का सूचन है । मूलम् - *यथा लौकिकवैदिकेषु । प्रियतद्धिता दाक्षिणात्याः —यथा लोके वेदे चेति प्रयोक्तव्ये या लौकिक- वैदिकेष्विति प्रयुञ्जते । अथवा युक्त एवायं तद्धितः । यथा लौकिकेषु वैदिकेषु च कृतान्तेषु । लोके तावद् 'अभक्ष्यो ग्राम्यकुक्कुटः, अभक्ष्यो ग्राम्यसूकर' इत्युच्यते । भक्ष्यं च नाम क्षुत्प्रतिघातार्थमुपादीयते । शक्यं चानेन श्वमांसादिभिरपि क्षुत्प्रति- हन्तुम् । तत्र नियमः क्रियते—इदं भक्ष्यमिदमभक्ष्यमिति । तथा—खेदात्स्त्रीषु प्रवृत्ति- र्भवति । समानश्च खेदविगमो गम्यायां चागम्यायां च । तत्र नियमः क्रियते— इयं गम्येयमगम्येति । प्रदीपः-प्रियतद्धिता इति । नायमपशब्दः किन्तु ये लोकवेदयोर्भवा अवय- वास्ते लोकवेदशब्दाभ्यामभिधातुं शक्यन्ते । आधाराधेयभावकल्पनया तु तद्धित- प्रयोगः प्रियतद्धितनिमित्तः । यथा कश्चिद्वनस्पतय इति प्रयुङ्क्ते कश्चिद्वानस्पत्य- मिति समूहप्रत्ययान्तम् । अथवेति । नात्रावयवावयविविभागः, किं तर्हि लोकवेदव्यति- रिक्तसिद्धान्तशब्दार्थोभयरूप इत्यर्थः । लौकिकः स्मृत्युपनिबद्धः । वैदिकः श्रुत्युपनि- बद्धः । शक्यं चानेनेति । शकेः कर्मसामान्ये लिङ्गसर्वनामनपुंसकयुक्ते कृत्यप्रत्ययः । ततः पदान्तरसम्बन्धादुपजायमानमपि स्त्रीत्वं बहिरङ्गत्वादन्तरङ्गसंस्कारं न बाधत इति शक्यं क्षुदित्युक्तम् । यदा तु पूर्वमेव विशेषविवक्षा तदा शक्या क्षुदिति भवत्येव । यदा तु प्रतिघातस्यैव क्षुत्कर्म शकेस्तु प्रतिघातस्तदा क्षुधं प्रतिहन्तुं शक्यमिति भवति । खेदादिति । खेदयतीति खेदो रागः, इन्द्रियनियमासामर्थ्यं वा खेदः । अनुवाद - जैसे लौकिक और वैदिक (उदाहरणों) में । दाक्षिणात्य (लोग) तद्धितप्रिय होते हैं, जैसे 'लोके', 'वेदे' ऐसा प्रयोग करने के स्थान पर "लौकिकवैदिकेषु' ऐसा प्रयोग करते हैं। अथवा यहाँ तद्धित युक्त ही है। जैसे लोकप्रसिद्ध तथा वेदप्रसिद्ध सिद्धान्तों में । जैसे लोक में "ग्राम्यकुक्कुट अभक्ष्य है, ग्राम्यसूकर अभक्ष्य है" ऐसा कहा जाता है। भोज्य (का ग्रहण) क्षुधानिवृत्ति के लिए उपादेय है और क्षुधानिवृत्ति
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ४६ कुक्कुर के मांस से भी की जा सकती है। वहाँ नियम किया जाता है—यह भक्ष्य है, यह अभक्ष्य है । उसी प्रकार राग से स्त्रियों में प्रवृत्ति होती है । गम्या और अगम्या में रागनिवृत्ति तो समान ही है । वहाँ नियम किया जाता है—यह गम्या है, यह अगम्या है । उषा—लोक में अर्थ के निमित्त शब्द का प्रयोग होने पर शास्त्र धर्म का नियमन करता है, जिस प्रकार से लोक और वेद में । यहाँ वार्त्तिकस्थ "लौकिकवैदिकेषु" शब्द को उठाकर भाष्यकार ने यह कहा है कि यहाँ वार्त्तिककार का दाक्षिणात्य होना सूचित होता है क्योंकि वे निरर्थक शब्दाडम्बर में रुचि रखते हैं । “समुदायेषु प्रवृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि वर्त्तन्ते” इस नियम से ‘लोक’ और ‘वेद’ शब्दों की समुदाय और उनके अवयव दोनों में ही समान रूप से प्रवृत्ति हो सकती है । अतः यहाँ लोक और वेद के अवयवों का बोध करवाने की इच्छा से तद्धित प्रत्यय अनावश्यक ही है । तथापि वार्त्तिककार लोक और वेद समुदाय तथा उनके अवयव में, जो वस्तुतः अभिन्न हैं, भेद की कल्पना करके “तत्र भवः” इस अर्थ में ठञ् प्रत्यय करते हैं । एक अन्य दृष्टि से यहाँ अवयव-अवयविविभाग न मानकर आधाराधेयभाव को भी भाष्यकार ने उचित माना है। एवं च “तत्र भवः” से तद्धित प्रत्यय उपयुक्त ही सिद्ध होता है । ऐसी स्थिति में इसका अर्थ होगा—‘लोक और वेद में वर्त्तमान सिद्धान्त ।’ यहाँ वैदिक से अभिप्राय है—“श्रुत्युपनिबद्ध” तथा लौकिक से अभिप्राय है—“स्मृत्युपनिबद्ध ।” स्मृतिवाक्यों में इस प्रकार के नियम किये जाते हैं कि अमुक वस्तु भक्ष्य है अमुक अभक्ष्य अथवा अमुक प्रकार की स्त्री समागम के योग्य है, अमुक प्रकार की अयोग्य । भक्षण क्षुत्प्रतिघात के लिए तथा स्त्री समागम राग के कारण किया जाता है । क्षुत्प्रतिघात किसी भी वस्तु का भक्षण करके किया जा सकता है, एवमेव रागनिवृत्ति किसी भी स्त्री से समागम करके हो सकती है। इस प्रकार का स्मृत्युपदिष्ट नियमन अभ्युदयकारी तथा श्रेयस्कर होता है । मूलम्—वेदे खल्वपि—“पयोव्रतो ब्राह्मणो यवागूव्रतो राजन्य आमिक्षवतो वैश्यः” इत्युच्यते । व्रतं च नामाभ्यवहारार्थमुपादीयते । शक्यं चानेन शालिमांसादी- न्यपि व्रतयितुम् । तत्र नियमः क्रियते । तथा “बैल्वः खादिरो वा यूपः स्याद्,” इत्युच्यते । यूपश्च नाम पश्वनुब- न्धार्थमुपादीयते । शक्यं चानेन यत्किञ्चिदेव काष्ठमुच्छ्रित्यानुच्छ्रित्य वा पशुरनु- बन्धुम् । तत्र नियमः क्रियते ।
५० महाभाष्यम् तथा “अग्नौ कपालान्याश्रित्यामन्त्रयते—भृगूणामङ्गिरसां धर्मस्य तपसा तप्यध्वम्” इति । अन्तरेणापि मन्त्रमग्निर्दहनकर्माकपालानि सन्तापयति । तत्र च नियमः क्रियते— एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवतीति । एवमिहापि समानायामर्थावगतौ शब्देन चापशब्देन च धर्मनियमः क्रियते— शब्देनैवार्थोऽभिधेयो नापशब्देनेति । एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवतीति । प्रदीपः —पयोव्रत इति । सत्यामर्थितायां पय एव व्रतयतीति नियमोऽयं न तु विधिः, अर्थित्वाभावे कारणाभावात् । समानायामिति । यद्यपि साक्षादपभ्रंशा न वाचकास्तथापि स्मर्यमाणसाधुशब्दव्यवधानेनार्थं प्रत्याययन्ति, केचिच्चापभ्रंशाः परम्परया निरूढिमागताः साधुशब्दानस्मारयन्त एवार्थं प्रत्याययन्ति । अन्ये तु मन्यन्ते —साधुशब्दवदपभ्रंशा अपि साक्षादर्थस्य वाचका इति । अनुवाद—वेद में भी “ब्राह्मण दूध का व्रत करे, क्षत्रिय यवागू का व्रत करे, वैश्य आमिक्षा का व्रत करे, ऐसा कहा जाता है। व्रत का उपादान अभ्यवहार (भोज्य नियमन) के लिए किया जाता है । शालिमांस आदि से भी यह व्रत किया जा सकता है। वहाँ नियम किया जाता है। उसी प्रकार “यूप बिल्व अथवा खैैर का होना चाहिए,” ऐसा कहा जाता है। यूप का उपादान पशु को बाँधने के लिए किया जाता है। किसी भी छिले अनछिले काष्ठ से पशु को बाँधा जा सकता है। वहाँ नियम किया जाता है । वैसे ही “अग्नि पर कपालों को रखकर मन्त्र पढ़ता है ‘भृगु और अङ्गिरसों के तेज से तपो’।” मन्त्र के बिना भी दहनकर्मा अग्नि कपालों को तपाती है, वहाँ नियम किया जाता है, (क्योंकि) ऐसा करना अभ्युदयकारी होता है । इसी प्रकार यहाँ भी शब्द और अपशब्द से समान अर्थावगति होने पर भी धर्म के लिए नियम किया जाता है—‘शब्द से ही अर्थ का अभिधान होना चाहिए, अपशब्द से नहीं । ऐसा किया जाना अभ्युदयकारी होता है ।” उषा—इसी प्रकार का विधान वेद में भी किया जाता है । किसी भी विधि से प्राप्यमाण अर्थों में भी श्रुति एक विशिष्ट नियम प्रदान करती है, क्योंकि ऐसा करने से मनुष्य अभ्युदय से युक्त होता है । इसी प्रकार से शब्द और अपशब्द दोनों के ही द्वारा अर्थ का अभिधान हो सकता है । ‘गो’ शब्द जिस प्रकार से सास्नादिमत्पदार्थ का बोध करता है, उसी प्रकार से यह बोध गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अपभ्रष्ट शब्दों से भी हो सकता है । परन्तु यह नियम किया जाता है कि साधु शब्द से ही अर्थ का अभिधान करवाना चाहिए, असाधु से नहीं । क्योंकि ऐसा करना कल्याणकारी होता है । भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में यही बात इन शब्दों में कही है— शिष्टेभ्य आगमात्सिद्धाः साधवो धर्मसाधनम् । अर्थप्रत्यायनाऽभेदे विपरीतास्त्वसाधवः ॥
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ५१ मूलम्—*अस्त्यप्रयुक्तः— सन्ति वै शब्दा अप्रयुक्ताः । तद्यथा—ऊष, तेर, चक्र, पेचेति । किम्तो यत्सन्त्यप्रयुक्ताः ? प्रयोगाद्धि भवाञ्छब्दानां साधुत्वमध्यवस्यति । य इदानीमप्रयुक्ता नामी साधवः स्युः । इदं तावद् विप्रतिषिद्धम्—यदुच्यते—'सन्ति वै शब्दा अप्रयुक्ता' इति । यदि सन्ति नाप्रयुक्ताः, अथाप्रयुक्ता न सन्ति, सन्ति चाप्रयुक्ताश्चेति विप्रतिषिद्धम् । प्रयुञ्जान एव खलु भवानाह—सन्ति शब्दा अप्रयुक्ता इति । कश्चेदानीमन्यो भव- ज्जातीयकः पुरुषः शब्दानां प्रयोगे साधुः स्यात् ? नैतद्विप्रतिषिद्धम् । सन्तीति तावद्ब्रूमः । यदेताञ्छास्त्रविदः शास्त्रेणा- नुविदधते । अप्रयुक्ता इति ब्रूमः यल्लोकेऽप्रयुक्ता इति । यदप्युच्यते— कश्चेदानीमन्यो भवज्जातीयकः पुरुषः शब्दानां प्रयोगे साधुः स्यादिति । न ब्रूमो- ऽस्माभिरप्रयुक्ता इति । किं तर्हि ? लोकेऽप्रयुक्ता इति । ननु च भवानप्यभ्यन्तरो लोके । अभ्यन्तरॊऽहं लोके, न त्वहं लोकः । प्रदीपः—अस्त्यप्रयुक्त इति । प्रयोगमूलत्वादस्याः स्मृतेरप्रयुक्तानामप्यन्वाख्या- नादप्रामाण्यमाशङ्कते । यथा घटादीनां विनाप्यर्थक्रियया सत्त्वं गम्यते नैवं शब्दानां, ते हि सर्वदा व्यवहाराय प्रयुज्यमानाः सन्तः सत्त्वेनावसीयन्त इत्याह—इदमिति । कश्चेदानीमिति । उपहासपरम् । उत्तरं तु शास्त्रदृष्ट्या प्रकृतिप्रत्ययादिसद्भावाद- नुमितसत्त्वाः, व्यवहारे तु न दृश्यन्त इत्युक्तम् । न त्वहं लोक इति । यथा लोकोऽर्थावगमाय शब्दान्प्रयुङ्क्ते नैवं मयैतेऽर्थे प्रयुक्ता अपि तु स्वरूपपदार्थका इत्यर्थः । अनुवाद—अप्रयुक्त (शब्दराशि) है— निश्चय ही अप्रयुक्त शब्द भी हैं, जैसे कि ऊष, तेर, चक्र, पेच इत्यादि । इससे क्या यदि (वे) अप्रयुक्त हैं । क्योंकि आप प्रयोग से ही शब्दों का साधुत्व निश्चय करते हैं। जो अब अप्रयुक्त हैं, सम्भवतः वे असाधु हों । यह तो (परस्पर) विरुद्ध है—जो कहा गया है—'शब्द हैं और अप्रयुक्त (भी) हैं । यदि हैं (तो) अप्रयुक्त नहीं हैं, यदि अप्रयुक्त हैं (तो) हैं नहीं, हैं (भी) और अप्रयुक्त (भी) हैं, यह परस्पर विरुद्ध है । प्रयोग करते हुए ही आप कह रहे हैं—'शब्द अप्रयुक्त हैं।' और कौन आप जैसा दूसरा पुरुष शब्दों के प्रयोग में कुशल होगा ।
५२ महाभाष्यम् यह परस्पर विरुद्ध नहीं हैं। 'हैं' ऐसा (हम) कह रहे हैं। क्योंकि शास्त्रज्ञ शास्त्र के द्वारा इनका विधान करते हैं। "अप्रयुक्त हैं" ऐसा भी कहते हैं क्योंकि लोक में अप्रयुक्त हैं। जो यह कहा गया है "आप जैसा कौन अन्य पुरुष शब्द के प्रयोग में कुशल होगा" (सो) हम यह नहीं कहते कि हमारे द्वारा अप्रयुक्त हैं। तो क्या (कहते हो) ? कि लोक में अप्रयुक्त हैं। आप भी तो लोक के भीतर हैं। मैं लोक के भीतर हूं, मैं (ही) लोक नहीं हूं। उषा—"अस्त्यप्रयुक्तः" यह वार्तिकांश भाष्यकार ने पूर्वपक्ष की स्थापना के लिए प्रस्तुत किया है। लोक में प्रयुक्त शब्दों के शास्त्र द्वारा नियमन की बात पहले की गई है। वहाँ यह निर्णय भी लिया गया है कि प्रयुज्यमान साधु शब्द धर्म का हेतु बनता है। एवम्, अप्रयुक्त शब्दों का असाधुत्व अनुमान से सिद्ध हो जाता है।' व्याकरण स्मृति जब अप्रयुक्त (असाधु) शब्दों का अन्वाख्यान करती है तो उसमें अप्रामाण्य की शंका उत्पन्न होती है। परन्तु सिद्धान्ती के मत में यह बात विप्रतिषिद्ध है। शब्दों का सत्त्व उनकी प्रायोगिक स्थिति में सम्भव हो सकता है, एवं च यदि शब्द हैं तो वे अप्रयुक्त नहीं हो सकते और यदि वे अप्रयुक्त हैं तो उनका सत्त्व भी सन्दिग्ध है। अपि च, स्वयमेव शब्द का प्रयोग करके उसे अप्रयुक्त कहना अपने आप में ही उपहासा- स्पद है। पूर्वपक्षी ने सिद्धान्ती के इस समाधान पर पुनः आक्षेप करते हुए अपने कथन को और स्पष्ट किया है। शब्द का सत्त्व शास्त्र के द्वारा विधान होने के कारण सिद्ध होता है, परन्तु लोक में उनका अप्रयोग व्याकरण-स्मृति पर प्रश्नचिह्न लगाता है। पूर्वपक्षी ने इन शब्दों का प्रयोग अवश्य किया है, परन्तु यह प्रयोग लोक में जिस अर्थ-सङ्क्रान्ति की भावना से होता है, उस दृष्टि से नहीं किया गया। उसने केवल स्वरूप स्पष्ट करने के लिए ही ऊष, तेर, चक्र और पेच शब्दों का उच्चारण किया है। मूलम्—* अस्त्यप्रयुक्त इति चेन्नार्थे शब्दप्रयोगात्— अस्त्यप्रयुक्त इति चेत् । तन्न । किं कारणम् । अर्थे शब्द-प्रयोगात् । अर्थे शब्दाः प्रयुज्यन्ते । सन्ति चैषां शब्दानांमर्था येष्वर्थेषु प्रयुज्यन्ते । *अप्रयोगः प्रयोगान्यत्वात् अप्रयोगः खल्वप्येषां शब्दानां न्याय्यः । कुतः ? प्रयोगान्यत्वात् । यदेषां शब्दाना मर्थेऽन्याञ्छब्दान्प्रयुञ्जते । तद्यथा—ऊषेत्यस्य शब्दस्य स्थाने—क्व यूयमुषिताः, तेरेत्यस्यार्थे—क्व यूयं तीर्णाः, चक्रेत्यस्यार्थे—क्व यूयं कृतवन्तः, पेचेत्यस्यार्थे— क्व यूयं पक्ववन्त इति । अप्रयुक्ते दीर्घसत्रवत् यद्यप्यप्रयुक्ता अवश्यं दीर्घसत्रवल्लक्षणेनानुविधेयाः तद्यथा दीर्घसत्राणि
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ५३ वार्षशतिकानि वार्षसहस्रिकाणि च । न चाद्यत्वे कश्चिदाहरति । केवलमृषि- सम्प्रदायो धर्म इति कृत्वा याज्ञिका : शास्त्रेणानुविदधते । प्रदीपः—अर्थे शब्दप्रयोगादिति । अर्थसद्भावः शब्दप्रयोगे लिङ्गम् । नहि विना शब्देनार्थप्रत्यायनमुपपद्यते । इतरोऽन्यथासिद्धतामाह—अप्रयोग इति । यतोऽन्ये तेषामर्थानां सन्ति वाचकास्ततो नैषामनुमानमुपपद्यते । यद्यप्यूषेत्यस्य उषिता इति समानार्थो न भवति परोक्षतादेर्विशेषस्यानवगमात्तथापि तत्प्रत्यायनाय पदान्तरसहितः प्रयुज्यते । संप्रत्यप्रयुज्यमानानामपि पूर्वं प्रयुक्तत्वादनुशासनं कर्तव्यमित्याह— अप्रयुक्त इति । ऋषिसम्प्रदाय इति । वेदाध्ययनमित्यर्थः । अनुवाद—"यदि" अप्रयुक्त हैं," ऐसा कहा जाये (तो) वह नहीं हैं क्योंकि शब्द का प्रयोग अर्थ में होता है ।" यह जो 'अप्रयुक्त हैं' ऐसा (कहा गया है), वह नहीं है । क्या कारण है ? अर्थ में शब्द का प्रयोग होने के कारण । क्योंकि शब्दों का प्रयोग अर्थ में होता है । इन शब्दों के तत्तदर्थ हैं, जिनमें इनका प्रयोग होता है । “(इन अर्थों में) अन्य शब्दों का प्रयोग होने के कारण इनका अप्रयोग है”— अथवा इन शब्दों का अप्रयोग भी न्याय्य ही है । किस लिए ? (इन अर्थों में) अन्य (शब्दों) के प्रयोग से । क्योंकि इन शब्दों के अर्थ में अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं । जैसे कि 'ऊष' इस शब्द के स्थान पर 'क्व यूयमुषिताः' (इस वाक्य में 'उषित' शब्द का प्रयोग), 'तेर' इस (शब्द) के अर्थ में क्व यूयं तीर्णाः' (इस वाक्य में 'तीर्णा' शब्द का प्रयोग), 'पेच' इस (शब्द) के अर्थ में 'क्व यूयं पक्ववन्तः' (इस वाक्य में 'पक्ववन्तः' शब्द का प्रयोग । अप्रयुक्त (शब्द) में दीर्घसत्र की तरह— यद्यपि (शब्द) अप्रयुक्त हैं (तथापि) दीर्घकालीन यज्ञों क्री तरह शास्त्र के द्वारा इनका व्याख्यान आवश्यक है । जैसे सौ वर्षों ओर हजार वर्षों तक के दीर्घ- कालीन यज्ञ होते हैं । आजकल कोई भी उनका व्याख्यान नहीं करता । केवल ऋषि सम्प्रदाय के अनुसार यह धर्मजनक है, ऐसा कहकर मीमांसक शास्त्र में इनका आख्यान करते हैं । उषा—पूर्वपक्षी की "अस्त्यप्रयुक्तः" इस शंका का समाधान भाष्यकार ने तीन प्रकार से किया है— (१) अर्थ का सत्त्व शब्द की सत्ता का अनुमापक है, क्योंकि शब्द के बिना अर्थप्रत्यायन नहीं किया जा सकता । जिन अर्थों में इन शब्दों का प्रयोग होता हैं, उनकी स्थिति से शब्दों की सत्ता का अनुमान किया जा सकता है ।
(२) अथवा इन शब्दों की अप्रयोगावस्था भी स्वीकार्य हो सकती है, क्योंकि इन शब्दों का जो अर्थ है, उस अर्थ में इनके अतिरिक्त अन्य शब्दों का प्रयोग दृष्टिगत होता है । ऊष, तेर, चक्र और पेच क्रमशः वस्, तृ, कृ और पच् धातुओं के लिट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचन के रूप हैं । इन शब्दों के स्थान पर क्रमशः उषिताः, तीर्णाः, कृतवन्तः और पक्ववन्तः शब्दों का प्रयोग दिखाई देता है । यद्यपि 'ऊष' इत्यादि के स्थान पर "उषिताः" इत्यादि का प्रयोग सर्वथा समीचीन नहीं है क्योंकि इनमें लिट् लकार की परोक्षता आदि की अवगति समाहित नहीं हो पाती । (३) अपि च, यदि ये शब्द अप्रयुक्त भी हों तो भी दीर्घकालीन यज्ञों के समान शास्त्र में इनका विधान अवश्य किया जाना चाहिए । जिस प्रकार से आज के युग में सौ और हजार वर्षों में पूर्ण होने वाले यज्ञों को कोई सम्पादित नहीं कर सकता तथापि धर्म मानकर शास्त्र के द्वारा उनका अन्वाख्यान अवश्य किया जाता है । अत एव धर्म मानकर इन शब्दों का व्याख्यान भी अवश्य किया जाना चाहिए । मूलम् — * सर्वे देशान्तरे— सर्वे खल्वप्येते शब्दा देशान्तरेषु प्रयुज्यन्ते । न चैवोपलभ्यन्ते । उपलब्धौ यत्नः क्रियताम् । महान् शब्दस्य प्रयोगविषयः । सप्तद्वीपा वसुमती । त्रयो लोकाः । चत्वारो वेदाः साङ्गाः सरहस्या बहुधा भिन्ना एकशतमध्वर्युशाखाः, सहस्रवर्त्मा सामवेदः, एकविंशतिधा बाह्वृच्यं नवधाथर्वणो वेदः । वाकोवाक्य- मितिहासः पुराणं वैद्यकमित्येतावाञ्छब्दस्य प्रयोगविषयः । एतावन्तं शब्दस्य प्रयोगविषयमनुनिशम्य 'सन्त्यप्रयुक्ता' इति वचनं केवलं साहसमात्रमेव । एतस्मिंश्चातिमहति शब्दस्य प्रयोग विषये ते ते शब्दास्तत्र तत्र नियत- विषया दृश्यन्ते । तद्यथा शवतिर्गतिकर्मा कम्बोजेष्वेव भाषितो भवति, विकार एवैनमार्या भाषन्ते शव इति । हम्मतिः सुराष्ट्रेषु, रंहतिः प्राच्यमध्येषु, गमिमेव त्वार्याः प्रयुञ्जते । दातिर्लवनार्थे प्राच्येषु, दात्रमुदीच्येषु । ये चाप्येते भवतोऽप्रयुक्ता अभिमताः शब्दा एतेषामपि प्रयोगो दृश्यते । क्व ? वेदे । तद्यथा—"सप्तास्ये रेवती रेवदूष, यद्वो रेवती रेवत्यां तमूष, यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र, यन्ना नश्चक्रा जरसं तनूनाम्" इति । प्रदीपः—सर्व इति । इदमत्र तात्पर्यम्—यस्य कस्यचिद्वचनात्प्रयोगाप्रयोगौ न व्यवतिष्ठेते, अपितु शिष्टानामेव वचनात् । वाकोवाक्यमिति । वाकोवाक्यशब्देनो- क्तिप्रत्युक्तिरूपो ग्रन्थ उच्यते—यथा—"किंस्विदावपनं महद् भूमिरावपनं महत्" इति । पूर्वचरितसङ्कीर्तनमितिहासः । वंशाद्यनुकीर्तनं पुराणम् । विकार इति । जीवतो मृतावस्था विकारस्तत्रेत्यर्थः ।
३. व्याकरण-शास्त्र की महिमा, साधु-असाधु शब्द-विभाग एवं पस्पशाह्निक उपसंहार
प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ५५ अनुवाद—सभी (अप्रयुक्त शब्द) अन्य देशों में— ये सभी (अप्रयुक्त शब्द) अन्य देशों (स्थानों) में प्रयुक्त होते हैं। परन्तु वे उपलब्ध नहीं होते । (तो) उपलब्धि में यत्न कीजिये। शब्दप्रयोग का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। यह सप्तद्वीपा पृथ्वी है, तीन लोक हैं, वेदाङ्गों और रहस्य (उपनिषत्साहित्य) सहित चार वेद हैं। (उनके) नाना भेद हैं—यजुर्वेद की १०१ शाखायें हैं, सामवेद के १०० मार्ग हैं, बाहूवृच्य (ऋग्वेद) २१ प्रकार का है (उसकी २१ शाखायें हैं), अथर्ववेद ६ प्रकार का है। उक्तिप्रत्युक्तिरूप ग्रन्थ, इतिहास, पुराण, वैद्यक इत्यादि, इतना बड़ा शब्द प्रयोग का क्षेत्र है। इतने बड़े शब्द प्रयोग के विषय को बिना सुने "अप्रयुक्त हैं" ऐसा कहना केवल साहसमात्र ही है। और इस इतने बड़े शब्दप्रयोग के क्षेत्र में तत्तच्छब्द उस-उस अर्थ में नियत विषय देखे जाते हैं। जैसे कि गतिकर्मा 'शवति' शब्द (शव् धातु का तिङन्त रूप) कम्बोज लोगों में ही बोला जाता है, आर्य लोग इसके विकार 'शव' शब्द का प्रयोग करते हैं। 'हम्मति' (हम्म् धातु का तिङन्त रूप) सुराष्ट्र देश में, 'रंहति' (रंह् धातु का तिङन्त रूप) प्राच्य और मध्य देशों में, आर्य तो (इस अर्थ में गम् धातु का ही प्रयोग करते हैं। 'दाति' (दा धातु का तिङन्त रूप) प्राच्य देशों में काटने के अर्थ में (प्रयुक्त होता है), उदीच्य प्रदेशों में (लोग) दात्र का प्रयोग करते हैं। और ये जो शब्द आप को अप्रयुक्त (रूप में) अभिमत हैं, उनका भी प्रयोग देखा जाता है। कहाँ ? वेद में। जैसेकि "सप्तास्ये रेवती रेवदूष," "यदवो रेवती रेवत्यां तमूष," "यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्माचक्र," "यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्" इत्यादि (श्रुतियों में)। उषा—"छिन्ने मूले नैव पत्रं न शाखाः," आपाततः भ्रान्तियों का समाधान करने के अनन्तर सिद्धान्ती ने पूर्वपक्षी के मूल सिद्धान्त पर ही प्रहार करते हुए यह स्थापित किया है कि वे शब्द जिन्हें अप्रयुक्त समझा गया है, अन्यान्य देशों में प्रयुक्त हुए देखे जाते हैं। शब्द के प्रयोग का विषय अत्यन्त विस्तृत है। सात द्वीपों वाली पृथ्वी, तीन लोक, षडङ्ग तथा उपनिषत्सहित चार वेद । उन चार वेदों में भी यजुर्वेद की १०१, सामवेद की एक हजार, ऋग्वेद की इक्कीस तथा अथर्ववेद की ६ शाखाओं सहित कुल ११३० शाखायें हैं। इसके अतिरिक्त स्मृति, प्रश्नोत्तर रूप शास्त्रार्थ के ग्रन्थ, इतिहास, पुराण और वैद्यक शास्त्र के रूप में शब्द का विस्तार क्षेत्र है। इस विस्तृत प्रयोग क्षेत्र में भी शब्द विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग अर्थों में प्रयुज्यमान देखे जाते हैं। तद्यथा कम्बोज प्रदेश में √शव् का गतिकर्म अर्थ में
५६ महाभाष्यम्
प्रयोग होता है, आर्य इसके विकार रूप शव शब्द का प्रयोग करते हैं। सुराष्ट्र में √हम्म्, प्राच्य और मध्य देश में √रंह् तथा आर्य प्रदेशों में √गम् का प्रयोग एक ही अर्थ में होता है। ऐसी स्थिति में किसी शब्द को अप्रयुक्त कह देना उचित नहीं। पुनश्च, भाष्यकार ने पूर्वपक्षी द्वारा उद्धृत किये गये चारों शब्दों का प्रयोग भी दिखाया है। ऊष, तेर, चक्र और पेच, ये चारों शब्द ऋक् मन्त्रों में प्राप्त होते हैं। "सप्तास्ये रेवती रेवदूष" इत्यादि श्रुति में 'ऊष' शब्द का तथा "यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र" इत्यादि श्रुति में 'चक्र' शब्द का प्रयोग दिखाया गया है। अतः पूर्वपक्षी द्वारा उठाई गई स्मृति के अप्रामाण्य की शंका निराधार हो जाती है। मूलम्—किं पुनः शब्दस्य ज्ञाने धर्मः, आहो स्वित्प्रयोगे ? कश्चात्र विशेषः ?
- ज्ञाने धर्म इति चेत्तथाऽधर्मः— ज्ञाने धर्म इति चेत्तथाऽधर्मोऽपि प्राप्नोति । यो हि शब्दान्जानात्यपशब्दा- नप्यसौ जानाति । यथैव शब्दज्ञाने धर्म एवमपशब्द ज्ञानेऽप्यधर्मः । अथवा भूयानधर्मः प्राप्नोति । भूयांसो ह्यपशब्दा अल्पीयांसः शब्दाः । एकैकस्य शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः । तद्यथा गौरित्यस्य गावी गोणी गोता गोपोतलिकेत्येवमादयोऽपभ्रंशाः ।
- आचारे नियमः— आचारे पुनरृषिर्नियमं वेदयते—"तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः" इति । प्रदीपः—किं पुनरिति । "एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः शास्त्रान्वितः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति" इति श्रुतिः तत्र किं सम्यग् ज्ञातः कामधुग्भवति सुप्रयोगात्तु सम्यग्ज्ञातत्वानुमानमित्यर्थः, आहो स्वित्सुप्रयुक्तः कामधुग्भवति सुप्रयुक्तत्वं तु सम्यग्ज्ञानादित्यर्थ इति प्रश्नः । ज्ञाने धर्म इति चेदिति । यथा श्लेष्मणः प्रकोपनं स्नेहद्रव्यं रूक्षं तु वायोस्तथेहापि प्राप्तमिति भावः आचारे प्रयोगे । ऋषिर्वेदः । अनुवाद—फिर क्या शब्द के ज्ञान में धर्म है, अथवा प्रयोग में ? इसमें क्या विशेष (बात) है ? "यदि ज्ञान में धर्म है, तो अधर्म (भी) हो"— यदि (शब्द के) ज्ञान में धर्म (की प्राप्ति) हो तो अधर्म भी प्राप्त होता है । क्योंकि जो शब्द को जानता है, वह अपशब्दों को भी जानता है । जिस प्रकार से शब्द के ज्ञान में धर्म है, उसी प्रकार अपशब्द के ज्ञान में भी अधर्म है। अथवा अधिक अधर्म को प्राप्त करता है । अपशब्द अधिक हैं (साधु) शब्द कम हैं । एक एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश हैं, जैसे कि 'गोः' इस एक (शब्द) के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि प्रकार के अपभ्रंश हैं ।