भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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५२ महाभाष्यम् यह परस्पर विरुद्ध नहीं हैं। 'हैं' ऐसा (हम) कह रहे हैं। क्योंकि शास्त्रज्ञ शास्त्र के द्वारा इनका विधान करते हैं। "अप्रयुक्त हैं" ऐसा भी कहते हैं क्योंकि लोक में अप्रयुक्त हैं। जो यह कहा गया है "आप जैसा कौन अन्य पुरुष शब्द के प्रयोग में कुशल होगा" (सो) हम यह नहीं कहते कि हमारे द्वारा अप्रयुक्त हैं। तो क्या (कहते हो) ? कि लोक में अप्रयुक्त हैं। आप भी तो लोक के भीतर हैं। मैं लोक के भीतर हूं, मैं (ही) लोक नहीं हूं। उषा—"अस्त्यप्रयुक्तः" यह वार्तिकांश भाष्यकार ने पूर्वपक्ष की स्थापना के लिए प्रस्तुत किया है। लोक में प्रयुक्त शब्दों के शास्त्र द्वारा नियमन की बात पहले की गई है। वहाँ यह निर्णय भी लिया गया है कि प्रयुज्यमान साधु शब्द धर्म का हेतु बनता है। एवम्, अप्रयुक्त शब्दों का असाधुत्व अनुमान से सिद्ध हो जाता है।' व्याकरण स्मृति जब अप्रयुक्त (असाधु) शब्दों का अन्वाख्यान करती है तो उसमें अप्रामाण्य की शंका उत्पन्न होती है। परन्तु सिद्धान्ती के मत में यह बात विप्रतिषिद्ध है। शब्दों का सत्त्व उनकी प्रायोगिक स्थिति में सम्भव हो सकता है, एवं च यदि शब्द हैं तो वे अप्रयुक्त नहीं हो सकते और यदि वे अप्रयुक्त हैं तो उनका सत्त्व भी सन्दिग्ध है। अपि च, स्वयमेव शब्द का प्रयोग करके उसे अप्रयुक्त कहना अपने आप में ही उपहासा- स्पद है। पूर्वपक्षी ने सिद्धान्ती के इस समाधान पर पुनः आक्षेप करते हुए अपने कथन को और स्पष्ट किया है। शब्द का सत्त्व शास्त्र के द्वारा विधान होने के कारण सिद्ध होता है, परन्तु लोक में उनका अप्रयोग व्याकरण-स्मृति पर प्रश्नचिह्न लगाता है। पूर्वपक्षी ने इन शब्दों का प्रयोग अवश्य किया है, परन्तु यह प्रयोग लोक में जिस अर्थ-सङ्क्रान्ति की भावना से होता है, उस दृष्टि से नहीं किया गया। उसने केवल स्वरूप स्पष्ट करने के लिए ही ऊष, तेर, चक्र और पेच शब्दों का उच्चारण किया है। मूलम्—* अस्त्यप्रयुक्त इति चेन्नार्थे शब्दप्रयोगात्— अस्त्यप्रयुक्त इति चेत् । तन्न । किं कारणम् । अर्थे शब्द-प्रयोगात् । अर्थे शब्दाः प्रयुज्यन्ते । सन्ति चैषां शब्दानांमर्था येष्वर्थेषु प्रयुज्यन्ते । *अप्रयोगः प्रयोगान्यत्वात् अप्रयोगः खल्वप्येषां शब्दानां न्याय्यः । कुतः ? प्रयोगान्यत्वात् । यदेषां शब्दाना मर्थेऽन्याञ्छब्दान्प्रयुञ्जते । तद्यथा—ऊषेत्यस्य शब्दस्य स्थाने—क्व यूयमुषिताः, तेरेत्यस्यार्थे—क्व यूयं तीर्णाः, चक्रेत्यस्यार्थे—क्व यूयं कृतवन्तः, पेचेत्यस्यार्थे— क्व यूयं पक्ववन्त इति । अप्रयुक्ते दीर्घसत्रवत् यद्यप्यप्रयुक्ता अवश्यं दीर्घसत्रवल्लक्षणेनानुविधेयाः तद्यथा दीर्घसत्राणि