व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ५३ वार्षशतिकानि वार्षसहस्रिकाणि च । न चाद्यत्वे कश्चिदाहरति । केवलमृषि- सम्प्रदायो धर्म इति कृत्वा याज्ञिका : शास्त्रेणानुविदधते । प्रदीपः—अर्थे शब्दप्रयोगादिति । अर्थसद्भावः शब्दप्रयोगे लिङ्गम् । नहि विना शब्देनार्थप्रत्यायनमुपपद्यते । इतरोऽन्यथासिद्धतामाह—अप्रयोग इति । यतोऽन्ये तेषामर्थानां सन्ति वाचकास्ततो नैषामनुमानमुपपद्यते । यद्यप्यूषेत्यस्य उषिता इति समानार्थो न भवति परोक्षतादेर्विशेषस्यानवगमात्तथापि तत्प्रत्यायनाय पदान्तरसहितः प्रयुज्यते । संप्रत्यप्रयुज्यमानानामपि पूर्वं प्रयुक्तत्वादनुशासनं कर्तव्यमित्याह— अप्रयुक्त इति । ऋषिसम्प्रदाय इति । वेदाध्ययनमित्यर्थः । अनुवाद—"यदि" अप्रयुक्त हैं," ऐसा कहा जाये (तो) वह नहीं हैं क्योंकि शब्द का प्रयोग अर्थ में होता है ।" यह जो 'अप्रयुक्त हैं' ऐसा (कहा गया है), वह नहीं है । क्या कारण है ? अर्थ में शब्द का प्रयोग होने के कारण । क्योंकि शब्दों का प्रयोग अर्थ में होता है । इन शब्दों के तत्तदर्थ हैं, जिनमें इनका प्रयोग होता है । “(इन अर्थों में) अन्य शब्दों का प्रयोग होने के कारण इनका अप्रयोग है”— अथवा इन शब्दों का अप्रयोग भी न्याय्य ही है । किस लिए ? (इन अर्थों में) अन्य (शब्दों) के प्रयोग से । क्योंकि इन शब्दों के अर्थ में अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं । जैसे कि 'ऊष' इस शब्द के स्थान पर 'क्व यूयमुषिताः' (इस वाक्य में 'उषित' शब्द का प्रयोग), 'तेर' इस (शब्द) के अर्थ में क्व यूयं तीर्णाः' (इस वाक्य में 'तीर्णा' शब्द का प्रयोग), 'पेच' इस (शब्द) के अर्थ में 'क्व यूयं पक्ववन्तः' (इस वाक्य में 'पक्ववन्तः' शब्द का प्रयोग । अप्रयुक्त (शब्द) में दीर्घसत्र की तरह— यद्यपि (शब्द) अप्रयुक्त हैं (तथापि) दीर्घकालीन यज्ञों क्री तरह शास्त्र के द्वारा इनका व्याख्यान आवश्यक है । जैसे सौ वर्षों ओर हजार वर्षों तक के दीर्घ- कालीन यज्ञ होते हैं । आजकल कोई भी उनका व्याख्यान नहीं करता । केवल ऋषि सम्प्रदाय के अनुसार यह धर्मजनक है, ऐसा कहकर मीमांसक शास्त्र में इनका आख्यान करते हैं । उषा—पूर्वपक्षी की "अस्त्यप्रयुक्तः" इस शंका का समाधान भाष्यकार ने तीन प्रकार से किया है— (१) अर्थ का सत्त्व शब्द की सत्ता का अनुमापक है, क्योंकि शब्द के बिना अर्थप्रत्यायन नहीं किया जा सकता । जिन अर्थों में इन शब्दों का प्रयोग होता हैं, उनकी स्थिति से शब्दों की सत्ता का अनुमान किया जा सकता है ।