भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ४६ कुक्कुर के मांस से भी की जा सकती है। वहाँ नियम किया जाता है—यह भक्ष्य है, यह अभक्ष्य है । उसी प्रकार राग से स्त्रियों में प्रवृत्ति होती है । गम्या और अगम्या में रागनिवृत्ति तो समान ही है । वहाँ नियम किया जाता है—यह गम्या है, यह अगम्या है । उषा—लोक में अर्थ के निमित्त शब्द का प्रयोग होने पर शास्त्र धर्म का नियमन करता है, जिस प्रकार से लोक और वेद में । यहाँ वार्त्तिकस्थ "लौकिकवैदिकेषु" शब्द को उठाकर भाष्यकार ने यह कहा है कि यहाँ वार्त्तिककार का दाक्षिणात्य होना सूचित होता है क्योंकि वे निरर्थक शब्दाडम्बर में रुचि रखते हैं । “समुदायेषु प्रवृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि वर्त्तन्ते” इस नियम से ‘लोक’ और ‘वेद’ शब्दों की समुदाय और उनके अवयव दोनों में ही समान रूप से प्रवृत्ति हो सकती है । अतः यहाँ लोक और वेद के अवयवों का बोध करवाने की इच्छा से तद्धित प्रत्यय अनावश्यक ही है । तथापि वार्त्तिककार लोक और वेद समुदाय तथा उनके अवयव में, जो वस्तुतः अभिन्न हैं, भेद की कल्पना करके “तत्र भवः” इस अर्थ में ठञ् प्रत्यय करते हैं । एक अन्य दृष्टि से यहाँ अवयव-अवयविविभाग न मानकर आधाराधेयभाव को भी भाष्यकार ने उचित माना है। एवं च “तत्र भवः” से तद्धित प्रत्यय उपयुक्त ही सिद्ध होता है । ऐसी स्थिति में इसका अर्थ होगा—‘लोक और वेद में वर्त्तमान सिद्धान्त ।’ यहाँ वैदिक से अभिप्राय है—“श्रुत्युपनिबद्ध” तथा लौकिक से अभिप्राय है—“स्मृत्युपनिबद्ध ।” स्मृतिवाक्यों में इस प्रकार के नियम किये जाते हैं कि अमुक वस्तु भक्ष्य है अमुक अभक्ष्य अथवा अमुक प्रकार की स्त्री समागम के योग्य है, अमुक प्रकार की अयोग्य । भक्षण क्षुत्प्रतिघात के लिए तथा स्त्री समागम राग के कारण किया जाता है । क्षुत्प्रतिघात किसी भी वस्तु का भक्षण करके किया जा सकता है, एवमेव रागनिवृत्ति किसी भी स्त्री से समागम करके हो सकती है। इस प्रकार का स्मृत्युपदिष्ट नियमन अभ्युदयकारी तथा श्रेयस्कर होता है । मूलम्—वेदे खल्वपि—“पयोव्रतो ब्राह्मणो यवागूव्रतो राजन्य आमिक्षवतो वैश्यः” इत्युच्यते । व्रतं च नामाभ्यवहारार्थमुपादीयते । शक्यं चानेन शालिमांसादी- न्यपि व्रतयितुम् । तत्र नियमः क्रियते । तथा “बैल्वः खादिरो वा यूपः स्याद्,” इत्युच्यते । यूपश्च नाम पश्वनुब- न्धार्थमुपादीयते । शक्यं चानेन यत्किञ्चिदेव काष्ठमुच्छ्रित्यानुच्छ्रित्य वा पशुरनु- बन्धुम् । तत्र नियमः क्रियते ।