व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० महाभाष्यम् तथा “अग्नौ कपालान्याश्रित्यामन्त्रयते—भृगूणामङ्गिरसां धर्मस्य तपसा तप्यध्वम्” इति । अन्तरेणापि मन्त्रमग्निर्दहनकर्माकपालानि सन्तापयति । तत्र च नियमः क्रियते— एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवतीति । एवमिहापि समानायामर्थावगतौ शब्देन चापशब्देन च धर्मनियमः क्रियते— शब्देनैवार्थोऽभिधेयो नापशब्देनेति । एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवतीति । प्रदीपः —पयोव्रत इति । सत्यामर्थितायां पय एव व्रतयतीति नियमोऽयं न तु विधिः, अर्थित्वाभावे कारणाभावात् । समानायामिति । यद्यपि साक्षादपभ्रंशा न वाचकास्तथापि स्मर्यमाणसाधुशब्दव्यवधानेनार्थं प्रत्याययन्ति, केचिच्चापभ्रंशाः परम्परया निरूढिमागताः साधुशब्दानस्मारयन्त एवार्थं प्रत्याययन्ति । अन्ये तु मन्यन्ते —साधुशब्दवदपभ्रंशा अपि साक्षादर्थस्य वाचका इति । अनुवाद—वेद में भी “ब्राह्मण दूध का व्रत करे, क्षत्रिय यवागू का व्रत करे, वैश्य आमिक्षा का व्रत करे, ऐसा कहा जाता है। व्रत का उपादान अभ्यवहार (भोज्य नियमन) के लिए किया जाता है । शालिमांस आदि से भी यह व्रत किया जा सकता है। वहाँ नियम किया जाता है। उसी प्रकार “यूप बिल्व अथवा खैैर का होना चाहिए,” ऐसा कहा जाता है। यूप का उपादान पशु को बाँधने के लिए किया जाता है। किसी भी छिले अनछिले काष्ठ से पशु को बाँधा जा सकता है। वहाँ नियम किया जाता है । वैसे ही “अग्नि पर कपालों को रखकर मन्त्र पढ़ता है ‘भृगु और अङ्गिरसों के तेज से तपो’।” मन्त्र के बिना भी दहनकर्मा अग्नि कपालों को तपाती है, वहाँ नियम किया जाता है, (क्योंकि) ऐसा करना अभ्युदयकारी होता है । इसी प्रकार यहाँ भी शब्द और अपशब्द से समान अर्थावगति होने पर भी धर्म के लिए नियम किया जाता है—‘शब्द से ही अर्थ का अभिधान होना चाहिए, अपशब्द से नहीं । ऐसा किया जाना अभ्युदयकारी होता है ।” उषा—इसी प्रकार का विधान वेद में भी किया जाता है । किसी भी विधि से प्राप्यमाण अर्थों में भी श्रुति एक विशिष्ट नियम प्रदान करती है, क्योंकि ऐसा करने से मनुष्य अभ्युदय से युक्त होता है । इसी प्रकार से शब्द और अपशब्द दोनों के ही द्वारा अर्थ का अभिधान हो सकता है । ‘गो’ शब्द जिस प्रकार से सास्नादिमत्पदार्थ का बोध करता है, उसी प्रकार से यह बोध गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अपभ्रष्ट शब्दों से भी हो सकता है । परन्तु यह नियम किया जाता है कि साधु शब्द से ही अर्थ का अभिधान करवाना चाहिए, असाधु से नहीं । क्योंकि ऐसा करना कल्याणकारी होता है । भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में यही बात इन शब्दों में कही है— शिष्टेभ्य आगमात्सिद्धाः साधवो धर्मसाधनम् । अर्थप्रत्यायनाऽभेदे विपरीतास्त्वसाधवः ॥