व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ५५ अनुवाद—सभी (अप्रयुक्त शब्द) अन्य देशों में— ये सभी (अप्रयुक्त शब्द) अन्य देशों (स्थानों) में प्रयुक्त होते हैं। परन्तु वे उपलब्ध नहीं होते । (तो) उपलब्धि में यत्न कीजिये। शब्दप्रयोग का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। यह सप्तद्वीपा पृथ्वी है, तीन लोक हैं, वेदाङ्गों और रहस्य (उपनिषत्साहित्य) सहित चार वेद हैं। (उनके) नाना भेद हैं—यजुर्वेद की १०१ शाखायें हैं, सामवेद के १०० मार्ग हैं, बाहूवृच्य (ऋग्वेद) २१ प्रकार का है (उसकी २१ शाखायें हैं), अथर्ववेद ६ प्रकार का है। उक्तिप्रत्युक्तिरूप ग्रन्थ, इतिहास, पुराण, वैद्यक इत्यादि, इतना बड़ा शब्द प्रयोग का क्षेत्र है। इतने बड़े शब्द प्रयोग के विषय को बिना सुने "अप्रयुक्त हैं" ऐसा कहना केवल साहसमात्र ही है। और इस इतने बड़े शब्दप्रयोग के क्षेत्र में तत्तच्छब्द उस-उस अर्थ में नियत विषय देखे जाते हैं। जैसे कि गतिकर्मा 'शवति' शब्द (शव् धातु का तिङन्त रूप) कम्बोज लोगों में ही बोला जाता है, आर्य लोग इसके विकार 'शव' शब्द का प्रयोग करते हैं। 'हम्मति' (हम्म् धातु का तिङन्त रूप) सुराष्ट्र देश में, 'रंहति' (रंह् धातु का तिङन्त रूप) प्राच्य और मध्य देशों में, आर्य तो (इस अर्थ में गम् धातु का ही प्रयोग करते हैं। 'दाति' (दा धातु का तिङन्त रूप) प्राच्य देशों में काटने के अर्थ में (प्रयुक्त होता है), उदीच्य प्रदेशों में (लोग) दात्र का प्रयोग करते हैं। और ये जो शब्द आप को अप्रयुक्त (रूप में) अभिमत हैं, उनका भी प्रयोग देखा जाता है। कहाँ ? वेद में। जैसेकि "सप्तास्ये रेवती रेवदूष," "यदवो रेवती रेवत्यां तमूष," "यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्माचक्र," "यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्" इत्यादि (श्रुतियों में)। उषा—"छिन्ने मूले नैव पत्रं न शाखाः," आपाततः भ्रान्तियों का समाधान करने के अनन्तर सिद्धान्ती ने पूर्वपक्षी के मूल सिद्धान्त पर ही प्रहार करते हुए यह स्थापित किया है कि वे शब्द जिन्हें अप्रयुक्त समझा गया है, अन्यान्य देशों में प्रयुक्त हुए देखे जाते हैं। शब्द के प्रयोग का विषय अत्यन्त विस्तृत है। सात द्वीपों वाली पृथ्वी, तीन लोक, षडङ्ग तथा उपनिषत्सहित चार वेद । उन चार वेदों में भी यजुर्वेद की १०१, सामवेद की एक हजार, ऋग्वेद की इक्कीस तथा अथर्ववेद की ६ शाखाओं सहित कुल ११३० शाखायें हैं। इसके अतिरिक्त स्मृति, प्रश्नोत्तर रूप शास्त्रार्थ के ग्रन्थ, इतिहास, पुराण और वैद्यक शास्त्र के रूप में शब्द का विस्तार क्षेत्र है। इस विस्तृत प्रयोग क्षेत्र में भी शब्द विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग अर्थों में प्रयुज्यमान देखे जाते हैं। तद्यथा कम्बोज प्रदेश में √शव् का गतिकर्म अर्थ में