व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ महाभाष्यम्
प्रयोग होता है, आर्य इसके विकार रूप शव शब्द का प्रयोग करते हैं। सुराष्ट्र में √हम्म्, प्राच्य और मध्य देश में √रंह् तथा आर्य प्रदेशों में √गम् का प्रयोग एक ही अर्थ में होता है। ऐसी स्थिति में किसी शब्द को अप्रयुक्त कह देना उचित नहीं। पुनश्च, भाष्यकार ने पूर्वपक्षी द्वारा उद्धृत किये गये चारों शब्दों का प्रयोग भी दिखाया है। ऊष, तेर, चक्र और पेच, ये चारों शब्द ऋक् मन्त्रों में प्राप्त होते हैं। "सप्तास्ये रेवती रेवदूष" इत्यादि श्रुति में 'ऊष' शब्द का तथा "यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र" इत्यादि श्रुति में 'चक्र' शब्द का प्रयोग दिखाया गया है। अतः पूर्वपक्षी द्वारा उठाई गई स्मृति के अप्रामाण्य की शंका निराधार हो जाती है। मूलम्—किं पुनः शब्दस्य ज्ञाने धर्मः, आहो स्वित्प्रयोगे ? कश्चात्र विशेषः ?
- ज्ञाने धर्म इति चेत्तथाऽधर्मः— ज्ञाने धर्म इति चेत्तथाऽधर्मोऽपि प्राप्नोति । यो हि शब्दान्जानात्यपशब्दा- नप्यसौ जानाति । यथैव शब्दज्ञाने धर्म एवमपशब्द ज्ञानेऽप्यधर्मः । अथवा भूयानधर्मः प्राप्नोति । भूयांसो ह्यपशब्दा अल्पीयांसः शब्दाः । एकैकस्य शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः । तद्यथा गौरित्यस्य गावी गोणी गोता गोपोतलिकेत्येवमादयोऽपभ्रंशाः ।
- आचारे नियमः— आचारे पुनरृषिर्नियमं वेदयते—"तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः" इति । प्रदीपः—किं पुनरिति । "एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः शास्त्रान्वितः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति" इति श्रुतिः तत्र किं सम्यग् ज्ञातः कामधुग्भवति सुप्रयोगात्तु सम्यग्ज्ञातत्वानुमानमित्यर्थः, आहो स्वित्सुप्रयुक्तः कामधुग्भवति सुप्रयुक्तत्वं तु सम्यग्ज्ञानादित्यर्थ इति प्रश्नः । ज्ञाने धर्म इति चेदिति । यथा श्लेष्मणः प्रकोपनं स्नेहद्रव्यं रूक्षं तु वायोस्तथेहापि प्राप्तमिति भावः आचारे प्रयोगे । ऋषिर्वेदः । अनुवाद—फिर क्या शब्द के ज्ञान में धर्म है, अथवा प्रयोग में ? इसमें क्या विशेष (बात) है ? "यदि ज्ञान में धर्म है, तो अधर्म (भी) हो"— यदि (शब्द के) ज्ञान में धर्म (की प्राप्ति) हो तो अधर्म भी प्राप्त होता है । क्योंकि जो शब्द को जानता है, वह अपशब्दों को भी जानता है । जिस प्रकार से शब्द के ज्ञान में धर्म है, उसी प्रकार अपशब्द के ज्ञान में भी अधर्म है। अथवा अधिक अधर्म को प्राप्त करता है । अपशब्द अधिक हैं (साधु) शब्द कम हैं । एक एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश हैं, जैसे कि 'गोः' इस एक (शब्द) के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि प्रकार के अपभ्रंश हैं ।