व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ५७ “आचार में नियम है”— ऋषि आचार में नियम बताता है—“वे असुर 'हेलयः हेलयः' करते हुए पराभव को प्राप्त हुए” ऐसा । एषा—श्रुति “एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः शास्त्रान्वितः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति” ऐसा कहकर धर्म का प्रतिपादन करती है । श्रुति वाक्य में “सम्यग्ज्ञातः” और “सुप्रयुक्तः” इन दोनों ही पदों का समावेश है । अतः प्रश्न उठता कि शब्द का सम्यग्ज्ञान अभ्युदयकारक है अथवा सम्यक् प्रयोग । शब्द का सम्यक् ज्ञान उसके सम्यक् प्रयोग से अनुमेय है और सम्यक् प्रयोग सम्यक् ज्ञान से ही शक्य है । इनमें से यदि ज्ञान पक्ष को स्वीकार किया जाये तो साधु शब्द के ज्ञान से जिस प्रकार धर्म की प्राप्ति होती है, असाधु शब्द के ज्ञान से उसी प्रकार अधर्म की प्राप्ति भी होनी चाहिए । और इस प्रकार से अधर्म की सम्भावना अधिक ही होगी क्योंकि एक-एक शब्द के बहुत अपरूप हुआ करते हैं । जैसे ‘गो' शब्द गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अनेक अपभ्रष्ट रूपों में प्राप्त होता है । अपि च, “तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः” के रूप में श्रुति भी शब्द के प्रयोग में ही धर्म प्राप्ति की बात स्वीकार करती है । इस प्रकार ज्ञान मात्र से धर्म प्राप्ति की बात वेद विरुद्ध भी है । अतः शब्द के ज्ञानमात्र से अभ्युदय रूप धर्म की प्राप्ति नहीं हो सकती । मूलम्—अस्तु तर्हि प्रयोगे ।
- प्रयोगे सर्वलोकस्य— यदि प्रयोगे धर्मः, सर्वो लोकोऽभ्युदयेन युज्येत । कश्चेदानीं भवतो मत्त्सरो, यदि सर्वो लोकोऽभ्युदयेन युज्येत ? न खलु कश्चिन्मत्सरः । प्रयत्नानर्थक्यं तु भवति फलवता च नाम प्रयत्नेन भवितव्यम् । न च प्रयत्नः फलाद्व्यतिरेच्यः ननु च ये कृतप्रयत्नास्ते साधीयः शब्दान्प्रयोक्ष्यन्ते, त एव साधीयोऽभ्युदयेन योक्ष्यन्ते । व्यतिरेकोऽपि वै लक्ष्यते । दृश्यन्ते हि कृतप्रयत्नाश्चाप्रवीणा, अकृत- प्रयत्नाश्च प्रवीणाः । तत्र फलव्यतिरेकोऽपि स्यात् । प्रदीपः—न च प्रयत्न इति । यदि प्रयत्नेन विना फलं स्यात् प्रयत्नवैयर्थ्य- मापद्येतेत्यर्थः । व्यतिरेक इति । परिहासः । अनुवाद—तो प्रयोग में (धर्म) हो । “प्रयोग में सभी का”— यदि (साधु शब्दों के) प्रयोग में धर्म हो तो सभी लोग अभ्युदय से युक्त हो जायें ।