व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ६१ अथवा (इसका समाधान) कूपखानक की तरह से होगा । जैसे कि कूप खोदने वाला यद्यपि मिट्टी और धूलि से अवलिप्त हो जाता है, वह जल से उत्पन्न (प्रकट) हो जाने पर वहीं से इष्ट साधन को प्राप्त करता है । जिससे वह दोष नष्ट हो जाता है और (वह) महान् अभ्युदय से युक्त होता है । इसी प्रकार से यहाँ भी यद्यपि अपशब्द के ज्ञान से अधर्म है तथापि जो शब्दज्ञान से धर्म प्राप्त होता है उससे वह दोष नष्ट हो जाता है और अभ्युदय का योग होता है । जो यह कहा जाता है कि आचार में नियम है । वह नियम यज्ञ कर्म में ही है, अन्यत्र नहीं । ऐसा सुना जाता है कि प्रत्यक्ष- धर्मा, विद्याऽविद्याविभागज्ञ, विदितवेदितव्य, अधिगतयाथातथ्य यर्वन् और तर्वन् नाम के ऋषि हुए थे । वे श्रीमान् “यद्वानः, तद्वानः” ऐसा प्रयोग करने के स्थान पर “यर्वाणः, तर्वाणः” ऐसा प्रयोग करते थे । परन्तु उन असुरों के द्वारा यज्ञ कर्म में भी अपभाषण किया गया, इसलिए वे पराभूत हुए । उषा—अथवा, जैसा कि पहले भी कहा गया था, केवल ज्ञान मात्र से भी अभ्युदय की प्राप्ति हो सकती है । उस विवेचन प्रसङ्ग में इस पक्ष में जो दोष दिखाये गये थे, उनका भी समाधान हो सकता है । प्रथम दोष धर्म प्राप्ति के साथ-साथ अधर्म की सम्भावना को लेकर उपस्थापित किया गया था । भाष्यकार ने तीन प्रकार से इसका समाधान किया है— (१) प्रथम समाधान श्रुति को आधार मानकर उपस्थित किया गया है । शब्द “एकः शब्दः सम्यग्ज्ञात०” इत्यादि श्रुति के अनुसार शब्दज्ञान से धर्मप्राप्ति का निर्देश अवश्य करता है, परन्तु अपशब्द के ज्ञान से अधर्म प्राप्ति की बात श्रुति में नहीं कही गई । “तेऽसुरा०” इत्यादि के द्वारा जो पराभूत होने की बात है, वह अपशब्द के ज्ञान से नहीं, प्रत्युत असाधु शब्द के प्रयोग से उपपन्न होती है । और जिस वस्तु का निर्देश नहीं होता वह न तो अभ्युदय का हेतु हो सकती है, न अधर्म का कारण । जिस प्रकार से हिक्कित, श्वसित, कण्डूयित इत्यादि क्रियाओं के करने से न तो पुरुष अभ्युदय को प्राप्त करता है और न इनसे अधर्म ही होता है । अत एव श्रुति में निर्दिष्ट न होने के कारण अपशब्द का ज्ञान भी अधर्म- कारक नहीं होता । (२) अपशब्द का ज्ञान भी शब्द का एक साधन ही है । गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अपशब्दों का ज्ञान होने पर ही, “इनसे इतर ‘गो’ साधु शब्द है”। इस प्रकार का ज्ञान उत्पन्न होता है । अथवा कहा जा सकता है कि जो अपशब्द को अपशब्दत्वेन जानता है, वही साधु शब्द को भी साधुशब्दत्वेन जान सकता है । अतएव जब शब्दज्ञान से धर्म की बात कही जाती है तो उसका