व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 76, कुल 96 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ महाभाष्यम् अभिप्राय यह होता है कि अपशब्दों के अपशब्दत्वेन ज्ञान सहित साधु शब्दों का साधुशब्दत्वेन ज्ञान धर्म का हेतु है । (३) प्रथम दो हेतुओं से ही यह सिद्ध हो जाता है कि अपशब्द का ज्ञान अधर्म का कारण नहीं प्रत्युत साधुशब्दज्ञान का साधन रूप होने के कारण फलवान् भी होता है । फिर भी, एक क्षण के लिए यदि यह कल्पना कर भी ली जाये कि अपशब्द से अधर्म की प्राप्ति होती है तो भी इसे दोषजनक नहीं कहा जा सकता । कूपखनन में जिस प्रकार से व्यक्ति पहले मिट्टी इत्यादि से लिप्त हो जाता है, परन्तु अनन्तर स्वच्छ जल उपलब्ध होने पर पुनः उसमें स्नान कर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार से अपशब्दों के ज्ञान से यदि कोई दोष लगता भी है तो साधु शब्द का ज्ञान होने पर पुनः व्यक्ति उस दोष से मुक्त होकर अभ्युदय से युक्त होता है । उत्कृष्ट अधिक फल की प्राप्ति में यदि स्वल्प अधर्म फल भी हो रहा हो तो वह अनुत्पन्न के समान ही होता है । ज्ञानपक्ष में दूसरा दूषण श्रुति सम्मत आचार में नियम की बात को लेकर पूर्वपक्षी के द्वारा स्थापित किया गया था । भाष्यकार के अनुसार यह विशेष व्यवस्था यज्ञादि के लिए ही की गई है । अन्यत्र साधारण स्थिति में इसकी सम्भावना नहीं हो सकती । इसके समर्थन में पतञ्जलि ने यर्वाणः, तर्वाणः नाम के ऋषियों से सम्बद्ध कथा को प्रस्तुत करते हुए कहा है कि सामान्य जीवन में अपशब्दों का प्रयोग करते हुए भी वे याज्ञकर्म में अपशब्दों का प्रयोग नहीं करते थे, अतः वे अपुण्य से युक्त नहीं हुए । असुरों ने याज्ञकर्म में भी अपभाषण किया, अतः वे पराभूत हुए । मूलम्—अथ व्याकरणमित्यस्य शब्दस्य कः पदार्थः ? सूत्रम् । *सूत्रे व्याकरणे षष्ठ्यर्थोऽनुपपन्नः— सूत्रे व्याकरणे षष्ठ्यर्थो नोपपद्यते—‘व्याकरणस्य सूत्रम्’ इति । किं हि तदन्यत्सूत्राद् व्याकरणम्, यस्यादः सूत्रं स्यात् । *शब्दाप्रतिपत्तिः शब्दानां चाप्रतिपत्तिः प्राप्नोति—व्याकरणाच्छब्दान्प्रतिपद्यामहे इति । नहि सूत्रत एव शब्दान्प्रतिपद्यन्ते । किं तर्हि ? व्याख्यानतश्च । ननु च तदेव सूत्रं विगृहीतं व्याख्यानं भवति । न केवलानि चर्चापदानि व्याख्यानम्—‘वृद्धिः, आत्, ऐच्’ इति, किं तर्हि उदाहरणं प्रत्युदाहरणं वाक्याध्याहार इत्येतत्समुदितं व्याख्यानं भवति ।