भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ६३ प्रदीपः—अथेति । उक्तमिदं न चान्तरेण व्याकरणमित्यादि । तत्र पक्ष- द्वयेऽपि दोषदर्शनात् पदार्थप्रश्नः । षष्ठ्यर्थ इति । द्वाभ्यामपि शब्दाभ्यामष्टाध्याय्याः प्रतिपादनाद्व्यतिरेकाभावः । सामान्यविशेषशब्दतया तु द्वयोः सहप्रयोगो न विरुध्यते, यदा त्वष्टाध्याय्येकदेशः सूत्रशब्देनोच्यते, तदा षष्ठ्यर्थोऽप्युपपद्यते । शब्दाप्रतिपत्ति- रिति । न हि व्याख्यानरहितसूत्रमात्रश्रवणाच्छब्दाः प्रतीयन्ते । समुदितमिति । समुदायादेवार्थावसायोत्पादादित्यर्थः । अनुवाद—अब 'व्याकरण' इस शब्द का क्या अर्थ है ? सूत्र । "सूत्र को व्याकरण मानने पर षष्ठ्यर्थ अनुपपन्न"— सूत्र को व्याकरण मानने पर षष्ठी (विभक्ति) का अर्थ उपपन्न नहीं हो सकता—'व्याकरण का सूत्र ।' क्या सूत्र से अतिरिक्त व्याकरण कुछ (तत्त्व) है जिसका वह सूत्र होगा । "शब्दों की अप्रतिपत्ति"— और (सूत्र को ही व्याकरण मानने पर) शब्दों का प्रतिपादन भी नहीं हो सकेगा—(हम) व्याकरण से शब्दों का प्रतिपादन करते हैं । (और) सूत्रों से ही शब्दों का प्रतिपादन नहीं हो सकता । फिर किससे ? व्याख्यान से भी । वही सूत्र तो विगृहीत होकर व्याख्यान होता है । केवल चर्चित पद—वृद्धि, आत्, ऐच् आदि ही व्याख्यान नहीं होते । तो क्या (व्याख्यान होता है) ? उदाहरण, प्रत्युदाहरण, वाक्य का अध्याहार, यह सब मिलकर व्याख्यान होता है । उषा—'तस्मादध्येयं व्याकरणम्' इत्यादि शास्त्र के द्वारा व्याकरणाध्ययन की अनिवार्यता का प्रतिपादन किया गया है । अतः अध्ययन के निमित्त व्याकरण शब्द के अर्थ तथा विस्तार सीमाओं को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है । यहाँ इस प्रसङ्ग में सर्वप्रथम सूत्र और शब्द को व्याकरण पद के वाच्य के रूप में रखकर विचार किया गया है । परन्तु सूत्र में व्याकरणत्व स्वीकार करने पर दो आपत्तियाँ हो सकती हैं— (१) षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वहीं उपपन्न हो सकता है जहाँ दो पृथक् वस्तुओं का निर्देश करना हो, क्योंकि यह विभक्ति दो पदार्थों का सम्बन्ध बताने में ही प्रयुक्त होती है । परन्तु व्यवहार में सूत्र और व्याकरण इन दोनों ही पदों के