भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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६४ महाभाष्यम् द्वारा अष्टाध्यायी का प्रतिपादन किया जाता है। अतः सूत्र और व्याकरण में अभिन्नता होने के कारण भेदसम्बन्धबोधिका षष्ठी विभक्ति का प्रयोग नहीं हो सकता । यद्यपि सूत्र शब्द से सूत्र सामान्य तथा व्याकरण शब्द से अष्टाध्यायी का ग्रहण होने पर इस प्रयोग में कोई विरोध प्रतीत नहीं होता । और भी जब अष्टाध्यायी के एक भाग को सूत्र शब्द के द्वारा अभिहित किया जाये तो “राहोः शिरः” इत्यादि प्रयोगों के समान इसकी सङ्गति दिखाई जा सकती है । (२) इसी पक्ष में दूसरी आपत्ति यह है कि केवलमात्र सूत्र को ही व्याकरण मानने पर शब्दों का सम्यक् प्रतिपादन नहीं हो सकता, प्रत्युत उदाहरण, प्रत्युदा- हरण तथा सूत्रान्तरों में श्रूयमाण पदों का अध्याहार कर सूत्र के सम्पूर्ण अर्थ को स्पष्ट करके ही शब्दप्रतिपत्ति सम्भव हो पाती है । मूलम्—एवं तर्हि शब्दः । *शब्दे ल्युडर्थः— यदि शब्दो व्याकरणं ल्युडर्थो नोपपद्यते—व्याक्रियन्ते शब्दा अनेनेति व्याकरणम् । नहि शब्देन किञ्चिद् व्याक्रियते । केन तर्हि ? सूत्रेण । *भवे च तद्धितः— भवे च तद्धितो नोपपद्यते—‘व्याकरणे भवो योगो वैयाकरणः’ इति । नहि शब्दे भवो योगः । क्व तर्हि ? सूत्रे । *प्रोक्तादयश्च तद्धिताः— प्रोक्तादयश्च तद्धिता नोपपद्यन्ते । पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयम् । आपिशलं काशकृत्स्नमिति । न हि पाणिनिना शब्दाः प्रोक्ताः । किं तर्हि ? सूत्रम् । प्रदीपः—शब्द इति । करणे ल्युड् विधीयते । शब्दश्च व्याक्रियमाणत्वात्कर्म न तु करणमिति भावः । भवे चेति । शब्देऽप्यन्वाख्यापकत्वेन भवो योग इति चेन्मीमांसादियोगस्यापि शब्दं प्रति विचारकत्वाद्‌वैयाकरणत्वप्रसङ्गः । अनुवाद—तो फिर शब्द (व्याकरण है) । “शब्द में ल्युट् का अर्थ”— यदि शब्द को व्याकरण माना जाये तो ल्युट् का अर्थ उपपन्न नहीं होता—