व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 96 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ६५ जिसके द्वारा शब्दों को व्याकृत किया जाता है, वह व्याकरण है। शब्द के द्वारा कुछ भी व्याकृत नहीं किया जाता । तो फिर किससे ? सूत्र से । "भव अर्थ में तद्धित" — "तत्र भवः" इस अर्थ में तद्धित का प्रयोग भी उपपन्न नहीं होता— 'व्याकरण में होने वाला योग वैयाकरण है।" शब्द में योग नहीं होता । तो कहाँ (होता हैं) ? सूत्र में । 'और प्रोक्तादि में तद्धित'— "तेन प्रोक्तम्" इस अर्थ में तद्धित प्रत्यय उपपन्न नहीं हो सकते। पाणिनि के द्वारा प्रोक्त पाणिनीय है। (इसी प्रकार से) आपिशल और काशकृत्स्न (शब्द भी सिद्ध होते हैं)। पाणिनि ने शब्दों को नहीं कहा । तो क्या (कहा है) ? सूत्र । उषा—सूत्र में व्याकरणत्व का निरास करके सम्प्रति शब्द में व्याकरणत्व स्वीकार करने पर आक्षेप किया गया है। शब्द में व्याकरणत्व स्वीकार करने पर दो समस्यायें उत्पन्न होती हैं— (१) ल्युट् प्रत्यय करण और अधिकरण में आता है। शब्द को व्याकरण मानने पर उसका अर्थ सङ्गत नहीं हो सकता । 'व्याकरण' शब्द 'वि' और 'आ' उपसर्ग पूर्वक √कृ से ल्युट् प्रत्यय करके निष्पन्न हुआ है। व्याकरण से शब्दों का प्रकृति प्रत्यय विभागादि किया जाता है, परन्तु यह विभाग शब्दों से नहीं, सूत्रों की सहायता से ही निष्पन्न होता है । (२) "तत्र भवः" और "तेन प्रोक्तम्" से होने वाले तद्धित प्रत्ययों का अर्थ भी इससे उपपन्न नहीं हो पाता । व्याकरण में होने वाला योग वैयाकरण कहा जाता है, परन्तु यह योग शब्द से नहीं, सूत्र से होता है। इसी प्रकार "तेन प्रोक्तम्" से पाणिनि शब्द से तद्धित अण् प्रत्यय करने पर पाणिनीय शब्द सिद्ध होता है। परन्तु पाणिनि ने शब्दों का आख्यान नहीं किया प्रत्युत उत्सर्ग और अपवाद रीति से सूत्रों का ही अन्वाख्यान किया है। अतः शब्द को व्याकरण का वाचक नहीं कहा जा सकता । मूलम् —किमर्थमिदमुभयमुच्यते—"भवे," "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" इति । न "प्रोक्तादयश्च तद्धिताः" इत्येव सर्वेऽपि तद्धितश्चोदितः स्यात् ?