व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ६७ अनुवाद—यह कोई दोष नहीं है, जो कहा है—"शब्द (को व्याकरण मानने में) ल्युट् का अर्थ (उपपन्न नहीं होता)। केवल करण और अधिकरण में ही ल्युट् का विधान नहीं है। तो क्या (नियम है) ? दूसरे (कारकों) में भी कृत्य और ल्युट् होते हैं। जैसे कि प्रस्कन्दनम्, प्रपतनम् इत्यादि (में ल्युट् है) । पुनश्च शब्दों के द्वारा भी शब्दों का व्याकरण होता है। जैसे कि 'गौः' इस शब्द के कहने पर सब सन्देह निवृत्त हो जाते हैं कि यह अश्व अथवा गर्दभ नहीं है। भव अर्थ और प्रोक्तादि अर्थ में (यह) अवश्य दोष है। उषा—शब्द के व्याकरणत्व पर इस अवतरण में और समीक्षात्मक विचार किया गया है। इस पक्ष पर जिन दोषों की उद्भावना पहले की गई है, उनमें सर्व प्रथम यह है कि करणाधिकरण अर्थ में आने वाला ल्युट् प्रत्यय शब्द में व्याकरणत्व मानने पर उपपन्न नहीं हो सकता । परन्तु "कृत्यल्युटो बहुलम्" यह सूत्र करणा- धिकरण के अतिरिक्त अन्य अर्थों में भी ल्युट् प्रत्यय का विधान करता है। अत एव प्रपतन, प्रस्कन्दन आदि रूप उपपन्न होते हैं। अपि च, जो केवल सूत्रों से शब्दों के व्याख्यान की बात कही गई थी, वह भी उचित नहीं है। लोकव्यवहार में शब्दों से ही शब्दों का व्याख्यान देखा जाता है। 'गो' शब्द का उच्चारण करने पर केवल सास्नादिमत् पदार्थ का ही बोध होता है, अश्व, गर्दभ आदि सभी की निवृत्ति हो जाती है । इसी प्रकार से एक उदाहरण का उपन्यास करने से उसके सदृश समस्त शब्दों की प्रतीति हो जाती है। इसी पक्ष में यदि व्याकरण की निरुक्ति "व्याक्रियन्ते विभज्यन्तेऽपशब्दा येनेति" इस प्रकार से की जाये तो 'गो' शब्द के उच्चारण से ज्ञात हो जाता है कि गावी, गोणी आदि अपशब्द हैं। यह शब्द के द्वारा ही शब्दों का व्याख्यान है, अतः यह तर्क समीचीन नहीं । हाँ, भव और प्रोक्तादि अर्थों में तद्धित प्रत्ययों की अनुपपत्ति की बात अवश्य उचित है, अतः इस दृष्टि से शब्द को व्याकरण मानना अनुचित ठहरता है। मूलम्—एवं तर्हि
- लक्ष्यलक्षणे व्याकरणम्— लक्ष्यं च लक्षणं चैतत्समुदितं व्याकरणं भवति । किं पुनर्लक्ष्यम्, किं वा लक्षणम् ? शब्दो लक्ष्यः, सूत्रं लक्षणम् ।