व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ महाभाष्यम् एवमप्ययं दोषः --समुदाये व्याकरणशब्दः प्रवृत्तोऽवयवे नोपपद्यते । सूत्राणि चाप्यधीयान इष्यते — वैयाकरण इति । नैष दोषः । समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्त्तन्ते । तद्यथा पूर्वे उत्तरे पञ्चालाः, तैलं भुक्तं, घृतं भुक्तं, शुक्लो नीलः कपिलः कृष्ण इति । एव- मयं समुदाये व्याकरणशब्दः प्रवृत्तोऽवयवेष्वपि वर्तते । प्रदीपः—पूर्वे पञ्चाला इति । जनपदान्तरनिवृत्तिविवक्षायामेकदेशेऽपि समुदायरूपारोपात्प्रयोगः । तैलमिति । यदौषधसंस्कृता घृततैलमात्रा भवति तदेद- मुदाहरणम् । आकृतिवाचित्वे तु घृततैलशब्दयोः संस्थानप्रमाणनिरपेक्षा सर्वत्र मुख्या वृत्तिः । शुक्ल इति । अशुक्लेऽप्यवयवेऽवयवान्तरस्य शौक्ल्यात्समुदायस्य शुक्लत्वे ' सत्या (तस्या) रोपात्प्रयोगः । अनुवाद — तो फिर — “लक्ष्य और लक्षण व्याकरण हैं”— लक्ष्य और लक्षण ये दोनों मिलकर व्याकरण होते हैं । तो फिर लक्ष्य क्या है और लक्षण क्या है ? शब्द लक्ष्य है, सूत्र लक्षण है । ऐसा होने पर भी यह दोष है — समुदाय में प्रवृत्त व्याकरण शब्द अवयव में उपपन्न नहीं हो सकता । सूत्रों का अध्ययन करने वाला वैयाकरण (रूप में) ही इष्ट होता है । यह दोष नहीं है । क्योंकि समुदायों में प्रवृत्त शब्द अवयवों में भी प्रयुक्त होते हैं । जैसे कि पूर्व पञ्चाल, उत्तर पञ्चाल, (औषध आदि के रूप में थोड़ा सा सेवन करके ही) तेल खाया, घी खाया (आदि प्रयोग), (वस्त्र के एक भाग के कारण) शुक्ल, नील, कपिल, कृष्ण आदि । इसी प्रकार समुदाय में प्रवृत्त व्याकरण शब्द (उसके) अवयव में भी प्रयुक्त होता है । उषा—सूत्र और शब्द दोनों में ही व्याकरणत्व का निरास करके सम्प्रति सिद्धान्त के रूप में इन दोनों को युगपद् व्याकरण संज्ञा से अभिहित किया गया है । व्याकरण का लक्ष्य शब्द है, सूत्रों के द्वारा शब्दों की ही प्रतिपत्ति होती है तथा सूत्र लक्षण है । लक्ष्य और लक्षण अर्थात् शब्द और सूत्र इन दोनों का समुचित नाम ही व्याकरण है । समुदाय के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले शब्द अवयव में भी प्रयुक्त हो जाते हैं । जिस प्रकार से वन के एक भाग के पुष्पित होने पर भी “पुष्पितं वनम्” तथा पट के एक भाग के शुक्ल होने पर भी “शुक्लः पटः” आदि रूप उपपन्न होते हैं उसी प्रकार से लक्ष्य और लक्षण अथवा शब्द और सूत्र रूप व्याकरण के एक भाग, अर्थात् सूत्रों में अध्ययनरत व्यक्ति को भी वैयाकरण कह दिया जाता है । “पूर्वे पाञ्चालाः” “तैलं भुक्तम्” आदि रूप भी इसी प्रकार उपपन्न होते हैं ।