भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ७५ सूत्र बनाने पड़ेंगे। अतः आकृति रूप से उदात्तादि वर्णों का ग्रहण नहीं किया जा सकता। प्रमुख संवृतादि दोष निम्नलिखित हैं— संवृत—अकार के संवृत गुण वाला होने के कारण यह अन्य आकारादि स्वरों में दोष के रूप में परिगणित किया जाता है। इसके उच्चारण में मुख बन्द रहता है । कल—स्वर का अपने स्थान से च्युत होकर स्थानान्तर से उच्चरित होना 'कल' कहलाता है। इसे काकली भी कहते हैं । ध्मात—श्वासों की तीव्र गति के कारण जहाँ ह्रस्व भी दीर्घ के समान उच्चरित होना प्रतीत होता है । एणीकृत—'ओ' और 'औ' में जहाँ अन्तर स्पष्ट नहीं हो पाता, इन दोनों का समान साधारण सा उच्चारण किया जाता है । अम्बूकृत—व्यक्त होता हुआ भी जो स्पष्ट श्रुतिगोचर न हो, प्रत्युत मुख के अन्दर ही उच्चरित होता हुआ सा प्रतीत हो अर्धक—जो स्वर दीर्घ होता हुआ भी शीघ्रता से उच्चरित होने के कारण ह्रस्व सा प्रतीत हो । ग्रस्त—जो जिह्वामूल में ही गृहीत होकर रह जाये । अन्य शिक्षाविदों के अनुसार किसी भी अव्यक्त उच्चारण को ग्रस्त कह सकते हैं । निरस्त—स्वर का कठोर और कर्कश उच्चारण निरस्त कहलाता है । प्रगीत—गाकर उच्चारण किया गया स्वर । उपगीत—समीपस्थित दूसरे वर्ण के गीत से अनुरक्त । क्ष्विण्ण—कम्पमान स्वर ध्वनि । रोमश—गम्भीर अथवा गहन । अवलम्बित—वर्णान्तर के आश्रित हुआ-हुआ । निर्हत—रूखा । सन्दष्ट—बढ़ाकर उच्चारण किया हुआ स्वर । द्रुत—शीघ्रता से उच्चरित । विकीर्ण—दूसरे वर्ण से मिला हुआ अथवा एक होता हुआ भी जो स्वर अनेक रूप में प्रतिभासित हो । ये सभी दोष स्वरों से सम्बद्ध हैं । इसके अतिरिक्त कुछ व्यञ्जन दोष भी हैं, जैसे मूर्धन्य 'ष' का 'ख' के रूप में उच्चारण, इत्यादि । परन्तु सिद्धान्ती के अनुसार यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इनकी निवृत्ति गर्गादि तथा विदादि गण पाठों से हो जाती है। क्योंकि आचार्य ने इन्हें शुद्ध ही