भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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७८ महाभाष्यम् मूलम् — यथान्यासमेवास्तु । ननु चोक्तम् — "आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेध इति ।" परिहृतमेतत् — "गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां निवृत्तिर्भविष्यतीति । ननु चान्यद् गर्गादिबिदादिपाठे प्रयोजनम् । किम् ? समुदायानां साधुत्वं यथा स्यादिति । एवं तर्ह्युभयमनेन क्रियते—पाठश्चैव विशेष्यते, कलादयश्च निवर्त्यन्ते । कथं पुनरेकेन यत्नेनोभयं लभ्यम् ? लभ्यमित्याह । कथम् ? द्विर्गता अपि हेतवो भवन्ति । तद्यथा—आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च प्रीणिता इति । तथा वाक्यानि द्विष्ठानि भवन्ति—श्वेतो धावति, अलम्बुसानां यातेति । प्रदीपः — उभयमिति । यथाभूता गर्गादिस्था अकारादयस्तथाभूता एव सर्वत्र प्रयोक्तव्या इति प्रतिपाद्यत इत्यर्थः । द्विर्गता इति । द्वावर्थौ गताः प्रयोजनद्वय- सम्पादका इत्यर्थः । तथा वाक्यान्त्यपीति । शब्दस्याप्यर्थवद् द्विगतत्वमित्यर्थः । अनुवाद — जैसे पहले कहा था । (आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति) (वही) हो । और (हमारी ओर से) कहा गया था कि आकृत्युपदेश से ही यदि सिद्धि मानी जाये तो संवृतादि (दोषों में) प्रतिषेध करना होगा । इसका तो परिहार कर दिया गया था कि गर्गादि बिदादि पाठ से संवृतादि की निवृत्ति हो जायेगी । और जो गर्गादि बिदादि पाठ का तो अन्य ही प्रयोजन है । क्या ? जिससे (तत्तत्) समुदायों का साधुत्व हो । तो फिर दोनों ही (कार्य) उसके द्वारा किये जाते हैं—पाठ को विशिष्ट किया जाता है और कलादि दोष निवृत्त किये जाते हैं । एक ही यत्न से दोनों प्राप्तियाँ कैसे हो सकती हैं ? हो सकती हैं, ऐसा कहते हैं । कैसे ? द्विष्ठ हेतु भी होते हैं । जैसे कि (आम्रवृक्ष के नीचे पितृतर्पण करने से) आम भी सिक्त हो जाते हैं और पितृतर्पण भी हो जाता है । इसी से वाक्य भी द्विष्ठ होते हैं—"श्वेतो धावति" = (श्वेत गुण वाला दौड़ता है, कुत्ता यहां से दौड़ता है) ।"