भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ७९ “अलम्बुसानां याता” (अलम्बुस) (देश को) जाने वाला, बुसों को प्राप्त करने वाला समर्थ है। उद्वा -- अन्य सम्भावनाओं पर विचार करने के अनन्तर सिद्धान्ती पुनः अपने पूर्व निरूपित पक्ष का आश्रय लेता है। अर्थात् अवर्णादि की आकृति अपने से सम्बद्ध अन्य आकृति रूपों का भी ग्रहण करवायेगी। इससे प्रसक्त होने वाले संवृतादि दोषों की निवृत्ति गर्गादि बिदादि गणपाठों से हो जायेगी। इन गणपाठों का अतिरिक्त प्रयोजन होने पर भी सिद्धान्त पक्ष में कोई दूषण उत्पन्न नहीं होता। एक ही यत्न से दो फलों की प्राप्ति लोक में देखी जाती है। आम्रवृक्ष के मूल में पितरों को जल प्रदान करने से आम्रसिंचन भी हो जाता है और पितृतर्पण भी। अर्थ की तरह से शब्दों में भी द्व्यर्थकता देखी जाती है। “श्वेतो धावति” उदाहरण में ‘श्वेत’ पद के दो प्रकार से अर्थ किये जा सकते हैं—(१) श्वेत गुण वाला और (२) श्वा + इतः इत्यादि; उसी प्रकार इन गणपाठों से समुदायों के साधुत्व का भी प्रतिपादन हो सकेगा और कलादि दोषों की निवृत्ति भी हो जायेगी। मूलम् — अथवा इदं तावदयं प्रष्टव्यः — “क्वेमे संवृतादयः श्रूयेरन्निति ।” आगमेषु । आगमाः शुद्धाः पठ्यन्ते । विकारेषु तर्हि । विकारा अपि शुद्धाः पठ्यन्ते । प्रत्ययेषु तर्हि । प्रत्यया अपि शुद्धाः पठ्यन्ते । धातुषु तर्हि । धातवोऽपि शुद्धाः पठ्यन्ते । प्रातिपदिकेषु तर्हि । प्रातिपदिकान्यपि शुद्धानि पठ्यन्ते । यानि तर्ह्यग्रहणानि प्रातिपदिकानि । एतेषामपि स्वरवर्णानुपूर्वीज्ञानार्थ उपदेशः कर्त्तव्यः । शशः षष इति मा भूत् । पलाश इति मा भूत् । मञ्चको मञ्जक इति मा भूत् ।— आगमाश्च विकाराश्च प्रत्ययाः सह धातुभिः । उच्चार्यन्ते ततस्तेषु नेमे प्राप्ताः कलादयः ॥ (इति श्रीमद्भगवत्पतञ्जलिविरचिते महाभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथमपादे प्रथमाह्निकम्) प्रदीपः — अथवेति । केवलानां वर्णानां लोके प्रयोगाभावाद्धात्वादीनां च शुद्धानां पाठात् तत्स्थत्वाच्च वर्णानां न कश्चिद्दोषः । यानि तर्हीति । डित्थादीनि ।