व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० महाभाष्यम् एतेषामपीति । शिष्टप्रयुक्तत्वेनोणादीनां पृषोदरादीनां च साधुत्वाभ्यनुज्ञानात् सर्वेषामत्र सङ्ग्रहः सिद्धः । इत्युपाध्यायजैयटपुत्रकैयटकृते महाभाष्यप्रदीपे प्रथमाध्यायस्य प्रथमपादे प्रथममाह्निकम् अनुवाद—अथवा या इससे (संवृतादि दोषों की प्रसक्ति बताने वाले से) यह पूछना चाहिए कि ये संवृत आदि कहाँ सुने जाते हैं । आगमों में । आगम तो शुद्ध पढ़े गये हैं । तो विकारों में । विकार भी शुद्ध पढ़े गये हैं । तो प्रत्ययों में । प्रत्यय भी शुद्ध पढ़े गये हैं । तो धातुओं में । धातुएँ भी शुद्ध पढ़ी गई हैं । तो प्रातिपदिकों में । प्रातिपदिक भी शुद्ध पढ़े गये हैं । तो प्रातिपदिकों का उपदेश नहीं किया गया है । इनका भी स्वर वर्णानुपूर्वी के ज्ञान के लिए उपदेश करना चाहिए (जिससे) शश (के स्थान पर) षष न हो जाये, पलाश (के स्थान पर) पलाष न हो जाये, मञ्चक (के स्थान पर) मञ्जक न हो जाये । आगम, आदेश और प्रत्ययों सहित धातुएं शुद्ध पढ़ी गई हैं, अतः (इनमें) इन कलादि (दोषों) का प्रसङ्ग नहीं है । (इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पतञ्जलि विरचित महाकाव्य में प्रथमाध्याय के प्रथम पाद में प्रथम आह्निक का अनुवाद समाप्त हुआ) उषा—"छिन्ने मूले नैव पत्रं न शाखा ।" इस समस्त विवेचन के अनन्तर भाष्यकार ने पूर्वपक्षी के मूल सिद्धान्त पर ही प्रहार किया है ! सिद्धान्ती के अनुसार आगम, आदेश, प्रत्यय, धातु आदि सभी का शुद्ध उच्चारण किया गया है । अतः इनमें कहीं भी कलादि दोषों की प्रसक्ति प्राप्त नहीं होती । अतः इन दोषों की सम्भावना करना ही व्यर्थ है । एवं च सिद्धान्ती के द्वारा पूर्वप्रतिपादित इष्टबुद्ध्यर्थ वर्णोपदेश का पक्ष सिद्ध होता है । (इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पतञ्जलि विरचित महाभाष्य में प्रथमाध्याय के प्रथम पाद में प्रथम आह्निक पर उषा व्याख्या समाप्त हुई)