भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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( ५ ) इसी द्वितीय आश्रम को गृहस्थाश्रम कहा जाता है। इसे गृहस्थाश्रम कहने का कारण मनु के व्याख्याकार कुल्लूकभट्ट ने बतलाया है— “कृतदारपरिग्रहो गृहस्थः, गृहशब्दस्य दारवचनत्वात्” (मन्वर्थमुक्तावली-३।२) इस आश्रम का मुख्य धर्म है—पञ्च-महायज्ञ¹। इस प्रसङ्ग में मनु का निम्न- लिखित पद्य स्मरणीय है – वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्म यथा-विधि । पञ्च-यज्ञ-विधानञ्च पक्तिं चान्वाहिकीं गृही ॥ ( मनु० ३।६७ ) पञ्च-महा-यज्ञ तथा अन्यान्य गृहस्थ-धर्म के विषय में मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य- स्मृति आदि का अवलोकन करना चाहिए। गृहस्थ तथा गार्हस्थ्य का महत्त्व सभी आश्रमियों तथा आश्रमों से अधिक है, जैसा मनु ने कहा है— यथा वायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व-जन्तवः । तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥ यस्मात्त्रयोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम् । गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥ ( मनु० ३।७७-७८ ) इत्यादि । इस आश्रम की अवधि ²आत्म-वार्धक्य-सम्प्राप्ति तथा पौत्रोत्पत्ति आदि मानी जाती है। यद्यपि साधारणतः यह प्रतीत होता है कि पूरी जीवनावधि को समान- समान चार भागों में विभक्त कर प्रथम-भाग को ब्रह्मचर्य में तथा द्वितीय-भाग को गार्हस्थ्य में पर्यवसन्न करना³ चाहिए, तथापि आयु की अवधि के दुर्ज्ञेय होने के कारण ब्रह्मचर्य की पूर्व-प्रतिपादित षट्त्रिंशद् वर्ष आदि एवं गृहस्थाश्रम की आत्म- वार्धक्य आदि अवधि ही शास्त्र-सिद्ध होती है। अत एव कुल्लूकभट्ट का भी कथन है— “आद्यमित्युक्तम्ब्रह्म-चर्य-कालोपलक्षणार्थम् , अनियत-परिमाणत्वादायुषः चतुर्थ- भागस्य दुर्ज्ञानत्वात् । ...........'गृहस्थस्तु यदा पश्येत् ( मनु० ६।२ ) इत्य- नियतत्वात् द्वितीयमायुषो भागमित्यपि गार्हस्थ्य-कालमेव ॥” ( मन्वर्थ-मुक्तावली-४।१ ) इस प्रसङ्ग में एक बात पर ध्यान देना चाहिए कि कुल्लूक-भट्ट आदि ने मनु के श्लोक ( ६।२ ) में 'अपत्यस्यैव चापत्यम्' पाठ मान कर आत्म-वार्धक्य तथा पौत्रो- १. गृहस्थधर्मत्वेऽपि पञ्चयज्ञानामप्रकृष्ट-धर्म-ख्यापनार्थम्पृथङ्निर्देशः । —मन्वर्थ-मुक्तावली ५।१६९ २. गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वली-पलितमात्मनः । अपत्यस्यैव चापत्यं तदाऽरण्यं समाश्रयेत् ॥ —मनु. ६।२ ३. चतुर्थमायुषो भागमुषित्वाऽऽद्यं गुरौ द्विजः । द्वितीयमायुषो भागं कृत-दारो गृहे वसेत् ॥ —मनु. ४।१