भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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( ७ ) भवति पुनश्च मदोद्भवाऽऽशङ्का नोद्भाव्यते तावत्कालं वन-वासं कृत्वा······" ( मिताक्षरा ३।५६-५७ ) इस तृतीय आश्रम के अनन्तर काल में— ‘चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सङ्गान्परिव्रजेत् ।’ मनु० ६।३३ इस परिव्राजकाश्रम में केवल ब्राह्मण का अधिकार है। दूसरे मत के अनुसार सभी द्विजातियों का अधिकार माना जाता है (मिताक्षरा ३।५६-५७)। प्रव्रजन के बिना मोक्ष के अभाव को मानने वाले मिताक्षराकार (३।५५) द्वितीय मत को ही अच्छा समझते हैं—ऐसा प्रतीत होता है। इस आश्रम के धर्मों का दिग्दर्शन याज्ञवल्क्य के अधोलिखित पद्य में होता है— सर्व-भूत-हितः शान्तस्त्रिदण्डी सकमण्डलुः । एकारामः परिव्रज्य भिक्षार्थी ग्राममाश्रयेत् ॥ या० स्मृ० ३।५८ इस आश्रम-धर्म का सम्बन्ध केवल द्विजातियों से है। साथ ही सभी आश्रमों में व्युत्क्रम नहीं होता है; हाँ, उल्लङ्घन हो सकता¹ है। इस विषय में भागवत के विशिष्ट विचार का अवलोकन डा० सिद्धेश्वर भट्टाचार्यकृत ‘The Philosophy of the श्रीमद्भागवत’ (पृ० ३४) में करना चाहिए। श्रीमद्भाग- वत के विचार का मूल तो मनुस्मृति में ही है, जिसका अन्वेषण मनीषियों के लिए असाध्य नहीं है। (३) वर्णाश्रम-धर्म का अर्थ है वर्ण-विशेष के आश्रम-विशेष से सम्बद्ध धर्म। उदाहरणार्थ— ब्राह्मणो बैल्व-पालाशौ क्षत्रियो वाट-खादिरौ । पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः ॥ ( मनु० २।४५ ) आदि को लिया जा सकता है। (४) गुण-धर्म का अर्थ विज्ञानेश्वर के शब्दों में इस प्रकार किया गया है— “शास्त्रीयाभिषेकादिगुण-युक्तस्य राज्ञः प्रजा-परिपालनादिः” ( मिताक्षरा १।१ ) (५) निमित्त-धर्म का अर्थ प्रायश्चित्त होता है। (६) साधारण-धर्म का वर्णन मनु ने इस प्रकार किया है— धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय-निग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म-लक्षणम् ॥ ( मनु० ६।९२ )


१. ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत् , गृही भूत्वा वनी भवेत् , वनी भूत्वा प्रव्रजेत, यदि वेतरथा ब्रह्म-चर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा । जाबाल उपनिषत्-४; और भी देखिए—मन्वर्थ-मुक्तावली ६।३८; तथा मिताक्षरा ३।५६-५७ ।