भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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( ६ ) इज्याचार-दमाहिंसा-दान-स्वाध्याय-कर्मणाम् । अयन्तु परमो धर्मो यद् योगेनात्म-दर्शनम् ॥ ( या० स्मृ० १।८ ) अतः उपर्युक्त आक्षेप निराधार है । धर्म-शास्त्र प्रवर्त्तक ऋषि याज्ञवल्क्यस्मृति में धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तक ऋषियों का नाम-निर्देश निम्न-लिखित श्लोकों में किया गया है— मन्वत्रि-विष्णु-हारीत-याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः । यम!पस्तम्ब-संवर्ताः कात्यायन-बृहस्पती ॥ पराशर-व्यास-शङ्ख-लिखिता दक्ष-गौतमौ । शातातपो वशिष्ठश्च धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तकाः ॥ (या० स्मृति० १।४-५) इसकी व्याख्या में आदित्य-देव ने एक गौतम-सूत्र को उद्धृत किया है— अत्र ¹गौतमः—स्मृतिधर्म-शास्त्राणि, तेषामप्रणेतारः मनु-विष्णु-दक्षा-ङ्गिरोऽत्रि- बृहस्पत्युशन-आपस्तम्ब-गौतम-संवर्त-आत्रेय-कात्यायन-शङ्ख-लिखित-पराशर-व्यास- शातातप-प्रचेतो-याज्ञवल्क्यादयः ।' ( अपरार्कव्याख्या या० स्मृ० १।४-५ ) शङ्ख-लिखित के कथनानुसार धर्मशास्त्र-प्रणेताओं की सूची निम्न-लिखित है— "तथा च शङ्ख-लिखितौ—स्मृतिधर्म-शास्त्राणि; तेषामप्रणेतारः मनु-विष्णु- यम-दक्षाङ्गिरोऽत्रि-बृहस्पत्युशन-आपस्तम्ब-वसिष्ठ-कात्यायन-पराशर-व्यास-शङ्ख- खित-संवर्त-गौतम-शातातप-हारीत-याज्ञवल्क्य-प्राचेतसादयः" । ( वीरमित्रोदय या० स्मृ०.१।४-५; तथा वी० मि० परिभाषाप्रकाश पृ० १६ ) परन्तु बालम्भट्टी में 'शंखश्च' प्रतीक के अन्तर्गत जो उद्धरण है उसमें मनु, विष्णु, यम, दक्ष तथा अङ्गिरा का उल्लेख नहीं है । प्राचेतसादयः में प्रयुक्त 'आदि' शब्द से ग्राह्य ऋषियों का विवरण बालम्भट्टी में इस प्रकार है— “आदिना बुध देवल-सुमन्तु-जमदग्नि-विश्वामित्र-प्रजापति-पैठीनसि-पितामह- बौधायन-च्छागलेय-जाबाल-च्यवन-मरीचि-कश्यपाः² ॥” ( बालम्भट्टी पृ० ९ ) देवल का निर्देश इस प्रकार है— मनुर्यमो वशिष्ठोऽत्रिर्दत्तो विष्णुस्तथाऽङ्गिराः । उशना वाचस्पतिर्व्यास आपस्तम्बोऽथ गौतमः ॥ कात्यायनो नारदश्च याज्ञवल्क्यः पराशरः । सम्वर्तश्चैव शङ्खश्च हारीतो लिखितस्तथा³ ॥ (बालम्भट्टी पृ० ९) १. वर्त्तमान गौतम-धर्म-शास्त्र में यह अंश उपलब्ध नहीं है । २. कृत्य-रत्नाकर में 'सोम' का नाम इससे अधिक है। कृ० र० पृ० २९ ३. कृत्य-रत्नाकर (पृ. २९) में 'यमः' प्रतीक के अन्दर ये ही श्लोक अविकल रूप में दिये गए हैं ।