याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) मार्कण्डेय-स्मृति में मनु, गौतम, कश्यपादि, पराशर, वेद-व्यास, शङ्ख, लिखित तथा कात्यायन का निर्देश किया गया है । ( मा० स्मृ० स्मृति-सन्दर्भ भाग ६, पृ० ६३, कलकत्ता ) ‘चतुर्विंशतिमत’ में याज्ञवल्क्य-निर्दिष्ट २० ऋषियों में से कात्यायन तथा लिखित को छोड़कर अन्य १८ तथा गार्ग्य, नारद, बौधायन, वत्स, विश्वामित्र एवं शंख (शांखायन ?) का निर्देश है। ( म० म० काणे-‘Hisoty of Dharmashashta’ पृ० १३३ ) आपस्तम्बने १० धर्म-शास्त्राचार्यों का निर्देश किया है—एक (किसी ऋषि- विशेष के लिए निर्दिष्ट है), कण्व, काण्व, कुणिक, कुत्स, कौत्स, पुष्करसादि, वार्ष्यायणि, श्वेतकेतु तथा हारीत । बौधायन ने हारीत के साथ-साथ औपजङ्घनि, कात्य, काश्यप, गौतम, प्रजापति, मनु तथा मौद्गल्य का उल्लेख किया है । ( Introduction to the बृहस्पतिस्मृति, P. 88, Footnote-2 ) भारद्वाजस्मृति में भी दिग्दर्शन-क्रम में निम्नलिखित ऋषियों का उल्लेख किया गया है— भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च शाण्डिल्यो रोहितः क्रतुः । हरितो (हारीतो ?) गौतमो गर्गः शङ्खः कालातपोऽङ्गिराः ॥ मार्कण्डेयश्च माण्डव्यः कपिलो नारदः शुकः। जमदग्निर्याज्ञवल्क्यो विश्वामित्रः पराशरः ॥ एते वाऽन्येऽपि मुनयो धर्मज्ञा धर्म तत्पराः ॥ ( भा० स्मृ० १।३-५ ) पराशर-स्मृति का विवरण भी निम्न-लिखित है— श्रुता मे मानवा धर्माः वासिष्ठाः काश्यपास्तथा । गार्गीया गौतमीयाश्च तथा चौशनसाः स्मृताः ॥ अत्रेर्विष्णोश्च संवर्त्ताद्दक्षादाङ्गिरसस्तथा । शातातपाश्च हारीतात् याज्ञवल्क्यात्तथैव च ॥ आपस्तम्बकृता धर्माः शङ्खस्य लिखितस्य च । कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसान्मुनेः ॥ ( पराशरस्मृति-१।१२-१६।) गरुड़-पुराण ( ९३।४-६) में याज्ञवल्क्य के स्थान में अहम् (=गरुड) को रखकर अतिरिक्त ऋषियों का निर्देश याज्ञवल्क्यस्मृति के समान ही किया गया है । अग्निपुराण में तो याज्ञवल्क्य-स्मृति का ही (यत्र तत्र क्रम-परिवर्तन के साथ) रूपान्तर मिलता है— मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्क्यो हारीतोऽत्रियंमोऽङ्गिराः । वसिष्ठ-दत्त-संवर्त्त-शातातप-पराशराः ॥ आपस्तम्बौशनो-व्यासाः कात्यायन-बृहस्पती । गोतमः शङ्ख-लिखितौ धर्ममेते यथाऽब्रुवन् ॥ ( अग्निपुराण-अ० १६२, श्लो० १-२)