भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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( ११ ) वर्त्तमान संगृहीत बृहस्पति-स्मृति (बड़ौदा) में यथावसर मनु (पृ० १९, ३९, ८४ आदि), गौतम (पृ० २०८), कात्यायन (पृ० १०६), उशना (पृ० ३०१), बृहस्पति (पृ० ३०१, ५५० आदि), अङ्गिरा (पृ० ३७८), आपस्तम्ब (पृ० ३७८), गर्ग (पृ० २८३), जीव (पृ० २६२), देवेन्द्रगुरु (२८९), पञ्च- शिख (पृ० २३१), पराशर (२३३), पाराशर (पृ० ३२६), पितामह (पृ० ९१), प्रजापति (पृ० ३५८), भार्गव (पृ० २३३), वसिष्ठ (पृ० १०३), व्यास (पृ० ३२०), शंख-लिखित (पृ० २३३), शाकटायन (पृ० ३६३), शौनक (पृ० २२७), स्वयम्भू (पृ० ३०४ आदि) तथा भृगु (पृ० ६६) का निर्देश किया गया है। इन नामों में कुछ का पर्यायत्व भी सम्भावित है। जैसे-बृहस्पति, जीव, देवेन्द्र- गुरु शब्द प्रायशः एक ही व्यक्ति के लिए निर्दिष्ट हुए हैं। इसी प्रकार पितामह तथा प्रजापति शब्द समानार्थक प्रतीत होते हैं। परन्तु निर्णीत रूप में कुछ कहना कठिन है। पैठीनसि ने ३६ स्मृतिकारों का निर्देश किया है- तेषां मन्वङ्गिरो-व्यास-गौतमाऽप्युशनो-यमाः । वसिष्ठ-दक्ष-संवर्त्त-शातातप-पराशराः ॥ विष्ण्वापस्तम्ब-हारीताः शङ्खः कात्यायनो भृगुः । प्रचेता नारदो योगी बौधायन-पितामहौ ॥ सुमन्तुः कश्यपो बभ्रुः पैठीनो व्याघ्र एव च । सत्य-व्रतो भरद्वाजो गार्ग्यः कार्णाजिनिस्तथा ॥ जावालिर्जमदग्निश्च लौगाक्षिर्ब्रह्म-सम्भवः । इति धर्म-प्रणेतारः षट्त्रिंशदृषयस्तथा ॥ (स्मृति-चन्द्रिका पृ० १, वी० मि० परि० प्र० पृ० १५) ये छत्तीस ही स्मृतियाँ हैं या स्मृति-कार हैं ऐसी बात नहीं है। यह तो उप- लक्षण है। अतः स्मृतिचन्द्रिकाकार का कथन है:- "ननु चेयम् परिसंख्या ? मैवम् ; तथा सति वत्स-मरीचि-देबल-पारस्कर- क्रतु-ऋष्यशृङ्ग-शिखर-छागलेयात्रेयादीनां धर्म-शास्त्र-प्रणेतृत्वं न स्यात्”। (स्मृ० च० पृ० १) वीर-मित्रोदय में प्रयोग-पारिजात के कुछ श्लोक उद्धृत हुए हैं जिनमें ३६ स्मृतियों का वर्गीकरण स्मृतियों तथा उपस्मृतियों में हुआ है- मनुर्बृहस्पतिर्दक्षो गौतमोऽथ यमोऽङ्गिराः । योगीश्वरः प्रचेताश्च शातातप-पराशरौ ॥ संवर्त्तोशनसौ शङ्ख-लिखितावत्रिरेव च । विष्ण्वापस्तम्ब-हारीता धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तकाः ॥ एते ह्यष्टादश प्रोक्ताः मुनयो नियत-व्रताः । जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षि-काश्यपौ ॥ व्यासः सनत्कुमारश्च सुमन्तुश्च पितामहः ।