याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) व्याघ्रः कार्ष्णाजिनिश्चैव जातूकर्णः कपिञ्जलः ॥ बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च । पैठीनसिर्गोभिलश्च उपस्मृति-विधायकाः ॥ यद्यपि उपस्मृति-विधायकों की नामावली का उपसंहार यहीं प्रतीत होता है तथापि और भी २१ स्मृति-कारों का नाम-निर्देश तीन श्लोकों में किया गया है— वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः । बभ्रुः कार्ष्णाजिनिः सत्य-व्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥ जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । आत्रेयः छागलेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥ पारस्कर-ऋष्यशृङ्गौ वैजवापस्तथैव च । इत्यन्ये स्मृति-कर्त्तार एकविंशतिरीरिताः ॥ यद्यपि याज्ञवल्क्य-स्मृति (श्लोक० १।४-५) की व्याख्या में मित्र-मिश्र इन स्मृतियों को स्पष्टतः उपस्मृति नहीं कहते हैं तथापि 'परिभाषा-प्रकाश' (पृ० १८) में इन सभी श्लोकों के बाद "एते एवोपस्मृतिकर्त्तारो मदनरत्ने- प्युक्ताः" कह कर इन सब को उपस्मृति मानने के पक्ष में ही प्रतीत होते हैं। परन्तु 'जावालिनौचिकेताश्च' आदि में परिगणित सुमन्तु, पितामह तथा कार्ष्णा- जिनि का 'वसिष्ठो नारदश्चैव' आदि श्लोकों द्वारा परिगणित २१ स्मृति-कर्त्ताओं में पुनरुल्लेख है। अतः उपस्मृतिकारों की संख्या ३६ होनी चाहिए। एक ही स्थान में पुनरुक्ति का आधार समझ में नहीं आता ! किन्तु उपर्युक्त सूची भी पर्याप्त नहीं है, इसे केवल दिग्दर्शक समझना चाहिए, कारण इनके अतिरिक्त स्मृतिकारों का भी उल्लेख धर्मशास्त्र-निबन्धों में मिलता है। उदाहरणार्थ 'निर्णयसिन्धु' में लग-भग १२५ से भी अधिक स्मृति- कारों के वचन उद्धृत हैं। भविष्यपुराण में भी स्मृतियों की संख्या का निर्देश अस्पष्ट रूप में स्मृतियों के आनन्त्य का ही प्रतिपादक प्रतीत होता है। 'स्मृति-मुक्ताफल' में तो ८८००० ऋषियों को धर्मप्रवर्त्तक बतलाया गया है— अष्टाशीति-सहस्राणि मुनयो गृहमेधिनः । पुनरावर्त्तिनो बीज-भूताः धर्म-प्रवर्त्तकाः ॥ (स्मृति-मुक्ताफल, पृ० ८) इस विचित्र परिस्थिति में सभी स्मृतिकारों का नाम-निर्देश तो असम्भव- प्रायः ही है। डा० काणे ने स्मृति-परम्परा का यथासम्भव विशद् वर्णन अपने ग्रन्थ 'History of Dharma-Shastra' में किया है। इस ग्रन्थ से बहुत स्मृति- कारों का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। याज्ञवल्क्य-स्मृति ( क ) याज्ञवल्क्य परिचय याज्ञवल्क्य-स्मृति शब्द से साधारणतः यह प्रतीत होता है कि यह स्मृति याज्ञवल्क्य के द्वारा बनाई हुई है। महाभारत के शान्तिपर्व के ३१२वें अध्याय