भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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( १३ ) में, शतपथब्राह्मण (१४।९।४।३३) तथा भागवत (१०।६।११-७४) में यह बतलाया गया है कि याज्ञवल्क्य वैशम्पायन के शिष्य थे । वैशम्पायन से उन्होंने विद्या- ग्रहण, विशेषतः यजुर्वेद का अध्ययन, किया था। परन्तु एक समय गुरु-शिष्य में मतभेद के कारण याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु की विद्या को वान्त ( Vomitted ) कर दिया और पुनः भगवान् सूर्य की आराधना कर मध्याह्नकाल में सूर्य से यजुर्वेद का अध्ययन किया। इसी यजुर्वेद को 'शुक्ल यजुर्वेद' तथा मध्यन्दिन में सूर्य से अधिगत होने से 'माध्यन्दिन-संहिता' भी कहा जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद् में विदेह जनक के गुरु के रूप में भी याज्ञवल्क्य का वर्णन विस्तृत रूप में पाया जाता है। बृहदारण्यक के तृतीय अध्याय में यह बतलाया गया है कि विदेह जनक ने अपने यज्ञ में सभी प्रदेशों के ब्रह्म-ज्ञानियों को आमन्त्रित किया था। सभी के उपस्थित होने पर जनक ने उन सब के समक्ष अपना विज्ञापन किया- “यो वो ब्रह्मिष्ठः स एताः गाः उदजताम्”। जनक के विज्ञापन को सुन कर सभी मौन हो गए थे। कुछ समय के पश्चात् याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्यों से उन गायों को ले जाने के लिए कहा। इस पर सभी क्रुद्ध हो गये और याज्ञवल्क्य के साथ उन सबों का क्रमशः शास्त्रार्थ ( ब्रह्म के विषय में ) हुआ। इस शास्त्रार्थ का स्वरूप वस्तुतः 'जल्प' ( विजिगीषुद्धयस्य कथा जल्पः ) था। जैसा कि जल्प के लक्षण से ही स्पष्ट है, इस कथा में उचित-अनुचित का विवेक नहीं सा रहता है। याज्ञवल्क्य भी इस अपकर्ष से रहित नहीं रह सके। उन्हें भी समय-समय पर त्रास-प्रदर्शन, शाप-दान आदि करना पड़ा। इन्हीं अपकर्षों के कारण विद्यारण्य स्वामी ने अपने जीवन्मुक्ति-विवेक ( पृ० २५७-२६२) में याज्ञवल्क्य के विषय में यह उपसंहार किया है— “तस्मात् किम्बहुना ? ब्रह्मविदां याज्ञवल्क्यादीनामस्त्येव मलिन-वासनाऽ- नुवृत्तिः ।” ( जी० मु० वि० पृ० २६२ ) ( ख ) प्रकृत स्मृति का कर्त्ता प्रकृत स्मृति के कर्त्ता उपर्युक्त याज्ञवल्क्य ही हैं या कोई अन्य व्यक्ति-यह प्रश्न कुछ जटिल सा है। प्राचीन परम्परा के अनुसार बृहदारण्यक के याज्ञवल्क्य ही इस स्मृति के प्रणेता माने जाते हैं। आदित्य देव ने लिखा है—“अस्याश्च संहितायाः याज्ञवल्क्यः प्रणेतेति व्याख्यातॄणां स्मृतिरेव प्रमाणम्” ( अपरार्क १।१)। याज्ञवल्क्य-स्मृति में भी एक श्लोक है जो स्पष्टतः इस स्मृति के कर्त्ता के रूप में बृहदारण्यक के याज्ञवल्क्य को ही प्रस्तुत करता है— ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान् । योग-शास्त्रञ्च मत्प्रोक्तं ज्ञेयं योगमभीप्सता ॥ (या० स्मृ० ३।११०) परन्तु मिताक्षराकार ने प्रथम श्लोक के अवतरण में लिखा है—“याज्ञवल्क्य- शिष्यः कश्चित्प्रश्नोत्तररूपं याज्ञवल्क्य-प्रणीतं धर्म-शास्त्रं कथयामास” । इस कथन १. अस्ति हि याज्ञवल्क्यस्य ......... भूयान् विद्यामदः । तैः सर्वैरपि विजिगीषु- कथायामप्रवृत्तत्वात् । — जीवन्मुक्तिविवेक पृ. २५७ ( आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थमाला )