याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 20, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ें( १४ )
के आधार पर प्रा० काणे इस स्मृति को याज्ञवल्क्य-प्रणीत नहीं मानते । उनकी दृष्टि में उपर्युक्त 'ज्ञेयं चारण्यकम्' आदि श्लोक भी रचयिता का कपट-प्रबन्ध मात्र सा प्रतीत होता है। प्रो० काणे ने अपने मत को इस प्रकार प्रस्तुत किया है :— This ( ज्ञेयं चारण्यकमहम् ) is simply put in to glorify the याज्ञवल्क्य- स्मृति as the work of a great and ancient Sage, Philosopher and Yogin. From the style and doctrines of the स्मृति it is impossible to believe that it was the work of the same hand that gave to the world the उपनिषद् containing the boldest philosophical speculation couched in the simplest yet the most effective language. Even orthodox Indian opinion was not prepared to admit the unity of authorship in the case of the स्मृति and the आरण्यक. ( History of Dharmas'āstra, P. 169, Vol. I ) यद्यपि मेरा दुराग्रह नहीं है कि प्राचीन-परम्परा ही सत्य है, तथाऽपि डा० काणे द्वारा उपस्थापित युक्तियों में कुछ प्रबलता नहीं दीख पड़ती है। यदि याज्ञवल्क्य से भिन्न किसी व्यक्ति की यह रचना है तो उस व्यक्ति का नाम इस स्मृति से सर्वथा विलुप्त क्यों हो गया—यह एक समस्या हो जाती है। किसी प्रबल कारण के अभाव में अपनी रचना को दूसरे महा-पुरुष के नाम से प्रसिद्ध कराने में लेखक की प्रवृत्ति को मनो-विज्ञान से समर्थन नहीं सा मिलता है। भाषा के आधार पर दोनों में भेद मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि वास्तविक दृष्टि से भाषा का सम्बन्ध व्यक्ति से होता है न कि देश से । अवस्था-भेद के अनुसार एक व्यक्ति की भाषा तथा रीति में परिवर्तन के उदाहरण भी कम नहीं हैं। यदि विज्ञानेश्वर के कथनानुसार याज्ञवल्क्य के किसी शिष्य को ही इस स्मृति का प्रणेता मान लिया जाय तब भी श्रद्धेय प्रो० काणे द्वारा अभिप्रेत भाषा-तारतम्य, रीति-तारतम्य तथा वस्तु-तारतम्य का उचित समाधान प्रायशः असम्भव ही है । दूसरी बात यह भी है कि स्वयम् विज्ञानेश्वर भी इस विषय में व्यामुग्ध ( Confused ) से प्रतीत होते हैं कि इस स्मृति के प्रणेता कौन हैं। पहले तो उन्होंने मान लिया है कि याज्ञवल्क्य के किसी शिष्य ने इस स्मृति की रचना की थी, परन्तु ४-५ श्लोकों की व्याख्या मेंउन्हों ने दो बार “याज्ञवल्क्य-प्रणीतस्य” तथा “याज्ञवल्क्य- प्रणीतम्” कहा है। एवञ्च विज्ञानेश्वर के आधार पर कुछ निर्णय करना तो वाञ्छ- नीय नहीं होना चाहिये। इसके अतिरिक्त आचाराध्याय के द्वितीय श्लोक में— “मिथिलास्थः स योगीन्द्रः” कहा गया है जिससे भी प्राचीन-परम्परा का ही समर्थन होता है। सभी श्लोकों को प्रक्षिप्त या विक्षिप्त मान कर कुछ निर्णय कर लेना कहाँ तक न्याय्य है—यह विचारणीय है। अतः जब तक कुछ सङ्केतु न मिले तब तक केवल हेत्वाभास के आधार पर ही निगमन नहीं करना चाहिए प्रत्युत इस स्मृति के कर्त्ता के विषय में उपस्थित