भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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( १५ ) समस्या का उपसंहार सन्देह में ही करना उचित है। योगि-याज्ञवल्क्य आदि, प्राचीन की दृष्टि में, इस याज्ञवल्क्य से अभिन्न परन्तु नवीनों की दृष्टि में भिन्न, माने जाते हैं। ( ग ) याज्ञवल्क्य स्मृति की श्लोक-संख्या याज्ञवल्क्य-स्मृति की श्लोक-संख्या के विषय में विश्वरूपाचार्य, विज्ञानेश्वर तथा अपरादित्य का मत एक नहीं है। विश्वरूप के अनुसार याज्ञवल्क्य- स्मृति में १००३, विज्ञानेश्वर के मत में १००९ और अपरादित्य की व्याख्या में १००६ श्लोक पाये जाते हैं। व्याख्याओं में अनुपलब्ध परन्तु कुछ मूल पुस्तकों में उपलब्ध—"श्लोकानामपि विज्ञेयं सहस्रं चतुरुत्तरम्” के आधार पर तो मूल-श्लोकों की संख्या १००४ प्रतीत होती है । मित्र-मिश्र ने विज्ञानेश्वर का ही अनुसरण किया है । शूलपाणि ने अपनी व्याख्या में १०१० श्लोक माने हैं । व्याख्यात श्लोकों में विषमता के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी श्लोक हैं जिनका सङ्केत केवल मूल पुस्तक में है, किसी भी व्याख्या में नहीं। उदाहरणार्थ, आचाराध्याय में और भी कुछ श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं—२३३ एवं २३४ श्लोकों के मध्य में अर्ध-श्लोक है—"अपहता इति तिलान् विकीर्य च समन्ततः ।” इसी प्रकार ३०८ तथा ३०९ श्लोकों के मध्य में एक श्लोक है— ग्रहाणामिदमातिथ्यं कुर्यात् संवत्सरादपि । आरोग्य-बल-सम्पन्नो जीवेस्स शरदः शतम् ॥ व्यवहाराध्याय के अन्त में भी मूल पुस्तक में निम्न-लिखित तीन श्लोक अधिक हैं— ( १ ) राजभिर्दत्त-दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ( २ ) एवमुद्धृतदण्डानां विशुद्धिः पापकर्मिणाम् । स्व-धर्म-स्थापनाद्राजा प्रजाभ्यो धर्ममश्नुते ॥ ( ३ ) यत्र दण्ड-विधिर्नोक्तः सर्वैरेव महात्मभिः । देश-कालादि सञ्चिन्त्य तत्र दण्डो विधीयते ॥ इसी प्रकार प्रायश्चित्ताध्याय के अन्त में भी कुछ श्लोक पाये जाते हैं— ( १ ) विप्रेष्वपि विशेषेण धार्या वाजसनेयिकैः । इच्छद्भिः श्रेयसि फलमिह लोकै परत्र च ॥ ( २ ) यदवाप्तं मया देवाद्रादित्याद्वै सनातनम् । तद्वै सर्वमिदम्परोक्तं श्रुति-स्मृत्यभिसम्मतम् ॥ ( ३ ) निःश्रेयस-करं नृणां शास्त्रं देवर्षि-सेवितम् । ज्ञात्वा ये ह्यध्यवस्यन्ति तेऽन संयान्ति वै पुनः ॥ (ये तीन श्लोक मिताक्षरा के ३२७ तथा ३२८ श्लोकों के मध्य में पाये जाते हैं।)