याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) ( ४ ) धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ॥ कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात् प्रजाम् ॥ ( यह श्लोक मिताक्षरा के ३३० तथा ३३१ के बीच में पाया जाता है । ) ( ५ ) निर्जित्य वादे देवान् वै ऋषीन् सर्वानुपस्थितान् । गा बोधेनाहतास्तस्मै नमो ब्राह्मण-हेतवे ॥ ( ६ ) अध्याय-त्रय-संक्षिप्तं सर्वेषां बुद्धि-वर्धनम् । अनुष्टुप्छन्दसा ह्येतत् याज्ञवल्क्येन भाषितम् ॥ ( ७ ) सर्व-पाप-हरं पुण्यं सुप्रसन्नं समञ्जसम् । श्लोकानामपि विज्ञेयं सहस्रं चतुरुत्तरम् ॥ ( ८ ) आदित्यस्य प्रसादेन प्राप्तवान् यो यजुर्गणम् । प्रणमेद्याज्ञवल्क्यं तं पिप्पलादगुरोरलम् ॥ ( ये श्लोक सर्वान्त में पाये जाते हैं । ) यद्यपि कुछ श्लोक तो स्पष्टतः अनावश्यक प्रतीत होते हैं तथापि मूल पुस्तक में उपलब्ध होने के कारण यहाँ उल्लिखित हुए हैं । श्लोक-संख्या में वैषम्य के अतिरिक्त पाठान्तर तो बहुत ही हैं ( विशेषतः बालकीडा मिताक्षरा तथा अपरार्क में ) । यद्यपि प्राचीन ( निर्णयसागर के ) मिताक्षरा-संस्करण में पाठान्तरों का कुछ निर्देश था तथापि प्रस्तुत संस्करण में उसका लोप ही कर दिया गया । इसका कारण प्रकाशक तथा हिन्दी-व्याख्याता ही जानते हैं । म० म० पी० वी० काणे ने कुछ पाठान्तरों का विवेचन भी प्रस्तुत किया है । जिज्ञासुओं को इसके लिए उनका ‘History of Dharma-Shastra’ देखना चाहिए । याज्ञवल्क्य स्मृति का विषय-विवरण सम्पूर्ण याज्ञवल्क्य स्मृति तीन अध्यायों से विभक्त है—आचाराध्याय, व्यवहाराध्याय तथा प्रायश्चित्ताध्याय । प्रथम आचाराध्याय में १३ प्रकरण हैं—( १ ) उपोद्घात-प्रकरण ( श्लो० १-९ ), ( २ ) ब्रह्मचारि-प्रकरण (श्लो० १०-५०), ( ३ ) विवाह-प्रकरण (श्लो० ५१-८९ ), ( ४ ) जाति-वर्ण-विवेक-प्रकरण ( श्लो० ९०-९६ ), ( ५ ) गृहस्थ- धर्म-प्रकरण ( श्लो० ९७-१२८ ), ( ६ ) स्नातक-व्रत-प्रकरण (श्लो० १२९-१६६), ( ७ ) भक्ष्याऽभक्ष्य-प्रकरण ( श्लो० १६७-१८१ ), ( ८ ) द्रव्य-शुद्धि-प्रकरण ( श्लो० १८२-१९७), ( ९ ) दान-धर्म-प्रकरण (श्लो० १९८-२१६), ( १० ) श्राद्ध- प्रकरण ( श्लो० २१७-२७० ), ( ११ ) गण-पति-कल्प-प्रकरण (श्लो० २७१-२९४), ( १२ ) ग्रह-शान्ति-प्रकरण ( श्लो० २९५-३०८ ), ( १३ ) राज-धर्म-प्रकरण ( श्लो० ३०९-३६८ ) ।