याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
( १० ) मार्कण्डेय-स्मृति में मनु, गौतम, कश्यपादि, पराशर, वेद-व्यास, शङ्ख, लिखित तथा कात्यायन का निर्देश किया गया है । ( मा० स्मृ० स्मृति-सन्दर्भ भाग ६, पृ० ६३, कलकत्ता ) ‘चतुर्विंशतिमत’ में याज्ञवल्क्य-निर्दिष्ट २० ऋषियों में से कात्यायन तथा लिखित को छोड़कर अन्य १८ तथा गार्ग्य, नारद, बौधायन, वत्स, विश्वामित्र एवं शंख (शांखायन ?) का निर्देश है। ( म० म० काणे-‘Hisoty of Dharmashashta’ पृ० १३३ ) आपस्तम्बने १० धर्म-शास्त्राचार्यों का निर्देश किया है—एक (किसी ऋषि- विशेष के लिए निर्दिष्ट है), कण्व, काण्व, कुणिक, कुत्स, कौत्स, पुष्करसादि, वार्ष्यायणि, श्वेतकेतु तथा हारीत । बौधायन ने हारीत के साथ-साथ औपजङ्घनि, कात्य, काश्यप, गौतम, प्रजापति, मनु तथा मौद्गल्य का उल्लेख किया है । ( Introduction to the बृहस्पतिस्मृति, P. 88, Footnote-2 ) भारद्वाजस्मृति में भी दिग्दर्शन-क्रम में निम्नलिखित ऋषियों का उल्लेख किया गया है— भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च शाण्डिल्यो रोहितः क्रतुः । हरितो (हारीतो ?) गौतमो गर्गः शङ्खः कालातपोऽङ्गिराः ॥ मार्कण्डेयश्च माण्डव्यः कपिलो नारदः शुकः। जमदग्निर्याज्ञवल्क्यो विश्वामित्रः पराशरः ॥ एते वाऽन्येऽपि मुनयो धर्मज्ञा धर्म तत्पराः ॥ ( भा० स्मृ० १।३-५ ) पराशर-स्मृति का विवरण भी निम्न-लिखित है— श्रुता मे मानवा धर्माः वासिष्ठाः काश्यपास्तथा । गार्गीया गौतमीयाश्च तथा चौशनसाः स्मृताः ॥ अत्रेर्विष्णोश्च संवर्त्ताद्दक्षादाङ्गिरसस्तथा । शातातपाश्च हारीतात् याज्ञवल्क्यात्तथैव च ॥ आपस्तम्बकृता धर्माः शङ्खस्य लिखितस्य च । कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसान्मुनेः ॥ ( पराशरस्मृति-१।१२-१६।) गरुड़-पुराण ( ९३।४-६) में याज्ञवल्क्य के स्थान में अहम् (=गरुड) को रखकर अतिरिक्त ऋषियों का निर्देश याज्ञवल्क्यस्मृति के समान ही किया गया है । अग्निपुराण में तो याज्ञवल्क्य-स्मृति का ही (यत्र तत्र क्रम-परिवर्तन के साथ) रूपान्तर मिलता है— मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्क्यो हारीतोऽत्रियंमोऽङ्गिराः । वसिष्ठ-दत्त-संवर्त्त-शातातप-पराशराः ॥ आपस्तम्बौशनो-व्यासाः कात्यायन-बृहस्पती । गोतमः शङ्ख-लिखितौ धर्ममेते यथाऽब्रुवन् ॥ ( अग्निपुराण-अ० १६२, श्लो० १-२)
( ११ ) वर्त्तमान संगृहीत बृहस्पति-स्मृति (बड़ौदा) में यथावसर मनु (पृ० १९, ३९, ८४ आदि), गौतम (पृ० २०८), कात्यायन (पृ० १०६), उशना (पृ० ३०१), बृहस्पति (पृ० ३०१, ५५० आदि), अङ्गिरा (पृ० ३७८), आपस्तम्ब (पृ० ३७८), गर्ग (पृ० २८३), जीव (पृ० २६२), देवेन्द्रगुरु (२८९), पञ्च- शिख (पृ० २३१), पराशर (२३३), पाराशर (पृ० ३२६), पितामह (पृ० ९१), प्रजापति (पृ० ३५८), भार्गव (पृ० २३३), वसिष्ठ (पृ० १०३), व्यास (पृ० ३२०), शंख-लिखित (पृ० २३३), शाकटायन (पृ० ३६३), शौनक (पृ० २२७), स्वयम्भू (पृ० ३०४ आदि) तथा भृगु (पृ० ६६) का निर्देश किया गया है। इन नामों में कुछ का पर्यायत्व भी सम्भावित है। जैसे-बृहस्पति, जीव, देवेन्द्र- गुरु शब्द प्रायशः एक ही व्यक्ति के लिए निर्दिष्ट हुए हैं। इसी प्रकार पितामह तथा प्रजापति शब्द समानार्थक प्रतीत होते हैं। परन्तु निर्णीत रूप में कुछ कहना कठिन है। पैठीनसि ने ३६ स्मृतिकारों का निर्देश किया है- तेषां मन्वङ्गिरो-व्यास-गौतमाऽप्युशनो-यमाः । वसिष्ठ-दक्ष-संवर्त्त-शातातप-पराशराः ॥ विष्ण्वापस्तम्ब-हारीताः शङ्खः कात्यायनो भृगुः । प्रचेता नारदो योगी बौधायन-पितामहौ ॥ सुमन्तुः कश्यपो बभ्रुः पैठीनो व्याघ्र एव च । सत्य-व्रतो भरद्वाजो गार्ग्यः कार्णाजिनिस्तथा ॥ जावालिर्जमदग्निश्च लौगाक्षिर्ब्रह्म-सम्भवः । इति धर्म-प्रणेतारः षट्त्रिंशदृषयस्तथा ॥ (स्मृति-चन्द्रिका पृ० १, वी० मि० परि० प्र० पृ० १५) ये छत्तीस ही स्मृतियाँ हैं या स्मृति-कार हैं ऐसी बात नहीं है। यह तो उप- लक्षण है। अतः स्मृतिचन्द्रिकाकार का कथन है:- "ननु चेयम् परिसंख्या ? मैवम् ; तथा सति वत्स-मरीचि-देबल-पारस्कर- क्रतु-ऋष्यशृङ्ग-शिखर-छागलेयात्रेयादीनां धर्म-शास्त्र-प्रणेतृत्वं न स्यात्”। (स्मृ० च० पृ० १) वीर-मित्रोदय में प्रयोग-पारिजात के कुछ श्लोक उद्धृत हुए हैं जिनमें ३६ स्मृतियों का वर्गीकरण स्मृतियों तथा उपस्मृतियों में हुआ है- मनुर्बृहस्पतिर्दक्षो गौतमोऽथ यमोऽङ्गिराः । योगीश्वरः प्रचेताश्च शातातप-पराशरौ ॥ संवर्त्तोशनसौ शङ्ख-लिखितावत्रिरेव च । विष्ण्वापस्तम्ब-हारीता धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तकाः ॥ एते ह्यष्टादश प्रोक्ताः मुनयो नियत-व्रताः । जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षि-काश्यपौ ॥ व्यासः सनत्कुमारश्च सुमन्तुश्च पितामहः ।
( १२ ) व्याघ्रः कार्ष्णाजिनिश्चैव जातूकर्णः कपिञ्जलः ॥ बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च । पैठीनसिर्गोभिलश्च उपस्मृति-विधायकाः ॥ यद्यपि उपस्मृति-विधायकों की नामावली का उपसंहार यहीं प्रतीत होता है तथापि और भी २१ स्मृति-कारों का नाम-निर्देश तीन श्लोकों में किया गया है— वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः । बभ्रुः कार्ष्णाजिनिः सत्य-व्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥ जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । आत्रेयः छागलेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥ पारस्कर-ऋष्यशृङ्गौ वैजवापस्तथैव च । इत्यन्ये स्मृति-कर्त्तार एकविंशतिरीरिताः ॥ यद्यपि याज्ञवल्क्य-स्मृति (श्लोक० १।४-५) की व्याख्या में मित्र-मिश्र इन स्मृतियों को स्पष्टतः उपस्मृति नहीं कहते हैं तथापि 'परिभाषा-प्रकाश' (पृ० १८) में इन सभी श्लोकों के बाद "एते एवोपस्मृतिकर्त्तारो मदनरत्ने- प्युक्ताः" कह कर इन सब को उपस्मृति मानने के पक्ष में ही प्रतीत होते हैं। परन्तु 'जावालिनौचिकेताश्च' आदि में परिगणित सुमन्तु, पितामह तथा कार्ष्णा- जिनि का 'वसिष्ठो नारदश्चैव' आदि श्लोकों द्वारा परिगणित २१ स्मृति-कर्त्ताओं में पुनरुल्लेख है। अतः उपस्मृतिकारों की संख्या ३६ होनी चाहिए। एक ही स्थान में पुनरुक्ति का आधार समझ में नहीं आता ! किन्तु उपर्युक्त सूची भी पर्याप्त नहीं है, इसे केवल दिग्दर्शक समझना चाहिए, कारण इनके अतिरिक्त स्मृतिकारों का भी उल्लेख धर्मशास्त्र-निबन्धों में मिलता है। उदाहरणार्थ 'निर्णयसिन्धु' में लग-भग १२५ से भी अधिक स्मृति- कारों के वचन उद्धृत हैं। भविष्यपुराण में भी स्मृतियों की संख्या का निर्देश अस्पष्ट रूप में स्मृतियों के आनन्त्य का ही प्रतिपादक प्रतीत होता है। 'स्मृति-मुक्ताफल' में तो ८८००० ऋषियों को धर्मप्रवर्त्तक बतलाया गया है— अष्टाशीति-सहस्राणि मुनयो गृहमेधिनः । पुनरावर्त्तिनो बीज-भूताः धर्म-प्रवर्त्तकाः ॥ (स्मृति-मुक्ताफल, पृ० ८) इस विचित्र परिस्थिति में सभी स्मृतिकारों का नाम-निर्देश तो असम्भव- प्रायः ही है। डा० काणे ने स्मृति-परम्परा का यथासम्भव विशद् वर्णन अपने ग्रन्थ 'History of Dharma-Shastra' में किया है। इस ग्रन्थ से बहुत स्मृति- कारों का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। याज्ञवल्क्य-स्मृति ( क ) याज्ञवल्क्य परिचय याज्ञवल्क्य-स्मृति शब्द से साधारणतः यह प्रतीत होता है कि यह स्मृति याज्ञवल्क्य के द्वारा बनाई हुई है। महाभारत के शान्तिपर्व के ३१२वें अध्याय
( १३ ) में, शतपथब्राह्मण (१४।९।४।३३) तथा भागवत (१०।६।११-७४) में यह बतलाया गया है कि याज्ञवल्क्य वैशम्पायन के शिष्य थे । वैशम्पायन से उन्होंने विद्या- ग्रहण, विशेषतः यजुर्वेद का अध्ययन, किया था। परन्तु एक समय गुरु-शिष्य में मतभेद के कारण याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु की विद्या को वान्त ( Vomitted ) कर दिया और पुनः भगवान् सूर्य की आराधना कर मध्याह्नकाल में सूर्य से यजुर्वेद का अध्ययन किया। इसी यजुर्वेद को 'शुक्ल यजुर्वेद' तथा मध्यन्दिन में सूर्य से अधिगत होने से 'माध्यन्दिन-संहिता' भी कहा जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद् में विदेह जनक के गुरु के रूप में भी याज्ञवल्क्य का वर्णन विस्तृत रूप में पाया जाता है। बृहदारण्यक के तृतीय अध्याय में यह बतलाया गया है कि विदेह जनक ने अपने यज्ञ में सभी प्रदेशों के ब्रह्म-ज्ञानियों को आमन्त्रित किया था। सभी के उपस्थित होने पर जनक ने उन सब के समक्ष अपना विज्ञापन किया- “यो वो ब्रह्मिष्ठः स एताः गाः उदजताम्”। जनक के विज्ञापन को सुन कर सभी मौन हो गए थे। कुछ समय के पश्चात् याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्यों से उन गायों को ले जाने के लिए कहा। इस पर सभी क्रुद्ध हो गये और याज्ञवल्क्य के साथ उन सबों का क्रमशः शास्त्रार्थ ( ब्रह्म के विषय में ) हुआ। इस शास्त्रार्थ का स्वरूप वस्तुतः 'जल्प' ( विजिगीषुद्धयस्य कथा जल्पः ) था। जैसा कि जल्प के लक्षण से ही स्पष्ट है, इस कथा में उचित-अनुचित का विवेक नहीं सा रहता है। याज्ञवल्क्य भी इस अपकर्ष से रहित नहीं रह सके। उन्हें भी समय-समय पर त्रास-प्रदर्शन, शाप-दान आदि करना पड़ा। इन्हीं अपकर्षों के कारण विद्यारण्य स्वामी ने अपने जीवन्मुक्ति-विवेक ( पृ० २५७-२६२) में याज्ञवल्क्य के विषय में यह उपसंहार किया है— “तस्मात् किम्बहुना ? ब्रह्मविदां याज्ञवल्क्यादीनामस्त्येव मलिन-वासनाऽ- नुवृत्तिः ।” ( जी० मु० वि० पृ० २६२ ) ( ख ) प्रकृत स्मृति का कर्त्ता प्रकृत स्मृति के कर्त्ता उपर्युक्त याज्ञवल्क्य ही हैं या कोई अन्य व्यक्ति-यह प्रश्न कुछ जटिल सा है। प्राचीन परम्परा के अनुसार बृहदारण्यक के याज्ञवल्क्य ही इस स्मृति के प्रणेता माने जाते हैं। आदित्य देव ने लिखा है—“अस्याश्च संहितायाः याज्ञवल्क्यः प्रणेतेति व्याख्यातॄणां स्मृतिरेव प्रमाणम्” ( अपरार्क १।१)। याज्ञवल्क्य-स्मृति में भी एक श्लोक है जो स्पष्टतः इस स्मृति के कर्त्ता के रूप में बृहदारण्यक के याज्ञवल्क्य को ही प्रस्तुत करता है— ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान् । योग-शास्त्रञ्च मत्प्रोक्तं ज्ञेयं योगमभीप्सता ॥ (या० स्मृ० ३।११०) परन्तु मिताक्षराकार ने प्रथम श्लोक के अवतरण में लिखा है—“याज्ञवल्क्य- शिष्यः कश्चित्प्रश्नोत्तररूपं याज्ञवल्क्य-प्रणीतं धर्म-शास्त्रं कथयामास” । इस कथन १. अस्ति हि याज्ञवल्क्यस्य ......... भूयान् विद्यामदः । तैः सर्वैरपि विजिगीषु- कथायामप्रवृत्तत्वात् । — जीवन्मुक्तिविवेक पृ. २५७ ( आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थमाला )
( १४ )
के आधार पर प्रा० काणे इस स्मृति को याज्ञवल्क्य-प्रणीत नहीं मानते । उनकी दृष्टि में उपर्युक्त 'ज्ञेयं चारण्यकम्' आदि श्लोक भी रचयिता का कपट-प्रबन्ध मात्र सा प्रतीत होता है। प्रो० काणे ने अपने मत को इस प्रकार प्रस्तुत किया है :— This ( ज्ञेयं चारण्यकमहम् ) is simply put in to glorify the याज्ञवल्क्य- स्मृति as the work of a great and ancient Sage, Philosopher and Yogin. From the style and doctrines of the स्मृति it is impossible to believe that it was the work of the same hand that gave to the world the उपनिषद् containing the boldest philosophical speculation couched in the simplest yet the most effective language. Even orthodox Indian opinion was not prepared to admit the unity of authorship in the case of the स्मृति and the आरण्यक. ( History of Dharmas'āstra, P. 169, Vol. I ) यद्यपि मेरा दुराग्रह नहीं है कि प्राचीन-परम्परा ही सत्य है, तथाऽपि डा० काणे द्वारा उपस्थापित युक्तियों में कुछ प्रबलता नहीं दीख पड़ती है। यदि याज्ञवल्क्य से भिन्न किसी व्यक्ति की यह रचना है तो उस व्यक्ति का नाम इस स्मृति से सर्वथा विलुप्त क्यों हो गया—यह एक समस्या हो जाती है। किसी प्रबल कारण के अभाव में अपनी रचना को दूसरे महा-पुरुष के नाम से प्रसिद्ध कराने में लेखक की प्रवृत्ति को मनो-विज्ञान से समर्थन नहीं सा मिलता है। भाषा के आधार पर दोनों में भेद मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि वास्तविक दृष्टि से भाषा का सम्बन्ध व्यक्ति से होता है न कि देश से । अवस्था-भेद के अनुसार एक व्यक्ति की भाषा तथा रीति में परिवर्तन के उदाहरण भी कम नहीं हैं। यदि विज्ञानेश्वर के कथनानुसार याज्ञवल्क्य के किसी शिष्य को ही इस स्मृति का प्रणेता मान लिया जाय तब भी श्रद्धेय प्रो० काणे द्वारा अभिप्रेत भाषा-तारतम्य, रीति-तारतम्य तथा वस्तु-तारतम्य का उचित समाधान प्रायशः असम्भव ही है । दूसरी बात यह भी है कि स्वयम् विज्ञानेश्वर भी इस विषय में व्यामुग्ध ( Confused ) से प्रतीत होते हैं कि इस स्मृति के प्रणेता कौन हैं। पहले तो उन्होंने मान लिया है कि याज्ञवल्क्य के किसी शिष्य ने इस स्मृति की रचना की थी, परन्तु ४-५ श्लोकों की व्याख्या मेंउन्हों ने दो बार “याज्ञवल्क्य-प्रणीतस्य” तथा “याज्ञवल्क्य- प्रणीतम्” कहा है। एवञ्च विज्ञानेश्वर के आधार पर कुछ निर्णय करना तो वाञ्छ- नीय नहीं होना चाहिये। इसके अतिरिक्त आचाराध्याय के द्वितीय श्लोक में— “मिथिलास्थः स योगीन्द्रः” कहा गया है जिससे भी प्राचीन-परम्परा का ही समर्थन होता है। सभी श्लोकों को प्रक्षिप्त या विक्षिप्त मान कर कुछ निर्णय कर लेना कहाँ तक न्याय्य है—यह विचारणीय है। अतः जब तक कुछ सङ्केतु न मिले तब तक केवल हेत्वाभास के आधार पर ही निगमन नहीं करना चाहिए प्रत्युत इस स्मृति के कर्त्ता के विषय में उपस्थित
( ग ) याज्ञवल्क्य स्मृति की श्लोक-संख्या
( १५ ) समस्या का उपसंहार सन्देह में ही करना उचित है। योगि-याज्ञवल्क्य आदि, प्राचीन की दृष्टि में, इस याज्ञवल्क्य से अभिन्न परन्तु नवीनों की दृष्टि में भिन्न, माने जाते हैं। ( ग ) याज्ञवल्क्य स्मृति की श्लोक-संख्या याज्ञवल्क्य-स्मृति की श्लोक-संख्या के विषय में विश्वरूपाचार्य, विज्ञानेश्वर तथा अपरादित्य का मत एक नहीं है। विश्वरूप के अनुसार याज्ञवल्क्य- स्मृति में १००३, विज्ञानेश्वर के मत में १००९ और अपरादित्य की व्याख्या में १००६ श्लोक पाये जाते हैं। व्याख्याओं में अनुपलब्ध परन्तु कुछ मूल पुस्तकों में उपलब्ध—"श्लोकानामपि विज्ञेयं सहस्रं चतुरुत्तरम्” के आधार पर तो मूल-श्लोकों की संख्या १००४ प्रतीत होती है । मित्र-मिश्र ने विज्ञानेश्वर का ही अनुसरण किया है । शूलपाणि ने अपनी व्याख्या में १०१० श्लोक माने हैं । व्याख्यात श्लोकों में विषमता के अतिरिक्त कुछ ऐसे भी श्लोक हैं जिनका सङ्केत केवल मूल पुस्तक में है, किसी भी व्याख्या में नहीं। उदाहरणार्थ, आचाराध्याय में और भी कुछ श्लोक अधिक उपलब्ध होते हैं—२३३ एवं २३४ श्लोकों के मध्य में अर्ध-श्लोक है—"अपहता इति तिलान् विकीर्य च समन्ततः ।” इसी प्रकार ३०८ तथा ३०९ श्लोकों के मध्य में एक श्लोक है— ग्रहाणामिदमातिथ्यं कुर्यात् संवत्सरादपि । आरोग्य-बल-सम्पन्नो जीवेस्स शरदः शतम् ॥ व्यवहाराध्याय के अन्त में भी मूल पुस्तक में निम्न-लिखित तीन श्लोक अधिक हैं— ( १ ) राजभिर्दत्त-दण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ( २ ) एवमुद्धृतदण्डानां विशुद्धिः पापकर्मिणाम् । स्व-धर्म-स्थापनाद्राजा प्रजाभ्यो धर्ममश्नुते ॥ ( ३ ) यत्र दण्ड-विधिर्नोक्तः सर्वैरेव महात्मभिः । देश-कालादि सञ्चिन्त्य तत्र दण्डो विधीयते ॥ इसी प्रकार प्रायश्चित्ताध्याय के अन्त में भी कुछ श्लोक पाये जाते हैं— ( १ ) विप्रेष्वपि विशेषेण धार्या वाजसनेयिकैः । इच्छद्भिः श्रेयसि फलमिह लोकै परत्र च ॥ ( २ ) यदवाप्तं मया देवाद्रादित्याद्वै सनातनम् । तद्वै सर्वमिदम्परोक्तं श्रुति-स्मृत्यभिसम्मतम् ॥ ( ३ ) निःश्रेयस-करं नृणां शास्त्रं देवर्षि-सेवितम् । ज्ञात्वा ये ह्यध्यवस्यन्ति तेऽन संयान्ति वै पुनः ॥ (ये तीन श्लोक मिताक्षरा के ३२७ तथा ३२८ श्लोकों के मध्य में पाये जाते हैं।)
( १६ ) ( ४ ) धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ॥ कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात् प्रजाम् ॥ ( यह श्लोक मिताक्षरा के ३३० तथा ३३१ के बीच में पाया जाता है । ) ( ५ ) निर्जित्य वादे देवान् वै ऋषीन् सर्वानुपस्थितान् । गा बोधेनाहतास्तस्मै नमो ब्राह्मण-हेतवे ॥ ( ६ ) अध्याय-त्रय-संक्षिप्तं सर्वेषां बुद्धि-वर्धनम् । अनुष्टुप्छन्दसा ह्येतत् याज्ञवल्क्येन भाषितम् ॥ ( ७ ) सर्व-पाप-हरं पुण्यं सुप्रसन्नं समञ्जसम् । श्लोकानामपि विज्ञेयं सहस्रं चतुरुत्तरम् ॥ ( ८ ) आदित्यस्य प्रसादेन प्राप्तवान् यो यजुर्गणम् । प्रणमेद्याज्ञवल्क्यं तं पिप्पलादगुरोरलम् ॥ ( ये श्लोक सर्वान्त में पाये जाते हैं । ) यद्यपि कुछ श्लोक तो स्पष्टतः अनावश्यक प्रतीत होते हैं तथापि मूल पुस्तक में उपलब्ध होने के कारण यहाँ उल्लिखित हुए हैं । श्लोक-संख्या में वैषम्य के अतिरिक्त पाठान्तर तो बहुत ही हैं ( विशेषतः बालकीडा मिताक्षरा तथा अपरार्क में ) । यद्यपि प्राचीन ( निर्णयसागर के ) मिताक्षरा-संस्करण में पाठान्तरों का कुछ निर्देश था तथापि प्रस्तुत संस्करण में उसका लोप ही कर दिया गया । इसका कारण प्रकाशक तथा हिन्दी-व्याख्याता ही जानते हैं । म० म० पी० वी० काणे ने कुछ पाठान्तरों का विवेचन भी प्रस्तुत किया है । जिज्ञासुओं को इसके लिए उनका ‘History of Dharma-Shastra’ देखना चाहिए । याज्ञवल्क्य स्मृति का विषय-विवरण सम्पूर्ण याज्ञवल्क्य स्मृति तीन अध्यायों से विभक्त है—आचाराध्याय, व्यवहाराध्याय तथा प्रायश्चित्ताध्याय । प्रथम आचाराध्याय में १३ प्रकरण हैं—( १ ) उपोद्घात-प्रकरण ( श्लो० १-९ ), ( २ ) ब्रह्मचारि-प्रकरण (श्लो० १०-५०), ( ३ ) विवाह-प्रकरण (श्लो० ५१-८९ ), ( ४ ) जाति-वर्ण-विवेक-प्रकरण ( श्लो० ९०-९६ ), ( ५ ) गृहस्थ- धर्म-प्रकरण ( श्लो० ९७-१२८ ), ( ६ ) स्नातक-व्रत-प्रकरण (श्लो० १२९-१६६), ( ७ ) भक्ष्याऽभक्ष्य-प्रकरण ( श्लो० १६७-१८१ ), ( ८ ) द्रव्य-शुद्धि-प्रकरण ( श्लो० १८२-१९७), ( ९ ) दान-धर्म-प्रकरण (श्लो० १९८-२१६), ( १० ) श्राद्ध- प्रकरण ( श्लो० २१७-२७० ), ( ११ ) गण-पति-कल्प-प्रकरण (श्लो० २७१-२९४), ( १२ ) ग्रह-शान्ति-प्रकरण ( श्लो० २९५-३०८ ), ( १३ ) राज-धर्म-प्रकरण ( श्लो० ३०९-३६८ ) ।
( १७ ) द्वितीय व्यवहाराध्याय है । व्यवहार शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ वीर- मित्रोदय में उद्धृत कात्यायन के अनुसार निम्न-लिखित है— विर्नानाऽर्थेऽवसन्देहे हरणं हार उच्यते । नाना-सन्देह-हरणाद् व्यवहार इति स्मृतः ॥ बृहस्पति ने व्यवहार शब्द का अर्थ अधोलिखित रूप में बतलाया है— शास्त्रं केवलमाश्रित्य क्रियते यत्र निर्णयः । व्यवहारः स विज्ञेयः·················॥ ( बृह० स्मृ० पृ० ४, श्लो० १९ ) विज्ञानेश्वर की व्याख्या सबों से स्पष्टतम है— 'अन्य-विरोधेन स्वात्म-सम्बन्धितया कथनं व्यवहारः । यथा कश्चिदिदं क्षेत्रादि मदीयमिति कथयति अन्योऽपि तद्विरोधेन मदीयमिति ॥' ( मिताक्षरा० २।१ ) इस अध्याय में २५ प्रकरण हैं, जिनका निर्देश इस प्रकार है— ( १ ) साधारण-व्यवहार-मातृका-प्रकरण ( श्लो० १-८ ), ( २ ) असाधारण-व्यवहार-मातृका-प्रकरण ( श्लो० ९-३६ ), ( ३ ) ऋणादान-प्रकरण ( श्लो० ३७-६४ ), ( ४ ) उपनिधि ( A sealed diposit ) प्रकरण १ ( श्लो० ६५-६७ ), ( ५ ) साक्षि-( Witness ) प्रकरण ( श्लो० ६८-८३ ), ( ६ ) लेख्य-( Written document ) प्रकरण ( श्लो० ८४-९४ ), ( ७ ) दिव्य-( Ordeal ) प्रकरण ( श्लो० ९५-११३ ), ( ८ ) दाय-विभाग ( Partition of Inheritance ) प्रकरण ( श्लो० ११४-१४९ ), ( ९ ) सीमा-विवाद-( Settlement of disputed boundary questions ) प्रकरण ( श्लो० १५०-१५८ ), ( १० ) स्वामि-पाल-( The owner and the keeper of cattle ) विवाद-प्रकरण ( श्लो० १५९-१६७ ), ( ११ ) अ-स्वामि-विक्रय-प्रकरण २ ( श्लो० १६८-१७४ ), ( १२ ) दत्ताऽप्रदानिक-( Non-delivery or resumption of gifts ) प्रकरण ( श्लो० १७५-१७६ ), ( १३ ) क्रीतानुशय-( Returning a thing purchased to the seller ) प्रकरण ( श्लो० १७७-१८१ ), १. यथाह नारदः— असंख्यातमविज्ञातं समुद्रं ( Sealed ) यन्निधीयते । तज्जानीयादुपनिधिं निक्षेपं गणितं विदुः ॥ मिताक्षरा० २।६५॥ २. तस्य च लक्षणं नारदेनोक्तम्— निक्षिप्तं वा पर-द्रव्यं नष्टं लब्ध्वाऽपहृत्य वा । विक्रीयतेऽसमक्षं यत् स ज्ञेयोऽस्वामिविक्रयः । मिता० २।१६८ ॥
(१५) संविद्व्यतिक्रम-( Breach of contract ) प्रकरण ( श्लो०
( १८ ) (१४) अभ्युपेत्याऽशुश्रूषा-( Negligence of promised service ) प्रकरण (श्लो० १८२-१८४ ), (१५) संविद्व्यतिक्रम-( Breach of contract ) प्रकरण ( श्लो० १८५-१९२ ), (१६) वेतनादान-प्रकरण ( श्लो० १९३-१९८ ), (१७) द्यूत-समाह्वय'-( Gambling ) प्रकरण ( श्लो० १९९-२०३ ), (१८) वाक्पारुष्य-( Defamation ) प्रकरण ( श्लो० २०४-२११ ), (१९) दण्ड-पारुष्य-( Assault ) प्रकरण ( श्लो० २१२-२२९ ), (२०) साहस- ( Aggressive act ) प्रकरण ( श्लो० २३०-२५३ ), (२१) विक्रीयाऽसम्प्रदान-( Non-delivery of the sold ) प्रकरण ( श्लो० २५४-२५८ ), (२२) सम्भूय-समुत्थान-( joint dealing ) प्रकरण ( श्लो० २५९-२६५ ), (२३) स्तेय ( Theft ) प्रकरण ( श्लो०२६६-२८२ ), (२४) स्त्री-संग्रहण-( Seduction ) प्रकरण ( श्लो० २८३-२९४ ) तथा, (२५) प्रकीर्णक-( Miscellany ) प्रकरण ( श्लो० २९५-३०७ ) । प्रायश्चित्ताध्याय में ५ प्रकरण हैं— (१) अशौच-प्रकरण ( श्लो० १-३४ ), (२) आपद्धर्म-प्रकरण ( श्लो० ३५-५४ ), (३) वानप्रस्थ-धर्म-प्रकरण ( श्लो० ५५-५५ ), (४) यति-धर्म- प्रकरण ( श्लो० ५६-२०५ ), (५) प्रायश्चित्त-प्रकरण ( श्लो० २०६-३३४ ) । प्रायश्चित्त-प्रकरण में महा-पातक उप-पातक आदि का स्वरूप-निर्देश तथा प्राय- श्चित्त-विधान आदि दिए गए हैं। याज्ञवल्क्य-स्मृति का महत्त्व पूर्व-निर्दिष्ट सभी धर्म-शास्त्र-प्रवर्त्तक-सूचियों में मनु के सर्व प्रथम निर्देश होने के कारण यह तो स्पष्ट है कि स्मृतियों में मनुस्मृति का स्थान सर्वोपरि है। इसी लिए बृहस्पति का कथन है— वेदार्थ-प्रतिबद्धत्वात् प्रामाण्यन्तु मनोः स्मृतम् । मन्वर्थ-विपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥ (बृ० स्मृ० सं० का० श्लो० १३ ) अङ्गिराने भी मनु को ही सर्वप्रथम स्थान दिया है— यत्पूर्वं मनुना प्रोक्तन्धर्म-शास्त्रमनुत्तमम् । न हि तत्समतिक्रम्य वचनं हितमात्मनः ॥ ( Dr. Jha : Hindu Law in its Sources. P. 44 ) उपर्युक्त बृहस्पति-वाक्य से यह स्पष्ट है कि किसी भी स्मृति को प्रतिष्ठित होने के लिए यह आवश्यक है कि वह मनु के मत से समर्थित हो। प्रकृत याज्ञवल्क्य-स्मृति भी आद्यन्त मनु के मत से ओत-प्रोत है। नीचे कुछ श्लोक मनु-स्मृति तथा याज्ञवल्क्य-स्मृति के दिये जाते हैं जहाँ केवल अर्थ-साम्य ही नहीं अपि तु शब्द-साम्य भी है—
( १६ ) मनु-स्मृति याज्ञवल्क्य-स्मृति (१) वेदः स्मृतिः सदाचारः (१) श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधम्प्राहुः सम्यक्संकल्पजः कामो साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् । धर्ममूलमिदं स्मृतम् ॥ २।१२॥ १।७॥ (२) निषेकादिश्मशानान्तो (२) निषेकाद्याः श्मशानान्ताः मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः ॥ तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः ॥ २।१६। १।१०॥ (३) गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत (३) गर्भाऽष्टमेऽष्टमे वाब्दे ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥ ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥ २।३६॥ १।१४॥ (४) आषोडशाद्ब्राह्मणस्य (४) आ-षोडशादाद्वाविंशात् सावित्री नातिवर्तते । चतुर्विंशाच्च वत्सरात् ॥ आद्वाविंशात् क्षत्रबन्धोः ब्रह्म-क्षत्र-विशां काल आचतुर्विंशतेर्विशः ॥ औपनायनिकः परः॥ अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते अत ऊर्ध्वं पतन्त्येते यथाकालमसंस्कृताः । सर्वधर्म-बहिष्कृताः । सावित्री-पतिताः व्रात्याः सावित्री-पतिताः व्रात्याः भवन्त्यार्य-विगर्हिताः ॥ व्रात्यस्तोमादृते क्रतोः ॥ २।३८-३९॥ १।३७-३८ ॥ (५) न स्कन्दते न व्यथते (५) अस्कन्नमन्यथक्तञ्चैव न विनश्यति कर्हिचित् । प्रायश्चित्तैरदूषितम् ॥ वरिष्ठमग्नि-होत्रेभ्यो अग्नेः सकाशाद्द्विप्राग्नौ ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् । हुतं श्रेष्ठमिहोच्यते ॥ ७।८४॥ १।३१६॥ (६) अलब्धञ्चैव लिप्सेत (६) अलब्धमीहेद्धर्मेण लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः । लब्धं यत्नेन पालयेत् । रक्षितं वर्धयेच्चैव पालितं वर्धयेन्नीत्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत ॥ वृद्धम्पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ अलब्धमिच्छेद्दण्डेन १।३१७॥ लब्धं रक्षेद्देवेक्षया । रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या वृद्धयंच पात्रेषु निक्षिपेत् ॥७।९९,१०१
( ३० ) याज्ञवल्क्य-स्मृति में किये गये मनु-स्मृति के संक्षेप के कुछ निदर्शन निम्न- लिखित हैं—
म० स्मृ०
(१) प्राङ्नाभिवर्धनात् पुंसो जातकर्म विधीयते । मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्य-मधु-सर्पिषाम् ॥ नामधेयं दशम्यान्तु द्वादश्यां वास्य कारयेत् । पुण्ये तिथौ मुहूर्त्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥ चतुर्थे मासि कर्तव्यम् शिशोर्निष्क्रमणं गृहात् । षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यथेष्टं मङ्गलं शुभे ॥ चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः । प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्त्तव्यं श्रुति-चोदनात् ॥ २।२९-३०, ३४-३५ ॥
(२) हीन-जाति-स्त्रियं मोहात् उद्वहन्तो द्विजातयः । कुलान्येव नयन्त्याशु स-सन्तानानि शूद्रताम् ॥ शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ॥ जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मण्यादेव हीयते ॥ ३।१५, १७॥
(३) सुवासिनीः कुमारीश्च रोगिणी गर्भिणीः स्त्रियः । अतिथिभ्योऽग्र एवैतान् भोजयेदविचारयन् ॥ भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि । भुञ्जीयातां ततः पश्चात् अवशिष्टन्तु दम्पती ॥ ३।११४, ११५॥
या० स्मृति०
(१) ......एते जातकर्म च ॥ अहन्येकादशे नाम चतुर्थे मासि निष्क्रमः । षष्ठेऽन्न-प्राशनं मासि चूडा कार्या यथाकुलम् ॥ १।११-१२।।
(२) यदुच्यते द्विजातीनां शूद्रादारोपसंग्रहः । नैतन्मम मतं यस्मात् तत्रायं जायते स्वयम् ॥ १।५६॥
(३) बालः स्ववासिनी-वृद्ध- गर्भिण्यातुर-कन्यकाः । सम्भोज्यातिथि-भृत्यांश्च दम्पत्योः शेष-भोजनम् ॥ १।१०५॥
( २१ ) स्थल-विशेष में याज्ञवल्क्य में मनु के मत का कुछ परिष्कार भी किया गया है। उसके कुछ दृष्टान्त अधो-लिखित हैं—
<table> <thead> <tr> <th>म० स्मृ०</th> <th>या० स्मृ०</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>(१) गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत<br>ब्राह्मणस्योपनयनम् ।२।३६</td> <td>(१) गर्भाष्टमेऽष्टमे वाऽब्दे<br>ब्राह्मणस्योपनयनम् ।१।१४॥</td> </tr> <tr> <td>(२) एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्यात्<br>८।७७।।</td> <td>(२) उभयानुमतः साक्षी<br>भवत्येकोऽपि धर्मवित् । २।७२॥</td> </tr> <tr> <td>(३) अकामतः कृतम्पापं<br>वेदाभ्यासेन शुध्यति ।<br>कामतस्तु कृतं मोहात्<br>प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः ॥ ११।४६॥</td> <td>(३) प्रायश्चित्तैरपेत्येनो<br>यदज्ञानकृतम्भवत् ।<br>कामतो व्यवहार्यस्तु<br>वचनादिह जायते ॥ ३।२२६॥</td> </tr> <tr> <td>(४) रेतः-सेकः स्वयोनीषु<br>कुमारीष्वन्त्यजासु च ।<br>सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु<br>गुरुतल्पसमं विदुः ॥ ११।५८॥</td> <td>(४) सखि-भार्या-कुमारीषु<br>स्वयोनिष्वन्त्यजासु च ।<br>सगोत्रासु सुत-स्त्रीषु<br>गुरुतल्प-समं स्मृतम् ॥<br>पितुः स्वसारं मातुश्च<br>मातुलानीं स्नुषामपि ।<br>मातुः सपत्नीं भगिनीम्<br>आचार्यतनयां तथा ॥<br>आचार्य-पत्नीं स्व-सुतां<br>गच्छंस्तु गुरु-तल्पगः ॥<br>३।२३१-३३॥</td> </tr> </tbody> </table> कुछ स्थान में मनु से साधारण वैमत्य भी है। उदाहरण के लिए 'ब्रह्म-हत्या- सम' तथा 'सुरा-पान-सम' कार्यों में मनु तथा याज्ञवल्क्य के परस्पर विभिन्न कथन को देखें— <table> <thead> <tr> <th>म० स्मृ०</th> <th>या० स्मृ०</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>(१) अनृतं च समुत्कर्षे<br>राज-गामि च पैशुनम् ।<br>गुरोश्चालीक-निर्बन्धः<br>समानि ब्रह्म-हत्यया ॥ ११।५५॥</td> <td>(१) निषिद्ध-भक्षणं जैह्मयम्<br>उत्कर्षे च वचोऽनृतम् ।<br>रजस्वला-मुखास्वादः<br>सुरापान-समानि तु ॥ ३।२२९॥</td> </tr> <tr> <td>(२) ब्रह्मोञ्झता वेद-निन्दा<br>कौट-साक्ष्यं सुहृद्वधः ।<br>गर्हितानाद्ययोर्जग्धिः<br>सुरापान-समानि षट् ॥ ११।५६</td> <td>(२) गुरूणामप्यधिक्षेपो<br>वेदनिन्दा सुहृद्वधः ।<br>ब्रह्म-हत्या समं ज्ञेयम्<br>अधीतस्य च नाशनम् ॥ ३।२२८॥</td> </tr> </tbody> </table>( २२ ) इतनी समता या साधारण-विषमता के अतिरिक्त दोनों में असाधारण विषमता भी द्यूत-समाह्वय-प्रायश्चित्त आदि में स्पष्ट उपलब्ध है। परन्तु देश-काल के अनुसार ही याज्ञवल्क्य-स्मृति में यह परिवर्त्तन हुआ है—यही प्रतीत होता है। अतः परमार्थतः याज्ञवल्क्य-स्मृति को मनुस्मृति का विप्रतीप कहना उचित नहीं है। मनुस्मृति से अतिरिक्त अन्यान्य प्राचीन धर्मशास्त्र के मत का भी यथोचित सन्निवेश याज्ञवल्क्य-स्मृति में हुआ है, परन्तु विस्तर-भय से यहाँ उनके उदाहरण नहीं दिये जाते हैं। बहुत से उदाहरण तो याज्ञवल्क्य-स्मृति की व्याख्याओं के अवलोकन से भी स्पष्ट हो जाते हैं, दोनों की तुलना करने पर तो कुछ कहना ही नहीं है। विषय-विन्यास की दृष्टि से भी याज्ञवल्क्य-स्मृति बहुत ही प्रशस्त है। संक्षेप में अधिक अर्थ की अभिव्यक्ति इसकी विशेषता है। जहाँ मनुस्मृति में २७०० श्लोक हैं वहीं या० स्मृ० में केवल १००९ (मिताक्षरा-कार के अनुसार) श्लोक हैं। मनुस्मृति का विषय-विन्यास स्फुट होने पर भी बहुधा सङ्कीर्ण हो गया है जब कि या० स्मृ० में सङ्कीर्णता का सर्वथा अभाव ही दृष्टि-गोचर होता है। मनुस्मृति में वर्णन के प्रसङ्ग में निदर्शन आदि का पुट अधिक है जो या० स्मृ० में प्रायशः नहीं मिलता है। सृष्टि-प्रक्रिया आदि कुछ विषयों की तो या० स्मृ० में कोई चर्चा ही नहीं है जब कि म० स्मृ० में पूरा प्रथम अध्याय सृष्टि-प्रकार के वर्णन में ही पर्यवसन्न हुआ है। मनुस्मृति में पुनरुक्ति भी बहुत है। कुछ निदर्शन निम्न-लिखित हैं :— १ वेदोऽखिलो धर्म-मूलं स्मृति-शीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥ २।६ ॥ वेदःस्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधम्प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ २।१२॥ तथा, अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः । रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धम्पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ ७।९९ ॥ अलब्धमिच्छेद्दण्डेन लब्धं रक्षेद्यवेक्षया । रक्षितन्वर्षयेद्वृद्ध्या वृद्धम्पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ ७।१०१ ॥ अतः विषय में मन्वर्थानुगामिनी तथा प्रतिपादन में संक्षिप्त किन्तु युक्त्यनु- सारिणी तथा देश-काल-पात्र को ध्यान में रखकर निर्णय करने वाली या० स्मृ० का सभी स्मृतियों में विशिष्ट स्थान है। याज्ञवल्क्य-स्मृति के व्याख्याकार विश्वरूप-(७५०—१००० ई०) याज्ञवल्क्य-स्मृति के व्याख्याकारों में सर्व-प्रसिद्ध तथा सर्व-प्रथम उपलब्ध व्याख्याकार विश्वरूपाचार्य हैं। इनकी व्याख्या का नाम 'बालक्रीडा' है जिसका
( २३ ) प्रकाशन महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री के द्वारा 'त्रिवेन्द्रम संस्कृत ग्रन्थमाला' से हुआ है। यह व्याख्या दो भागों में प्रकाशित हुई है। व्याख्या की भाषा अत्यन्त मनोहर है। याज्ञवल्क्य के अभिप्राय को, विशेषतः आचार तथा प्रायश्चित्त अध्यायों में, विश्वरूप ने विश्वरूप बना दिया है। इसीलिए मिताक्षराकार ने प्रारम्भ में ही इनका ससम्मान निर्देश किया है— "याज्ञवल्क्य-मुनि-भाषितम्मुहुः विश्वरूप-विकटोक्तिविस्तृतम्” ॥ (मिताक्षरा० आचार० श्लो० २) याज्ञवल्क्य के समर्थन के लिए (यत्र तत्र अपने विमत के समर्थन के लिए भी) विश्वरूप ने वेदों से तथा अनेक स्मृतियों एवम् गृह्य-सूत्रों से उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। स्थान-स्थान पर मिताक्षराकार का मत भी इनसे भिन्न है। यद्यपि इन्होंने 'अन्ये' 'अपरे', 'यत्त' आदि शब्दों से अपने से प्राचीनतर व्याख्याकारों का भी निर्देश किया है तथापि किसी का नाम स्पष्ट रूप में निर्दिष्ट नहीं हुआ है। विश्वरूप की प्रवृत्ति मीमांसा की ओर अधिक है। अनेकशः जैमिनि के सूत्रों का इन्होंने उद्धरण किया है। इनका समय महामहोपाध्याय काणे के अनुसार ७५० ई० से लेकर १००० ई० तक माना गया है। विज्ञानेश्वर (१०७०—१११५) विज्ञानेश्वर की ऋजु-मिताक्षरा समस्त धर्म-साहित्य में अद्वितीय है। महामहो- पाध्याय काणे का कथन है— Its position is analogous to that of the महाभाष्य of पतञ्जलि in grammar or to that of the काव्य-प्रकाश of मम्मट in poetics. (History of Dharma. P. 287) आङ्ग्लशासन काल में तो मिताक्षरा का बड़ा ही महत्त्व था। इसी के आधार पर न्यायालय में दायभाग आदि का निर्णय किया जाता था। यदि यह कहा जाय कि मिताक्षरा के कारण याज्ञवल्क्य-स्मृति का भी महत्त्व कुछ अधिक हो गया तो अत्युक्ति न होगी। याज्ञवल्क्य के अभिप्राय को परिष्कृत करने के लिए इन्होंने अनेक स्मृतियों, पुराणों तथा वैदिक-ग्रन्थों से उद्धरण प्रस्तुत किए हैं। स्मृतिकारों का निर्देश तो विश्वरूप की तुलना में चतुर्गुण है—ऐसा कहा जा सकता है। ये मीमांसा के बड़े ही प्रकृष्ट पण्डित प्रतीत होते हैं। वस्तुतः धर्म- शास्त्र के मर्म को जानने के लिए मीमांसा का विशद ज्ञान अनिवार्य है। इन्होंने 'यथाकामी भवेद्रापि' (या० स्मृ० १।८१) श्लोक की व्याख्या में विधि का विमर्श बहुत ही तार्किक युक्ति से मीमांसा शास्त्र के अनुसार प्रस्तुत किया है। इसी प्रकार १।८६, २।११४, २।१२६ आदि श्लोकों की व्याख्या में भी उनके मीमांसा-शास्त्रीय वैदुष्य का उत्कर्ष देखा जा सकता है। इनका जन्म भारद्वाज गोत्र में हुआ था। इन्होंने अपने पिता का नाम पद्मनाभ भट्टोपाध्याय बतलाया है। गुरु के विषय में इनका निर्देश है— उत्तमोपपदस्येयं शिष्यस्य कृतिरात्मनः।
इस श्लोक के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि इनके गुरु का नाम
( २४ ) इस श्लोक के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि इनके गुरु का नाम उत्तमात्मा अथवा आत्मोत्तम रहा होगा । इन्होंने अपनी मिताक्षरा में विक्रमादित्य देव को अपने आश्रयदाता के रूप में निर्दिष्ट किया है । विक्रमादित्य देव का वर्णन 'विक्रमाङ्कदेव-चरित' महाकाव्य में महाकवि बिल्हणद्वारा विशद रूप में वर्णित है । "विक्रमाङ्क-देव-चरित" के सम्पादक म० म० पं० रामावतार पाण्डेयजीने अपनी भूमिका में चालुक्यवंशीय विक्रमादित्य का समय १०७६ से १११४ ई० के बीच माना है । अतः विज्ञानेश्वर का भी समय वही होना चाहिए । अपरादित्य ( द्वादश शतक-पूर्वार्ध ) या० स्मृ० पर तीसरी व्याख्या अपरार्क है । यह व्याख्या मिताक्षरा से विस्तृत तथा धर्म-शास्त्र के सिद्धान्तों का आकर है । आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली, पूना से १९०३-४ में दो भागों में यह प्रकाशित हुई है । इस व्याख्या में पुराणों से बहुत ही उद्धरण किये गए हैं । पुराणों से अतिरिक्त गौतम आदि धर्म-शास्त्रों से भी बहुत प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं। इनका जन्म-समय १११५ से ११३० ई० के मध्य में माना जाता है । इनके पिता का नाम अनन्त देव तथा पितामह का नागार्जुन था । ये जीमूतवाहन के वंश में उत्पन्न हुए हैं, जैसा या० स्मृ० की व्याख्या के अन्त में इनके लेख से स्पष्ट होता है—'इति श्री- विद्याधरवंशप्रभवश्रीशिलाहार नरेन्द्र-जीमूतवाहनान्वयप्रसूत श्रीमदपरादित्य देव............' । एक दूसरे अपरादित्य देव भी हुए हैं जिनका जन्म समय ११८४-११८७ है परन्तु डा० काणे के कथनानुसार या० स्मृ० के व्याख्याता प्रथम अपरादित्य देव ही है। कहीं-कहीं इनका नाम केवल आदित्यदेव भी पाया जाता है। भासर्वज्ञ के न्यायसार पर भी इनकी एक बृहद्व्याख्या—न्यायमुक्ता- वली है, जो १९६१ ई० में मद्रास से प्रकाशित हुई है । इनके विषय में विशेष विवरण के लिए डा० काणे का History of Dharmaśāstra ( PP. 328-334 ) देखना चाहिए । शूलपाणि ( १३७५-१४६० ई० ) शूलपाणि बङ्गाल के धर्म-शास्त्रीय-निबन्ध-कारों में प्रमुख माने जाते हैं । इन्होंने या० स्मृति की टीका लिखी । इस टीका का नाम 'दीप-कलिका' है । यह व्याख्या अत्यन्त-संक्षिप्त होने पर भी प्रामाणिक है । यही कारण है कि वीर- मित्रोदय तथा अष्टाविंशति-तत्त्व आदि प्रामाणिक निबन्धों में इनके मत का उल्लेख है । ये साहुदियाल वंश के बङ्गीय ब्राह्मण थे । प्रो० काणे के निर्देशानुसार, बल्लालसेन के राज्य-काल से राढीय ब्राह्मणवर्ग के निम्न-तर वर्गीय ब्राह्मण ही साहुदियाल कहलाते हैं । रुद्रधर के द्वारा 'गौड़ीय' शब्द से निर्दिष्ट होने के कारण इनका बङ्गीयत्व माना जाता है। इनका समय प्रो० काणे तथा जगन्नाथ रघुनाथ घारपुरे के अनुसार १४ शतक के अन्त तथा १५ शतक के मध्य के बीच माना जाता है ।
( २५ ) मित्र-मिश्र ( १८०० ई० ) मित्र-मिश्र के नाम से प्रसिद्ध 'वीरमित्रोदय' व्याख्या विशाल-काय तथा प्रमेय बहुल है। मित्र मिश्र का समय १८वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जा सकता है, क्योंकि आनन्द चम्पू में इन्होंने इसके निर्माण-काल का उल्लेख किया है— 'मीनारोहिणि-रोहिणी-सहचरे कृत्वाऽन्तिके रेवतीं याते चण्ड-मरीचि-मालिनि तुलां वारे च वाचस्पतेः। शाके खाङ्गतर्तुभू ( १६९० ) परिमिते ह्यानन्दकन्दाभिधां चम्पूमपूरितवान् सित-स्मर-तिथौ श्रीमिश्र-मिश्रः कृती ॥' अतः इनका समय यदि १८ शतक का मध्य-भाग माना जाय तो कुछ अनुपपत्ति नहीं दीखती है। इनकी व्याख्या में अनेक स्मृति तथा पुराणों का उद्धरण तथा विवेचन मिलता है, जिनसे इनके विद्या-वैभव का पता चलता है। परन्तु यह विषय ध्यान देने योग्य है कि यह व्याख्या इनकी अपनी लिखी हुई नहीं है अपितु किसी सदानन्द नाम के विद्वान् ने मित्र मिश्र के अनुरोध से इसका संग्रथन किया था और मित्र मिश्र के नाम से ही इसे प्रख्यापित किया। इसके समर्थन में वी० मि० (या० स्मृ० व्याख्या) में उल्लिखित निम्ननिर्दिष्ट श्लोक है— उत्तंसस्तीरभुक्तेः अखिल-बुध-गुरुः श्रीसदानन्दधीमान् श्रीभाजो मित्रमिश्राज्जगदुपकृतये बिभ्रदादेशदीपम्। ज्ञानानान्द्यैन्य-दोषपहमकलि-भयं याज्ञवल्क्योक्तिकोशात् दृष्ट्वा स्मृत्यर्थसारं समचिनुत यशो धर्म-लक्ष्मी-विहारम् ॥ ( या० स्मृ० व्या० आ० अ० मङ्गल श्लो० १६ ) जो कुछ भी हो, वीर-मित्रोदय व्याख्या के महत्त्व का अपलाप तो कथमपि नहीं किया जा सकता। धर्म-शास्त्र-कानन में परिभ्रमण करने की इच्छा रखने वाले सज्जन के लिए तो यह व्याख्या विशेषतः उपयोगी है। प्रस्तुत-संस्करण प्रस्तुत संस्करण में आधुनिक युग के नियोग को ध्यान में रखकर मूल स्मृति का हिन्दी-अनुवाद समन्वित कर दिया गया है, जिससे संस्कृत के प्रगाढ़ ज्ञान से रहित जिज्ञासुजन का भी अभिलाष पूर्ण हो सके। साथ ही विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा, जिसका महत्त्व प्राच्य तथा पाश्चात्त्य-दोनों ही दृष्टियों से अनुपम है, का समावेश कर दिया गया है जिससे प्राचीन तथा नवीन का सह-स्रोत प्रवाहित होता रहे।
( २६ ) आशा है विद्वज्जन इस नवीन संस्करण का यथोचित स्वागत कर चौखम्बा प्रकाशन के अध्यक्ष को प्रोत्साहित करेंगे जिससे ये इसी तरह संस्कृत तथा संस्कृतज्ञ की सेवा में सोत्साह तत्पर रह सकें। मति-मान्द्यादनुचिताः सम्भवन्ति पदे पदे ॥ तथापि ते नहि पदं लभन्ते महतां हृदि ॥ १ ॥ तुच्छोऽप्यवस्थातुमर्हः प्रकाशः सवितुर्मुखे ॥ अन्धं तमो महदपि न कदाचिदपीत्यलम् ॥ २ ॥ —श्री नारायणमिश्रः
भूमिका स्मृति साहित्य भारतीय धर्मशास्त्र में वैदिक धर्मसूत्रों के उपरान्त स्मृतियाँ आती हैं। स्मृति शब्द का प्रयोग श्रुति से विपर्यास प्रदर्शित करने के लिए किया गया है। श्रुति तथा स्मृति द्वारा विहित आचार को धर्म बताया गया है (श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः, वसिष्ठधर्मसूत्र, १. ४. ६) श्रुति से वेद का अर्थ लिया जाता है और स्मृति शब्द का प्रयोग श्रुति अर्थात् ईश्वरप्रकाशित एवं ऋषिदृष्ट वाङ्मय से भिन्न साहित्य के लिए हुआ है। उपयुक्त अर्थ में धर्मसूत्र भी स्मृति ग्रन्थ हैं। ("श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः", मनु० २. १०)। श्रुति श्रवण, मनन और अध्यापन का विषय है; स्मृति स्मरण का विषय है और परम्परागत धार्मिक साहित्य है। संकीर्ण अर्थ में स्मृति और धर्मशास्त्र में कोई भेद नहीं है। वैदिक साहित्य में हम सूत्रों के अन्तर्गत श्रौतसूत्र या श्रुति पर आधारित सूत्रों का विभाजन पाते हैं। "श्रौतसूत्रों के साथ ही साथ हम दूसरे प्रकार के कल्पसूत्र भी पाते हैं, जिन्हें गृह्यसूत्र कहा गया है। ये गृहस्थजीवन की उन क्रियाओं का वर्णन करते हैं जो जन्म, जन्म के पूर्व, विवाह, मृत्यु और मृत्यु के बाद के अवसरों पर की जाती हैं। इन रचनाओं की उत्पत्ति उनके नाम से ही पर्याप्त रूप में प्रकट हो जाती है, कारण गृह्यसूत्र के अतिरिक्त उनका नाम स्मार्त- सूत्र या स्मृति पर आधारित सूत्र भी है। स्मृति का अर्थ वह है जो याद किया जाने योग्य हो। इस प्रकार हम स्मृति का श्रुति अर्थात् श्रवण के विषय से स्पष्ट रूप से भेद कर सकते हैं, कारण, स्मृति सीधे स्मरण शक्ति पर छाप डालती है और इसके लिए किसी विशेष शिक्षा या साधन की आवश्यकता नहीं पड़ती।"१ इसी विद्वान् ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय लोग विधि का व्यवहार "स्मृति द्वारा ही" "अथो नोमिस" किया करते थे।२ संकुचित अर्थ में स्मृति से धर्मशास्त्र की उन रचनाओं का तात्पर्य है जो प्रायः श्लोकों में हैं और उन्हीं विषयों का विवेचन करती हैं जिनका प्रतिपादन धर्मसूत्रों में किया गया है। इन स्मृतियों में अग्रणी हैं-मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ। मनुस्मृति सबसे प्राचीन है और ईसा से कई सौ वर्ष पहले रची गई थी। अन्य स्मृतियाँ ४०० से १००० ई० के बीच की हैं। स्मृतिकारों की संख्या विस्तृत है। १. भारतीयसाहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० ११। २. वही, पृ० १४
( २८ ) स्मृतियाँ प्रायः पद्य में हैं और भाषा की दृष्टि से स्मृतियाँ धर्मसूत्रों के बाद की रचनाएँ हैं। स्मृतियों की भाषा लौकिक है। विषयवस्तु की दृष्टि से स्मृतियाँ धर्मसूत्रों से अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं। मुख्य स्मृतिकार १८ हैं—मनु, बृहस्पति, दक्ष, गौतम, यम, अंगिरा, योगीश्वर, प्रचेता, शातातप, पराशर, संवर्त, उशनस्, शंख, लिखित, अत्रि, विष्णु, आपस्तम्ब, हारीत । इनके अतिरिक्त उपस्मृतियों के भी लेखकों के नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं— नारदः पुलहो गार्ग्यः पुलस्त्यः शौनकः क्रतुः । बौधायनो जातुकर्ण्यो विश्वामित्रः पितामहः ॥ जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षिकश्यपौ । व्यासः सनत्कुमारश्च शान्तनुर्जनकस्तथा ॥ व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकण्यः कपिञ्जलः । बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च । पैठीनसिर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः ॥ वीरमित्रोदय, परिभाषा प्रकरण के अनुसार स्मृतिकारों की संख्या २१ है और वे हैं— वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः । विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥ जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥ पारस्करश्च्यवङ्गो वैजवापस्तथैव च । इत्येते स्मृतिकर्तार एकविंशतिरीरिताः ॥ स्वयं स्मृतिकारों ने दूसरे स्मृतिकारों का उल्लेख किया है और उनकी संख्या का अपने ज्ञान के अनुसार निर्देश किया है। मनु ने ६ के, याज्ञवल्क्य ने २० के, पराशर ने १९ के नाम गिनायें हैं। स्मृतियों की संख्या के विषय में भिन्न प्रकार की सूचनाएँ मिलती हैं। जैसा कि प्रो० काणे ने निष्कर्ष निकाला है—'यदि बाद में आनेवाले निबन्धों, यथा निर्णयसिन्धु, नीलकण्ठ, एवं वीरमित्रोदय की मयूख सूचियों को देखा जाय तो स्मृतियों की संख्या १०० हो जायगी।' यहाँ उल्लेखनीय है कि जो स्मृतियाँ उपलब्ध हैं उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है। अनेक स्मृतियों की केवल व्याख्याएँ उपलब्ध हैं। साथ ही स्वरूप तथा शैली की दृष्टि से भी ये स्मृतियाँ भिन्न हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति स्मृति साहित्य में मनुस्मृति के बाद दूसरी महत्वपूर्ण स्मृति है याज्ञवल्क्य- स्मृति। कुछ दृष्टि से तो याज्ञवल्क्यस्मृति का मनुस्मृति की अपेक्षा भी अधिक १. धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग १, अनु० काश्यप, पृ० ४१ ।
( २६ ) व्यावहारिक महत्त्व है। याज्ञवल्क्यस्मृति मनुस्मृति के बाद की रचना है यह बात विषयवस्तु के कारण तो स्पष्ट है ही और भी अनेक विशिष्ट तथ्यों के कारण भी स्पष्ट है। इसमें विषयवस्तु का विधिवत् विभाजन किया गया है। गणेश और ग्रहों की पूजा भी इस स्मृति की विशेषता है। दान से संबद्ध कर्मों का ताम्रपत्र पर लेख और मठों के संगठन का वर्णन भी इस स्मृति में पाया जाता है, ये बातें मनु में नहीं उपलब्ध होतीं। इसमें बौद्धमत का खण्डन किया गया है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति की तुलनात्मक विशेषताओं के विषय में वेबर ने निम्न- लिखित विचार व्यक्त किये हैं: 'जो विषय दोनों में पाये जाते हैं उनमें भी हम याज्ञवल्क्य में अधिक सूक्ष्मता और स्पष्टता पाते हैं, और विशिष्ट उदाहरणों में, जहां दोनों में ठोस अन्तर दिखाई पड़ता है, याज्ञवल्क्य का दृष्टिकोण स्पष्टतः बाद के समय का है।' १ मनु ने व्यवहार के जितने प्रमाण गिनाये हैं उनकी अपेक्षा याज्ञवल्क्यस्मृति में लिखित ताम्रपत्र अधिक गिनाया गया है। मनु ने दिव्यों के अन्तर्गत अग्नि और जल के दो दिव्यों का वर्णन किया है जब कि याज्ञवल्क्य ने पांच दिव्यों का वर्णन किया है। दार्शनिक विषयों के विवेचन में याज्ञवल्क्य और मनुस्मृति में समानता है, किन्तु भ्रूणविज्ञान याज्ञवल्क्यस्मृति में नवीन विषय है, जिसे कीथ ने किसी आयुर्वेदिक ग्रन्थ से लिया हुआ माना है। याज्ञवल्क्यस्मृति मनुस्मृति की अपेक्षा छोटी है। मनुस्मृति में २७०० श्लोक हैं, जबकि याज्ञवल्क्यस्मृति में लगभग एक हजार श्लोक हैं। शैली की दृष्टि से याज्ञवल्क्यस्मृति संक्षिप्त है और प्रवाहमय है। प्रो० काणे ने यह संभावना व्यक्त की है कि याज्ञवल्क्यस्मृति के रचयिता के सामने रचना करते समय मनुस्मृति रही होगी, कारण अनेक स्थलों पर दोनों स्मृतियों में समान शब्द पाये जाते हैं। किन्तु जैसा कि ऊपर निर्देश किया जा चुका है याज्ञवल्क्य एक मौलिक विचारक और धर्मशास्त्रकार हैं। वे पहले के आचार्यों का पिष्टपेषण मात्र नहीं करते, अपितु देशकाल के परिवर्तनों के साथ परिवर्तित मान्यताओं को प्रस्थापित करते हैं और अपने पूर्ववर्ती मनु से कई स्थलों पर सहमत नहीं होते। भाषा की दृष्टि से याज्ञवल्क्यस्मृति पाणिनि के नियमों का पालन करती है। एकाध शब्द अपवाद भी मिल जाते हैं। पूर्ववर्ती साहित्य से सम्बन्ध— याज्ञवल्क्यस्मृति में वेद, वेदांगों, आरण्यकों, उपनिषदों, पुराणों, इतिहास, नाराशंसी के साथ-साथ स्वयं याज्ञवल्क्यप्रणीत बृहदारण्यक और योगशास्त्र का उल्लेख है। आरम्भ में उन्नीस धर्मशास्त्रकारों के नाम गिनाये गये हैं। पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ १. भारतीय साहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० २७८ ।