भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 782 में से

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( २३ ) प्रकाशन महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री के द्वारा 'त्रिवेन्द्रम संस्कृत ग्रन्थमाला' से हुआ है। यह व्याख्या दो भागों में प्रकाशित हुई है। व्याख्या की भाषा अत्यन्त मनोहर है। याज्ञवल्क्य के अभिप्राय को, विशेषतः आचार तथा प्रायश्चित्त अध्यायों में, विश्वरूप ने विश्वरूप बना दिया है। इसीलिए मिताक्षराकार ने प्रारम्भ में ही इनका ससम्मान निर्देश किया है— "याज्ञवल्क्य-मुनि-भाषितम्मुहुः विश्वरूप-विकटोक्तिविस्तृतम्” ॥ (मिताक्षरा० आचार० श्लो० २) याज्ञवल्क्य के समर्थन के लिए (यत्र तत्र अपने विमत के समर्थन के लिए भी) विश्वरूप ने वेदों से तथा अनेक स्मृतियों एवम् गृह्य-सूत्रों से उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। स्थान-स्थान पर मिताक्षराकार का मत भी इनसे भिन्न है। यद्यपि इन्होंने 'अन्ये' 'अपरे', 'यत्त' आदि शब्दों से अपने से प्राचीनतर व्याख्याकारों का भी निर्देश किया है तथापि किसी का नाम स्पष्ट रूप में निर्दिष्ट नहीं हुआ है। विश्वरूप की प्रवृत्ति मीमांसा की ओर अधिक है। अनेकशः जैमिनि के सूत्रों का इन्होंने उद्धरण किया है। इनका समय महामहोपाध्याय काणे के अनुसार ७५० ई० से लेकर १००० ई० तक माना गया है। विज्ञानेश्वर (१०७०—१११५) विज्ञानेश्वर की ऋजु-मिताक्षरा समस्त धर्म-साहित्य में अद्वितीय है। महामहो- पाध्याय काणे का कथन है— Its position is analogous to that of the महाभाष्य of पतञ्जलि in grammar or to that of the काव्य-प्रकाश of मम्मट in poetics. (History of Dharma. P. 287) आङ्ग्लशासन काल में तो मिताक्षरा का बड़ा ही महत्त्व था। इसी के आधार पर न्यायालय में दायभाग आदि का निर्णय किया जाता था। यदि यह कहा जाय कि मिताक्षरा के कारण याज्ञवल्क्य-स्मृति का भी महत्त्व कुछ अधिक हो गया तो अत्युक्ति न होगी। याज्ञवल्क्य के अभिप्राय को परिष्कृत करने के लिए इन्होंने अनेक स्मृतियों, पुराणों तथा वैदिक-ग्रन्थों से उद्धरण प्रस्तुत किए हैं। स्मृतिकारों का निर्देश तो विश्वरूप की तुलना में चतुर्गुण है—ऐसा कहा जा सकता है। ये मीमांसा के बड़े ही प्रकृष्ट पण्डित प्रतीत होते हैं। वस्तुतः धर्म- शास्त्र के मर्म को जानने के लिए मीमांसा का विशद ज्ञान अनिवार्य है। इन्होंने 'यथाकामी भवेद्रापि' (या० स्मृ० १।८१) श्लोक की व्याख्या में विधि का विमर्श बहुत ही तार्किक युक्ति से मीमांसा शास्त्र के अनुसार प्रस्तुत किया है। इसी प्रकार १।८६, २।११४, २।१२६ आदि श्लोकों की व्याख्या में भी उनके मीमांसा-शास्त्रीय वैदुष्य का उत्कर्ष देखा जा सकता है। इनका जन्म भारद्वाज गोत्र में हुआ था। इन्होंने अपने पिता का नाम पद्मनाभ भट्टोपाध्याय बतलाया है। गुरु के विषय में इनका निर्देश है— उत्तमोपपदस्येयं शिष्यस्य कृतिरात्मनः।

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