याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २४ ) इस श्लोक के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि इनके गुरु का नाम उत्तमात्मा अथवा आत्मोत्तम रहा होगा । इन्होंने अपनी मिताक्षरा में विक्रमादित्य देव को अपने आश्रयदाता के रूप में निर्दिष्ट किया है । विक्रमादित्य देव का वर्णन 'विक्रमाङ्कदेव-चरित' महाकाव्य में महाकवि बिल्हणद्वारा विशद रूप में वर्णित है । "विक्रमाङ्क-देव-चरित" के सम्पादक म० म० पं० रामावतार पाण्डेयजीने अपनी भूमिका में चालुक्यवंशीय विक्रमादित्य का समय १०७६ से १११४ ई० के बीच माना है । अतः विज्ञानेश्वर का भी समय वही होना चाहिए । अपरादित्य ( द्वादश शतक-पूर्वार्ध ) या० स्मृ० पर तीसरी व्याख्या अपरार्क है । यह व्याख्या मिताक्षरा से विस्तृत तथा धर्म-शास्त्र के सिद्धान्तों का आकर है । आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली, पूना से १९०३-४ में दो भागों में यह प्रकाशित हुई है । इस व्याख्या में पुराणों से बहुत ही उद्धरण किये गए हैं । पुराणों से अतिरिक्त गौतम आदि धर्म-शास्त्रों से भी बहुत प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं। इनका जन्म-समय १११५ से ११३० ई० के मध्य में माना जाता है । इनके पिता का नाम अनन्त देव तथा पितामह का नागार्जुन था । ये जीमूतवाहन के वंश में उत्पन्न हुए हैं, जैसा या० स्मृ० की व्याख्या के अन्त में इनके लेख से स्पष्ट होता है—'इति श्री- विद्याधरवंशप्रभवश्रीशिलाहार नरेन्द्र-जीमूतवाहनान्वयप्रसूत श्रीमदपरादित्य देव............' । एक दूसरे अपरादित्य देव भी हुए हैं जिनका जन्म समय ११८४-११८७ है परन्तु डा० काणे के कथनानुसार या० स्मृ० के व्याख्याता प्रथम अपरादित्य देव ही है। कहीं-कहीं इनका नाम केवल आदित्यदेव भी पाया जाता है। भासर्वज्ञ के न्यायसार पर भी इनकी एक बृहद्व्याख्या—न्यायमुक्ता- वली है, जो १९६१ ई० में मद्रास से प्रकाशित हुई है । इनके विषय में विशेष विवरण के लिए डा० काणे का History of Dharmaśāstra ( PP. 328-334 ) देखना चाहिए । शूलपाणि ( १३७५-१४६० ई० ) शूलपाणि बङ्गाल के धर्म-शास्त्रीय-निबन्ध-कारों में प्रमुख माने जाते हैं । इन्होंने या० स्मृति की टीका लिखी । इस टीका का नाम 'दीप-कलिका' है । यह व्याख्या अत्यन्त-संक्षिप्त होने पर भी प्रामाणिक है । यही कारण है कि वीर- मित्रोदय तथा अष्टाविंशति-तत्त्व आदि प्रामाणिक निबन्धों में इनके मत का उल्लेख है । ये साहुदियाल वंश के बङ्गीय ब्राह्मण थे । प्रो० काणे के निर्देशानुसार, बल्लालसेन के राज्य-काल से राढीय ब्राह्मणवर्ग के निम्न-तर वर्गीय ब्राह्मण ही साहुदियाल कहलाते हैं । रुद्रधर के द्वारा 'गौड़ीय' शब्द से निर्दिष्ट होने के कारण इनका बङ्गीयत्व माना जाता है। इनका समय प्रो० काणे तथा जगन्नाथ रघुनाथ घारपुरे के अनुसार १४ शतक के अन्त तथा १५ शतक के मध्य के बीच माना जाता है ।