भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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( २५ ) मित्र-मिश्र ( १८०० ई० ) मित्र-मिश्र के नाम से प्रसिद्ध 'वीरमित्रोदय' व्याख्या विशाल-काय तथा प्रमेय बहुल है। मित्र मिश्र का समय १८वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जा सकता है, क्योंकि आनन्द चम्पू में इन्होंने इसके निर्माण-काल का उल्लेख किया है— 'मीनारोहिणि-रोहिणी-सहचरे कृत्वाऽन्तिके रेवतीं याते चण्ड-मरीचि-मालिनि तुलां वारे च वाचस्पतेः। शाके खाङ्गतर्तुभू ( १६९० ) परिमिते ह्यानन्दकन्दाभिधां चम्पूमपूरितवान् सित-स्मर-तिथौ श्रीमिश्र-मिश्रः कृती ॥' अतः इनका समय यदि १८ शतक का मध्य-भाग माना जाय तो कुछ अनुपपत्ति नहीं दीखती है। इनकी व्याख्या में अनेक स्मृति तथा पुराणों का उद्धरण तथा विवेचन मिलता है, जिनसे इनके विद्या-वैभव का पता चलता है। परन्तु यह विषय ध्यान देने योग्य है कि यह व्याख्या इनकी अपनी लिखी हुई नहीं है अपितु किसी सदानन्द नाम के विद्वान् ने मित्र मिश्र के अनुरोध से इसका संग्रथन किया था और मित्र मिश्र के नाम से ही इसे प्रख्यापित किया। इसके समर्थन में वी० मि० (या० स्मृ० व्याख्या) में उल्लिखित निम्ननिर्दिष्ट श्लोक है— उत्तंसस्तीरभुक्तेः अखिल-बुध-गुरुः श्रीसदानन्दधीमान् श्रीभाजो मित्रमिश्राज्जगदुपकृतये बिभ्रदादेशदीपम्। ज्ञानानान्द्यैन्य-दोषपहमकलि-भयं याज्ञवल्क्योक्तिकोशात् दृष्ट्वा स्मृत्यर्थसारं समचिनुत यशो धर्म-लक्ष्मी-विहारम् ॥ ( या० स्मृ० व्या० आ० अ० मङ्गल श्लो० १६ ) जो कुछ भी हो, वीर-मित्रोदय व्याख्या के महत्त्व का अपलाप तो कथमपि नहीं किया जा सकता। धर्म-शास्त्र-कानन में परिभ्रमण करने की इच्छा रखने वाले सज्जन के लिए तो यह व्याख्या विशेषतः उपयोगी है। प्रस्तुत-संस्करण प्रस्तुत संस्करण में आधुनिक युग के नियोग को ध्यान में रखकर मूल स्मृति का हिन्दी-अनुवाद समन्वित कर दिया गया है, जिससे संस्कृत के प्रगाढ़ ज्ञान से रहित जिज्ञासुजन का भी अभिलाष पूर्ण हो सके। साथ ही विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा, जिसका महत्त्व प्राच्य तथा पाश्चात्त्य-दोनों ही दृष्टियों से अनुपम है, का समावेश कर दिया गया है जिससे प्राचीन तथा नवीन का सह-स्रोत प्रवाहित होता रहे।