याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
पद्यार्धानुक्रमणिका ७०७
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| तथा शक्तः प्रतिभुवं | ३४३ | ताम्रकास्फटिकाद्रक्त | १३५ |
| तथाश्वमेधावभृथ | ५१८ | तामिस्रं लोहशङ्कुं च | ५०० |
| तथैव परिपाल्योऽसौ | १५१ | तारानक्षत्रसंचारैः | ४८२ |
| तथैवानाश्रमे वाचः | ५०९ | तालजङ्घाप्रयासेन | ४६५ |
| तथोपनिधिराजज्ञी | १८९ | तालुस्थाचलजिह्वश्च | ४८९ |
| तद्वदत्समवाप्नोति | ९५ | तालूदरं बस्तिशीर्षं | ४५९ |
| तदङ्गं रसरूपेण | ४५१ | तावन्त एव मुनयः | ४८७ |
| तदन्नं विकरेद्भूमौ | १०९ | तावद्गौः पृथिवी ज्ञेया | ९३ |
| तदभावेऽस्य तनये | १८ | तित्तिरौ तु तिलद्रोणं | ५७३ |
| तदर्धं मध्यमः प्रोक्तः | १६१ | तिथिवृद्ध्या चरेत्पिण्डान् | ६३३ |
| तदवाप्य नृपो दण्डं | १५६ | तिलौदनरसक्षारान् | ४२२ |
| तदहर्न प्रदुष्येत | ४०८ | तिस्रो वर्णानुपूर्व्येण | २३ |
| तन्निमित्तं क्षतः शस्त्रैः | ५२० | तुलाग्न्यापो विषं कोशौ | २४३ |
| तन्मन्त्रस्य च भेत्तारं | ३८८ | तुलाधारणविद्वद्भिः | २४८ |
| तन्मात्रादीन्यहंकारात् | ४८४ | तुलापुरुष इत्येषः | ६३१ |
| तन्मूले द्वे ललाटाक्षि | ४५७ | तुलाशासनमानानां | ३५६ |
| तन्मूल्याद् द्विगुणो दण्डो | ३५३ | तुला स्त्रीबालवृद्धान्ध | २४५ |
| तपसश्च परस्येह | १७ | तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां | ७ |
| तपसा ब्रह्मचर्येण | ४८७ | तृणगुल्मलतात्वं च | ४९२ |
| तपस्तप्त्वाऽसृजद्ब्रह्मा | ९० | तृप्त्यर्थं पितृदेवानां | ९० |
| तपस्विनो दानशीलाः | २२३ | ते तृप्तास्तर्पयन्त्येनं | १७ |
| तपो वेदविदां क्षान्तिः | ४२९ | तेन त्वामभिषिञ्चामि | १२९ |
| तप्तक्षीरघृताम्बूनाम् | ६२७ | तेन देवशरीराणि | ४८१ |
| तप्तेऽयःशयने सार्धं | ५३९ | तेनाग्निहोत्रिणो यान्ति | ४८६ |
| तमायान्तं पुनर्जत्त्वा | ३९० | तेनोपसृष्टो यस्तस्य | १२७ |
| तमेव कृत्स्नमाप्नोति | १५१ | तेनोपसृष्टो लभते | १२७ |
| तरिकः स्थलजं शुल्कं | ३६५ | तेऽपि तेनैव मार्गेण | ४८६ |
| तवाहंवादिनं क्लीबं | १४६ | तेभ्यः क्रियापराः श्रेष्ठाः | ९० |
| तस्मात्तु नृपतेरर्धं | १५० | तेऽष्टौ लिङ्गा तु तास्तिस्रो | १५९ |
| तस्मात्तेनेह कर्तव्यं | ४९७ | तैलहस्तैलपायी स्यात् | ४९४ |
| तस्माद्भातृनृपयज्ञः | ४६७ | तैश्चापि संयतैर्भाव्यं | १०१ |
| तस्मादस्ति परो देहात् | ४८३ | तैः सार्धं चिन्तयेद्राज्यं | १४१ |
| तस्य वृत्तं कुलं शीलं | ४३५ | त्यजन्दाप्यस्तुतीयांशम् | ३० |
| तस्य षोढा शरीराणि | ४५१ | त्यागः परिग्रहाणां च | ४७८ |
| तस्याप्यन्नं सोदकुम्भं | ११८ | त्रपुसीसकताम्राणां | ८५ |
| तस्येत्युक्तवतो लौहं | २५४ | त्रयो लप्तास्तु विज्ञेयाः | ४६१ |
| तस्यैतदात्मजं सर्वम् | ४५३ | त्रायस्वास्मादभीशापात् | २५९ |
| ४५ या० |
७०८ | याज्ञवल्क्यस्मृतिः
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकाः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| त्रिणाचिकेतदौहित्र | ९९ | दत्त्वा तु ब्राह्मणायैव | २०३ |
| त्रिः प्राश्यापो द्विरुन्मृज्य | ९ | दत्त्वाऽन्नं पृथिवीपात्रं | १०७ |
| त्रिरात्रमा व्रतादेशात् | ४१७ | दत्त्वा भूमिं निबन्धं वा | १४३ |
| त्रिरात्रं दशरात्रं वा | ४०७ | दत्त्वाऽर्घ्यं संस्रवांस्तेषां | १०५ |
| त्रिरात्रान्ते घृतं प्राश्य | ५८५ | दत्त्वोदकं गन्धमाल्यं | १०४ |
| त्रिरात्रोपोषितो जप्त्वा | ६१६ | दद्याच्चतुष्पथे शूर्पे | १३१ |
| त्रिरात्रोपोषितो हुत्वा | ६१७ | दद्यात्त्रिरात्रं चोपोष्य | ५५१ |
| त्रिवित्तपूर्णपृथिवी | १७ | दद्याद्ग्रहक्रमाद्देवं | १३७ |
| त्रिंशद्दिनानि शूद्रस्य | ४१६ | दद्यादपहरेंच्चांशं | २९८ |
| त्रीन्कृच्छ्रानाचरेद्ब्रात्यः | ५८७ | दद्यादृते कुटुम्बार्थान् | २०५ |
| त्रैकाल्यसंध्याकरणात् | ६२१ | दद्यान्माता पिता वा यं | २८६ |
| त्रैवार्षिकाधिकान्नो यः | ५५ | दद्युर्वा स्वकृतां वृद्धिं | २०० |
| त्रैविद्यनृपदेवानां | ३४४ | दद्युस्तद्रिक्थिनः प्रेते | २०४ |
| त्रैविद्यं वृत्तिमद्ब्रूयात् | ३३१ | दध्यन्नं पायसं चैव | १३१ |
| त्र्यङ्गहीनस्तु कर्तव्यो | ३८६ | दध्योदनं हविश्चूर्णं | १३७ |
| त्र्यवराः साक्षिणो ज्ञेयाः | २२४ | दन्तोदूखलिकः काल | ४३९ |
| त्र्यहं प्रेतेष्वनध्यायः | ६४ | दन्दशूकः पतङ्गो वा | ४८९ |
| त्वं तुले सत्यधामासि | २४८ | दम्भिहेतुकपाखण्डि | ५८ |
| त्वमग्ने सर्वभूतानाम् | २५३ | दशकं पारदेश्ये तु | ३६० |
| त्वं विप्र ब्रह्मणः पुत्रः | २५९ | दशपूरुषविख्यातान् | २२ |
| द | दर्शनप्रतिभूर्यत्र | २१२ | |
| दण्डः क्षुद्रपशूनां तु | ३५० | दर्शने प्रत्यये दाने | २११ |
| दण्डं च तत्समं राज्ञे | १८९ | दशैकपञ्चसप्ताह | ३२५ |
| दण्डं च स्वपणं चैव | १८० | दाक्षायणी ब्रह्मसूत्री | ६० |
| दण्डं दद्यात्सवर्गासु | ३७९ | दातव्यं प्रत्यहं पात्रे | ९२ |
| दण्डनीत्यां च कुशलम् | १४१ | दातारो नोऽभिवर्धन्तां | १११ |
| दण्डनीया तदर्धं तु | ३१३ | दाताऽस्याः स्वर्गमाप्नोति पू | ९३ |
| दण्डप्रणयनं कार्यं | ३४१ | दाताऽस्याः स्वर्गमाप्नोति व | ९३ |
| दण्डं स दाप्यो द्विशतं | ३५७ | दानं दमो दया क्षान्तिः | ५४ |
| दण्डाजिनोपवीतानि | १२ | दानं दातुं चरेत्कृच्छ्रं | ५७३ |
| दत्तात्मा तु स्वयंदत्तो | २८६ | दाने विवाहे यज्ञे च | ४२३ |
| दत्तामपि हरेत्पूर्वात् | २६ | दान्तस्त्रिषवणस्नायी | ४३९ |
| दत्तर्णं पाटयेल्लेख्यं | २४१ | दापयित्वा हृतं द्रव्यं | ३६९ |
| दत्त्वा कन्यां हरन्दण्ड्यो | ३०४ | दाप्यः सर्वं नृपेणार्थं | १८१ |
| दत्त्वा चौरस्य वा हन्तुः | ३७४ | दाप्यस्तु दशमं भागं | ३३५ |
| दत्त्वा तु दक्षिणां शक्त्या | १११ | दाप्यस्त्वष्टगुणं यश्च | ३६५ |
| दाप्यो दण्डं च यो यस्मिन् | ३४९ |
श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः अपृष्ठम्
पद्यार्द्धानुक्रमणिका ७०६ श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः अपृष्ठम् दायकालाहते वापि ४४ | देशान्तरगते प्रेते ३६६ दायादेभ्यो न तद्दद्यात् २७३ | देशान्तरस्थे दुर्लेख्ये २३९ दासीकुम्भं बहिर्गामात् ६१० | देशेऽशुचावात्मनि च ६६ दाहयित्वाऽग्निहोत्रेण ३९ | देशे काल उपायेन ४ दिवा संध्यासु कर्णस्थ ८ | दैवे पुरुषकारे च १५४ दीयमानं न गृह्णाति २०४ | दोषैः प्रयाति जीवोऽयं ४७० दीर्घतीव्रामयग्रस्तं ५२० | दौहृदस्याप्रदानेन ४५३ दुःखमुत्पादयेद्यस्तु ३४९ | द्यूतं कृषिं वणिज्यां च १२३ दुःखे च शोणितोत्पादे ३५० | द्यूतमेकमुखं कार्यं ३३९ दुःखोत्पादि गृहे द्रव्यं ३५० | द्यूतस्त्रीपानसक्ताश्च ३६८ दुर्दृष्टांस्तु पुनर्हष्ट्वा ३८९ | द्रव्यं तदौपनिधिकं २२१ दुर्भिक्षे धर्मकार्ये च ३०४ | द्रव्यं ब्राह्मणसंपत्तिः ९७ दुर्वृत्तन्त्रह्मविट्क्षत्रशूद्र ५६९ | द्रव्यप्रकारा हि यथा ४९५ दुग्धा दशगुणं पूर्वात् ६३ | द्रव्याणां कुशला ब्रूयुः ३२७ दुहितॄणां प्रसूता चेत् ३०२ | द्रष्टव्यस्त्वथ मन्तव्यः ४८८ दुरादुच्छिष्टविण्मूत्र ६८ | द्रष्टव्यो व्यवहारस्तु ३४५ दूर्वासर्षपपुष्पाणां १३२ | द्रष्टारो व्यवहाराणां ३३९ दूषणे तु करच्छेदः ३८० | द्वात्रिंशतं पणान्दण्ड्यो ३४८ दृतिं धनुर्वस्तमविं ५६९ | द्वादशाहोपवासेन ६३१ दृश्य द्विष्टा तद्विभागः स्यात् २७८ | द्वासप्ततिसहस्राणि ४६३ दृष्ट्वा ज्योतिर्विदो वैद्यान् १४८ | द्विगुणं त्रिगुणं वापि ४८९ दृष्ट्वा पथि निरासङ्कं ५२० | द्विगुणं प्रतिदातव्यं २१३ देयं चौरहृतं द्रव्यं १९८ | द्विगुणं सवनस्थे तु ५२७ देयं प्रतिश्रुतं चैव ३२३ | द्विगुणा वाऽन्यथा ब्रूयुः २३० देवताथं हविः शिष्टः ७५ | द्विगुणांस्तु कुशान्कृत्वा १०४ देवर्त्विक्स्नातकाचार्य ६७ | द्विजस्तृणैधःपुष्पाणि ३१७ देवातिथ्यर्चनकृते ९७ | द्विनेत्रभेदिनो राज ३८९ देवानुग्रान्समभ्यर्च्य २६१ | द्विपणे द्विशतो दण्डो ३५८ देवान्पितॄन्समभ्यर्च्य ७८ | द्वे कृष्णले रूप्यमाषो १६० देवान्संतर्प्य सरसो ४६७ | द्वे द्वे जानुकपोलोष्ठ ४५७ देवेभ्यश्च हुतादन्नात् ४६ | द्वे शते खर्वटस्य स्यात् ३१८ देशं कालं च भोगं च ३२७ | द्वैधीभावं गुणानेतान् १५४ देशं कालं च योऽतीयात् ३२७ | द्वैधे बहूनां वचनं २२९ देशं कालं वयः शक्तिं ६०९ | द्वौ दैवे प्राक् त्रयः पित्र्ये १०२ देशकालवयःशक्ति ३७२ | द्वौ शङ्कौ कपालानि ४५८ देशकालातिपत्तौ च ३१९ | ध देशाद्देशान्तरं याति १७८ | धनं वेदान्भिषक्सिद्धिं १२४
श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम्
७१० याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम् धनी वोपगतं दद्यात् २४१ | न प्रत्यम्यर्करगोसोम ६० धनुःशतं परीणाहो ३१८ | न ब्रह्मचारिणः कुर्युः ३७६ धमनीनां शते द्वे तु ४६० | न भार्यादर्शनेऽश्नीयात् ५९ धर्मकृद्वृद्धिविचावित् ४०२ | नमस्कारेण मन्त्रेण ५४ धर्मज्ञाः शुचयोऽलुब्धाः ३३३ | नयेयुरेते सीमानं ३०६ धर्मप्रधाना ऋजवः २२३ | न योषित्पतिपुत्राभ्यां २०५ धर्मशास्त्रानुसारेण १६३ | न राज्ञः प्रतिगृह्णीयात् ६३ धर्मार्थकामाःस्वे काले ५१ | न लिप्येतैनसा विप्रो ४३४ धर्मार्थ यश्चरेदेतत् ६३६ | नव छिद्राणि तान्येव ४६० धर्मार्थं विक्रयं नेयाः ४३३ | नवमे दशमे वाऽपि ४५५ धर्मो हि दण्डरूपेण १५६ | न विद्यया केवलया ९१ धान्यकुप्यपशुस्तेयं ५०९ | न विरुद्धप्रसङ्गेन ५७ धान्यमिश्रोऽतिरिक्तार्ङ्गः ४९४ | नष्टापहतमासाद्य ३१९ धारणा प्रेरणं दुःखं ४५२ | नष्टो देयो विनष्टश्च २१६ धारयेत्तत्र चात्मानं ४९० | न संशयं प्रपद्येत ५९ धार्मिकोऽव्यसनश्चैव १३९ | नस्तः प्राणा दिशः श्रोत्रात् ४६८ धावतः पूतिगन्धे च ६६ | न स्पृशन्तीह पापानि ६२३ धिग्दण्डस्त्वथ वाग्दण्डो १६२ | न स्वाध्यायविरोध्यर्थं ५७ धूमं निशां कृष्णपक्षं ४८९ | न हन्याद्विनिवृत्तं च १४६ धेनुः शङ्कस्तथानड्वान् १३८ | नाक्रामेद्रक्तविण्मूत्र ६७ ध्यानयोगेन संपश्येत् ४४८ | नाक्षैः क्रीडेन्न धर्मघ्नैः ६२ ध्येय आत्मा स्थितो योऽसौ ४६४ | नाचक्षीत धयन्तीं गां ६३ न | नातः परंतरो धर्मो १४५ न क्षयो न च वृद्धिश्च ३२७ | नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति १५७ नग्नः स्नात्वा च भुक्त्वा च ६०५ | नानारूपाणि कुर्वाणः ४७९ न च मूत्रं पुरीषं वा ६१ | नान्वये सति सर्वस्वं ३२३ न चाहूतो वदेत्किंचित् १७९ | नापात्रे विदुषा किंचित् ९१ न तत्पुत्रा ऋणं दद्युः ३१२ | नाभिदघ्नोदकस्थस्य २५६ न तत्र कारणं भुक्तिः १९४ | नाभिरोजो गुहं शुक्रं ४५८ न तत्सुतस्तत्सुतो वा १९३ | नामभिर्बलिमन्त्रैश्च १३१ न तु मेहेन्नदीच्छाया ६० | नाश्रमः कारणं धर्मे ४४८ न दत्तं स्त्रीधनं यस्यै ३०५ | नासहस्राद्धरेत्फालं २४७ न दत्तं स्त्रीधनं यासां २७० | नासिका लोचने जिह्वा ४५८ न ददाति हि यः साक्ष्यं २२९ | नास्तिक्यं व्रतलोपश्च ५०९ न दाप्योऽपहृतं तं तु २२१ | नाहितं नानृतं चैव ५९ न निन्दाताडने कुर्यात् ४८ | निक्षेपस्य च सर्वं हि ५०६ न निषेध्योऽल्पबाधस्तु ३१३ | निजधर्माविरोधेन ३३२
पद्यार्धानुक्रमणिका ७११ श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम् निजलालासमायोगात् ४७५ | पञ्चकं च शतं दाप्यः २०३ निज शरीरमुत्सृज्य ४९० | पञ्चगव्यं पिवेद्गोघ्नो ५५१ निद्रालुः क्रूरकृल्लुब्धो ४७२ | पञ्चग्रामी बहिः क्रोशात् ३७१ निमन्त्रयेत पूर्वेद्युः १०१ | पञ्चदश्यां चतुर्दश्यां ६५ निमित्तमक्षरः कर्ता ४५० | पञ्चधातून्स्वयं षष्ठः ४५१ निमित्तशाकुनज्ञान ४८२ | पञ्चधा संभृतः कायो ४०० निमीलिताक्षः स्वस्थो ४८९ | पञ्च पिण्डाननुद्धृत्य ६९ निमेषश्चेतना यत्नः ४८३ | पञ्चबन्धो दमस्तस्य ३२० नियमा गुरुशुश्रूषा ६२५ | पञ्चमात्सप्तमादूर्ध्वं २१ निशाया । व्ययवन्तश्च ३६८ | पञ्चाशत्पणिको दण्डः ३५३ निर्वपेत्तु पुरोडाशं ५८५ | पटे वा ताम्रपट्टे वा १४३ निर्वाश्या व्यभिचारिण्यः ३०१ | पणानेकंशफे दद्यात् ३२२ निवासराजनि प्रेते ४२१ | पणान्दाप्यः पञ्च दश ३४९ निवेद्य दद्याद्विप्रेभ्यः ३९१ | पण्यस्योपरि संस्थाप्य ३६० निशायां वा दिवा वापि ६२९ | पण्येषु प्रक्षिपन्हीनं ३५७ निषिद्धभक्षणं जैह्यं ५०५ | पतनीयकृते क्षेपे ३४३ निषेकाद्याः श्मशानान्ताः ५ | पतितस्य बहिः कुर्युः ६१० निष्कं सुवर्णाश्चत्वारः १६० | पतितानामेव एव ' ६१२ निःसरन्ति यथा लोह ४४९ | पतितासार्थसंवन्धि २२५ निःसार्यते वाण इव ४५५ | पतिप्रियहिते युक्ता ३८ निस्तार्य तामथात्मानं ४३१ | पतिलोकं न सा याति ५३४ निह्नवे भावितो दद्यात् १७७ | पत्नी दुहितरश्चैव २८९ निह्नते लिखितं नैकं १८१ | पत्रशाकं शिखी हत्वा ४९४ नीचाभिगमनं गर्भ ६१२ | पदानि क्रतुतुल्यानि १४६ नीरजस्तमसा सत्त्व ४७८ | पथि ग्रामविवीतान्ते ३१५ नीवीस्तनप्रावरण ३७७ | पन्था देयो नृपस्तेषां ५२ नृपार्थेष्वभिशापे च २४७ | पन्थानश्च विशुध्यन्ति ८८ नृपेणाधिकृताः पूगाः १९४ | पयसा वाऽपि मासेन ५५८ नृशसराज रजक ७१ | पयो दधि च मद्यं च ४३४ नेक्षेताकं न नग्नां स्त्रीं ६१ | परद्रव्यगृहाणां च ३६८ नैतन्मम मतं यस्मात् २३ | परद्रव्याण्यभिध्यायन् ४७१ नैवेशिकं स्वर्णधुर्यं ९४ | परपाककचिर्न स्यात् ५० नैवेशिकानि च ततः १४८ | परपूर्वापतिः स्तेनः १०० नैष्ठिको ब्रह्मचारी तु १८ | परभूमिं हरन्कूपः ३१२ न्यायागतधनस्तत्त्व ४९१ | परशय्यासनोद्यान ७० न्यूनाधिकविभक्तानां २७१ | परश्च हीन आत्मा च १५० प | परस्परं तु सर्वेषां ३६७ पचे गते वाप्यश्नीयात् ४३९ |
७१२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकाः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| परस्य योषितं हृत्वा | ४९४ | पिण्डांस्तु गोऽजविप्रेभ्यो | १२१ |
| पराशरव्यासशङ्ख | ३ | पिण्याकं वा कणान्वापि | ५३० |
| परिभूतामधःशय्यां | २८ | पिण्याकाचामतक्राम्बु | ६३१ |
| परिशुष्यत्स्खलद्वाक्यो | ५७८ | पितरि प्रोषिते प्रेते | २०७ |
| परिस्कृते शुचौ देशे | १०२ | पिता पितामहो भ्राता | २५ |
| परेण भुज्यमानायाः | १८६ | पितापुत्रविरोधे तु | ३५५ |
| पर्णोदुम्बरराजीव | ६२६ | पितुरूर्ध्वं विभजतां | २७९ |
| पलं सुवर्णाश्चत्वारः | १५९ | पितुः स्वसारं मातृश्व | ५०७ |
| पलाण्डुं विड्वराहं च | ७७ | पितृद्रव्याविरोधेन | २७३ |
| पवित्रपाणिराचान्तः | १०१ | पितृपात्रं तदुत्तानं | १११ |
| पवित्राणि जपेत्पिण्डान् | ६३४ | पितृपुत्रश्वस्रुआतृ | ३५४ |
| पशुमण्डूकनकुल | ६५ | पितृभ्यः स्थानमसीति | १०५ |
| पशून्गच्छन्शतं दाप्यो | ३८१ | पितृभ्यां यस्य यद्दत्तं | २७९ |
| पश्चाच्चंवापसरता | ३८७ | पितृमातृपतिभ्रातृ | ३०१ |
| पश्चात्तापो निराहारः | ४२९ | पितृमातृपराश्चैव | ९९ |
| पश्यतोऽब्रुवतो भूमेः | १८४ | पितृमातृसुतत्यागः | ५०९ |
| पश्येच्चारांस्ततो दूतान् | १४७ | पितृमातृसुतभ्रातृ | ३६ |
| पाखण्ड्यनाश्रिताः स्तेनाः | ३९६ | पितृयानोऽजवीथ्याश्च | ४८६ |
| पाणिपादशलाकाश्च | ४५६ | पितृलोकं चन्द्रमसं | ४८९ |
| पाणिप्रक्षालनं दत्त्वा | १०३ | पितॄंश्च मधुसर्पिर्भ्यां | ४४ |
| पाणिग्राह्यः सवर्णासु | २५ | पितॄणां तस्य तृप्तिः स्यात् | ६४१ |
| पात्राणां चमसानां च | ८० | पितॄन्मधुघृताभ्यां च | १६ |
| पात्रे धनं वा पर्याप्तं | ५२३ | पित्तात्तु दर्शनं पक्ति | ४५३ |
| पात्रे प्रदीयते यत्तत्सकलं | ४ | पित्रोस्तु सूतकं मातुः | ४०८ |
| पादकेशांशुककरो | ३४७ | पिशुनानृतिनोश्चैव | ७१ |
| पादशौचं द्विजोच्छिष्टं | ९४ | पीडाकर्षाशुकावेष्ट | ३४७ |
| पादौ प्रतापयेन्नाग्नौ | ६३ | पीड्यमानाः प्रजा रक्षेत् | १५० |
| पारदारिकचौरं वा | ३८५ | पुण्यात्षड्भागमादत्ते | १४९ |
| पारदार्यं पारिवित्र्यं | ५०९ | पुत्रपौत्रैर्ऋणं देयं | २०७ |
| पार्श्वकाः स्थालकैः सार्धं | ४२७ | पुत्रं श्रेष्ठ्यं च सौभाग्यं | १२४ |
| पालदोषविनाशे तु | ३१७ | पुत्रान्देहि धनं देहि | १३२ |
| पालितं वर्धयेन्नीत्या | १४२ | पुत्रोऽनन्याश्रितद्रव्यः | २०८ |
| पालो येषां न ते मोच्याः | ३१६ | पुनरावर्तिनो बीज | ४८६ |
| पावकः सर्वमेध्यस्त्वं | २८ | पुनर्धात्रीं पुनर्गर्भं | ४५५ |
| पांसुप्रतर्षे दिग्दाहे | ६६ | पुनःसंस्कारमर्हन्ति | ५३२ |
| पिण्डदोऽशहरश्चैषां | २८७ | पुमान्संग्रहणे ग्राह्यः | ३७७ |
| पिण्डयज्ञावृता देयं | ४०३ | पुराणन्यायमीमांसा | ३ |
पद्यार्धानुक्रमणिका ७१३ श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम् पुरुषोऽनृतवादी च ४७१ प्रथमे मासि संक्लेद ४५२ पुरोहितं प्रकुर्वीत १४१ प्रथमं साहसं दद्यात् ३८७ पुंश्चलीवानरखरैः ५७५ प्रदक्षिणमनुव्रज्य ११२ पुष्पं चित्रं सुगन्धं च १३१ प्रदर्शनार्थमेतत्तु ४९५ पूर्वकर्मपराधी च ३६८ प्रधानं क्षत्रिये कर्म ५३ पूर्वदृष्टेऽधरीभूते ४८० प्रनष्टाधिगतं देयं १९७ पूर्वं पूर्वं गुरु ज्ञेयं १९४ प्रपन्नं साधयन्नर्थं २०२ पूर्वस्मृतावधर्दण्डः ३५१ प्रमाणं लिखितं भुक्तिः १८४ पृथक्पृथग्दण्डनीयाः २३२ प्रमादमृतनष्टांश्च ३१६ पृथक्सान्तपनद्रव्यैः ६२६ प्रमादवान्भिन्नवृत्तो ४७२ पृथिवी पादतस्तस्य ४६८ प्रयच्छन्ति तथा राज्यं १२५ पौषमासस्य रोहिण्यां ६४ प्रयत्न आकृतिर्वर्णः ४५२ प्राकुर्यादायकर्मान्त १४५ प्रयोजकेऽसति धनं २१९ प्रक्रान्ते सप्तमं भागं ३२६ प्ररोहिशाखिनां शाखा ३५१ प्रक्षिपेत्सत्सु विप्रेषु १२१ प्रविशेयुः समालभ्य ४०१ प्रजापतिपितॄन्ब्रह्म ९ प्रवेशनादिकं कर्म ४०२ प्रजापीडनसंतापात् १५१ प्रवृत्तचक्रतां चैव १२४ प्रतिकूलं गुरोः कृत्वा ५८२ प्रव्रज्यावसितो राज्ञो ३३० प्रतिगृह्य तदाख्येयम् ४३५ प्रष्टव्या योषितश्चास्य ३७५ प्रतिग्रहपरीमाणं १४३ प्रसह्य घातिनश्चैव ३७१ प्रतिग्रहः प्रकाशः स्यात् ३२३ प्रसह्य दास्यभिगमे ३८३ प्रतिग्रहसमर्थोऽपि ९६ प्रस्थानविघ्नकृच्चैव ३३६ प्रतिग्रहे सूनिचक्रि ६३ प्राक्सौमिकीः क्रियाः कुर्यात् ५५ प्रतिग्रहोऽधिको विप्रे ५२ प्राग्वा ब्राह्मेण तीर्थेन ८ प्रतिपत्प्रभृतिष्वेकां १२३ प्राजापत्यं चरेत्कृच्छ्रं ५४२ प्रतिपन्नं स्त्रिया देयं २०६ प्राजापत्यां तदन्ते तान् ४४२ प्रतिप्रणवसंयुक्तां १० प्राणात्यये तथा श्राद्धे ७८ प्रतिभूर्दापितो यत्तु २१३ प्राणानायम्य संप्रोक्ष्य १० प्रतिमानसमीभूतो २४८ प्राणायामशतं कार्यं ६१० प्रतिवेदं ब्रह्मचर्यं १४ प्राणायामं जले कृत्वा ५७५ प्रतिषिद्धमनादिष्टं ३६४ प्राणायामी जले स्नात्वा ६०५ प्रतिषेधे तयोर्दण्डो ३७८ प्रातःसंध्यामुपासीत ४४ प्रतिसंवत्सरं चैवम् ११९ प्रातिभाव्यमृणं साध्यं २१० प्रतिसंवत्सरं त्वग्र्याः ४९ प्रातिलोम्यापवादेषु ३४२ प्रतिसंवत्सरं सोमः ५५ प्रातिलोम्ये वधः पुंसो ३७८ प्रत्यर्थिनोऽग्रतो लेख्यं १६८ प्राप्ते नृपतिना भागे ३३८ प्रत्येकं प्रत्यहं पीतैः ६२७ प्राप्यते ह्यात्मनि तथा ४७६
श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम्
७१४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम् प्रायश्चित्तमकुर्वाणाः ४९९ ब्रह्मचर्ये स्थितो नैक १३ प्रायश्चित्तैरपैत्येनो ५०० ब्रह्मचारी भवेत्तां तु ११२ प्रायश्चित्तं प्रकल्प्यं स्यात् ६०९ ब्रह्मचार्येव पर्वाणि ३१ प्रियो विवाहश्च तथा ४९ ब्रह्मणैषां वरो दत्तः १३८ प्रीणयन्ति मनुष्याणां १२५ ब्रह्मलोकमतिक्रम्य ४८१ प्रीणाति देवानाज्येन १६ ब्रह्मलोकमवाप्नोति १८ प्रेषयेच्च ततश्चारान् १४८ ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रान् १२३ प्रोक्षणं संहतानां च ८१ ब्रह्महत्याव्रतं वापि ५६७ प्रोषिते कालशेषः स्यात् ४१४ ब्रह्महत्यासमं ज्ञेयम् ५०५ ब्रह्महा क्षयरोगी स्यात् ४९३ फ ब्रह्महा द्वादशाब्दानि ५१३ फलपुष्पान्नरसज ५७३ ब्रह्महा मद्यपः स्तेनः ५०२ फलोपलचौमसोम ४३२ ब्राह्मणः काममश्नीयात् १५ फालाहतमपि क्षेत्रं ३१३ ब्राह्मणक्षत्रियविशः १५ फेनप्रख्यः कथं नाशं ४०१ ब्राह्मणक्षत्रियविशां भार्या २३ ब्राह्मणक्षत्रियविशां भैक्षः १२ ब ब्राह्मणः पात्रतां याति ६४१ बध्वा वा वाससा क्षिप्रं ६०५ ब्राह्मणप्रातिवेश्यानाञ्च ३६५ बन्दिग्राहांस्तथा वाजि ३७१ ब्राह्मणस्तु परिक्षीणः २०४ बन्धुदत्तं तथा शुल्कं ३०२ ब्राह्मणस्य परित्राणात् ५१८ बन्धुभिश्च स्त्रियः पूज्याः ३५ ब्राह्मणस्वर्णहारी तु राज्ञे ५३४ बलाद्दासीकृतश्चौरैः ३२९ ब्राह्मणस्वर्णहारी तु रुद्र ६१८ बलानां दर्शनं कृत्वा १४७ ब्राह्मणाम्भोजयेद्दद्यात् १३३ बलिकर्मस्वधाहोम ४६ ब्राह्मणेनानुगन्तव्यो ४२२ बलोपाधिविनिर्वृत्तान् १९५ ब्राह्मणेषु क्षमी स्निग्धे १४९ बहवः स्युर्यदि स्वांशैः २१३ ब्राह्मणेषु चरेन्नैक्षं १२ बहूनां यद्यकामासौ ३८३ ब्राह्मण्यां क्षत्रियात्सूतॊ ४१ बालस्ववासिनीवृद्ध ४७ ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय ५१ बाहुग्रीवानेत्रसक्थि ३४३ ब्राह्मो विवाह आहूय २४ बीजायोवाह्य रत्नस्त्री ३२५ ब्रूयुरंस्तु स्वधेत्युक्ते ११० बुद्धीन्द्रियाणि सार्थानि ४८४ भ बुद्धेरुत्पत्तिरव्यक्तात् ४८४ भक्तावकाशाग्न्युदक ३७४ बुभुक्षितस्यहं स्थित्वा ४३५ भक्तयित्वोपविष्टानां ३१४ बृहस्पते अतियदर्यः १३६ भक्ष्याः पञ्चनखाः सेधा ७७ ब्रह्मक्षत्रविशां कालः १५ भगं ते वरुणो राजा १३० ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राः ५ भगमिन्द्रश्च वायुश्च १३० ब्रह्मखानिलतेजांसि ४७४ भगास्थ्येकं तथा पृष्ठे ४५७ ब्रह्मचर्यं दया क्षान्तिः ६२४
पद्यार्धानुक्रमणिका ७१५ श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम् म अगिन्यश्च निजावंशात् २७९ भद्रासनोपविष्टस्य १२८ मज्जाम्तां जुहुयाद्वापि ५२१ भयं हित्वा च भूतानां ४४६ मण्डलं तस्य मध्यस्थ ४६३ भर्तृभ्रातृपितृज्ञाति ३५ मतं मेऽसुकपुत्रस्य २३७ भवो जातिसहस्रेषु ४४७ मत्तोन्मत्तार्तव्यसनि १९५ भस्मपङ्करजःस्पर्श ३४५ मत्स्यान्पकांस्तथैवामान् १३१ भस्माद्भिः कांस्यलोहानां ८५ मत्स्यांश्च कामतो जग्ध्वा ७६ भार्याया विक्रयश्चैषां ५०९ मधु दंशः पलं गृध्रो ४९५ भार्यारतिः शुचिर्भृत्यः ५४ मधुना पयसा चैव १६ भावावाद्यौ च जगतः १३८ मधुमांसाशनोच्छिष्ट १३ भात्रैरनिष्टैः संयुक्तः ४७२ मधुमांसाशने कार्यः ५८२ भासं च हरवा बद्याद्वा ५७२ मध्यमं क्षत्रियं वैश्यं ३८५ भास्करालोकनाशशील १३ मध्यमो जातिपूगानां ३४४ भिन्ने दुग्धेऽथवा छिन्ने २३९ मध्यस्थस्थापितं चेत्स्यात् २०४ भिन्ने पणे च पञ्चाशत् ३५८ मध्ये पञ्चपला वृद्धिः ३२६ भिषङ्मिथ्याचरन्दण्ड्यः ३५६ मध्यो दण्डो व्रणोद्भेदे ३४८ भुक्त्वाऽर्द्रपाणिरम्भोऽन्तः ६६ मनश्चैतन्ययुक्तोऽसौ ४५४ भूतपित्रमरब्रह्म ४६ मनसश्चन्द्रमा जातः ४६८ भूतमप्यनुपन्यस्तं १८१ मन्त्रमूलं यतो राज्यं १५२ भूतात्मनस्तपोविद्ये ४३० मन्वत्रिविष्णुहारीत ३ भूदीपाश्चान्नवस्त्राग्भः ९४ मन्वन्तरैर्युगप्राप्त्या ४८२ भूमेर्गन्धं तथा घ्राणं ४५३ मम दाराः सुतामात्याः ४७७ भूर्या पितामहोपात्ता २७६ मयि तेज इति च्छायां ५७७ भृशुद्धिर्मार्जनाद्दाहात् ८४ मर्यादायाः प्रभेदे च ३११ भृतकाध्यापकः क्लीबः १०० मलिनो हि यथाऽऽदर्शो ४७३ भृतादध्ययनादानं ५०९ महागणापतेश्चैव १३४ भृतिमर्धपथे सर्वां ३३६ महानरककाकोल ७०० भृत्यांश्च तर्पयेच्छूभ्रश्नु ४३७ महापशूनामेतेषु ३५० भृत्यैः परिवृतो भुक्त्वा ५१ महापातकजान्घोरान् ४९२ भेदं चैषां नृपो रक्षेत् ३३४ महापातकजैर्घोरैः ५०८ भेषजस्नेहलवण ३५७ महापापोपपापाभ्यां ५८४ भैक्षाग्निकार्ये त्यक्त्वा तु ५८१ महाभियोगेष्वेतानि २४२ भोगांश्च दद्याद्विप्रेभ्यो १४२ महाभूतानि सत्यानि ४७५ भोजयेच्चागतान्काले ४८ महिपोष्ट्रगवां द्वौ द्वौ ३२२ भोज्यान्ना नापितश्चैव ७२ महीपतीनां नाशौचं ४२२ भ्रातृणामथ दम्पत्योः २१० महोक्षं वा महाजं वा ४९ भ्रेषश्चेन्मार्जितेऽदत्ते २२१ महोक्षोत्सृष्टपशवः ३१६
७१६ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम् महोत्साहः स्थूललक्षः १३१ | मृग (गा) ध्सूकरोष्ट्राणां ४९२ मातापितृगुरुत्यागी १०० | मृच्चर्मपुष्पकुतप ३५८ मातामहानामप्येवं ११० | मृच्चर्ममणिसूत्रायः ४३२ . मातामहानामप्येवं १०२ | मृतकस्पः प्रहारार्तो ५२२ मातुर्दुहितरः शेषं २७२ | मृताङ्गलग्नविक्रेतुः ३८९ मातुर्यदग्रे जायन्ते १५ | मृतायां दत्तमार्दद्यात् ३०४ मातुः सपत्नीं भगिनीं ५०७ | मृते जीवति वा पत्यौ ३० मातृपित्रतिथीनात् ६९ | मृते पितरि कुर्युस्तं २८९ मात्स्यहारिणकौरभ्र १२१ | मृतेऽहनि प्रकर्तव्यं ११९ मानुषे मध्यमं राज ३५६ | मृत्तिकां रोचनां गन्धान् १२९ मानुष्ये कदलीस्तम्भ ४०० | मृत्युदेशसमासन्नं ३७६ मानेन तुलया वापि ३५७ | मृद्दण्डचक्रसंयोगात् ४७५ मान्यावेतौ गृहस्थस्य ५० | मेदसा तर्पयेद्देवान् १७ मारुतेनैव शुद्ध्यन्ति ८९ | मैत्रमौद्वाहिकं चैव २७३ मार्जनं यज्ञपात्राणां ८१ | मोच्य आधिस्तदुत्पन्ने २२० मार्जारगोधानकुल ५७१ | मोहजालमपास्येह ५६६ माषानष्ठौ तु महिषी ३१३ | य मांसक्षीरौदनमधु १७ | यं यं क्रतुमधीते च १७ मांसवृद्ध्याभितृप्यन्ति १२२ | यः कण्टकैर्विंतुदति ४४० मांसं शय्यासनं धानाः ९६ | यः कश्चिदर्थो निष्णातः २३६ मासेनेवोपभुञ्जीत ६३३ | यः साक्ष्यं श्रावितोऽन्येभ्यो २३४ मास्यर्बुदं द्वितीये तु ४५२ | यः साहसं कारयति ३५३ माहिष्येण करण्यां तु ४२ | य आहवेषु वध्यन्ते १४५ मितश्च संमितश्चैव १३१ | य इदं धारयिष्यन्ति ६४१ मित्रध्रुक् पिशुनः सोम १०० | य इदं श्रावयेद्विद्वान् " मित्राण्येताः प्रकृतयो १५६ | य एनमेवं विन्दन्ति ४८८ मिथिलास्थः स योगीन्द्रः ३ | य एव नृपतेर्धर्मः १५१ मिथ्याभियोगी द्विगुणं १७७ | यजूंषि शक्तितोऽधीते १६ मिथ्याभिशस्तदोष च ५८३ | यजेत दधिकर्कन्धू ११२ मिथ्याभिशंसिनो दोषं ५८३ | यज्जन्म सर्वभूतानाम् ३६७ मिथ्यावदन्परीमाणं ३६५ | यज्ञस्थऋत्विजे दैवः २४ मुक्त्वाग्निं मृदितव्रीहि २५६ | यज्ञानां तपसां चैव १६ मुखजा विप्रुषो मेध्याः ८८ | यज्ञार्थं लब्धमददत् ५६ मुखबाहूरुपज्जाः स्युः ४६८ | यज्ञांश्चैव प्रकुर्वीत १४१ मूर्धा सकण्ठहृदयं ४५८ | यज्ञेन तपसा दानैः ४८९ मूलकं पूरिकापूपान् १३१ | यत एतानि दृश्यन्ते ४८३ मूषको धान्यहारी स्यात् ४९५ | यतिपात्राणि मृद्वेणु ४४६
पद्यार्धानुक्रमणिका ७१७ श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम् यतो वेदाः पुराणानि ४८७ यस्तत्र विपरीतं स्यात् ३३२ यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं १३० यस्मात्तस्मात्स्त्रियः सेव्याः ३१ यत्नात्परीक्षितः पुंस्त्वे २२ यस्मिन्देशे मृगः कृष्णः २ यत्र यत्र च संकीर्णं ६२३ यस्मिन्देशे य आचारो १५१ यत्र वृत्तमिमे चोभे ९१ यस्मिंस्तु संस्रवाः पूर्वं १११ यत्रानुकूल्यं दंपत्योः २९ यस्य वेगैर्धिनः जीर्येत् २५९ यथाकथंचित्त्रिगुणः ६२९ यस्योचुः साक्षिणः सत्यां २२९ यथाकथंचिद्धृत्वा गां ९४ या आहता ह्येकवर्णैः १२९ यथाकथंचिपिण्डानां ६३३ यागस्थञ्चत्रविट्घाती ५२५ यथाकर्म फलं प्राप्य ४९७ याचितान्वाहितन्यास २२२ यथाकामी भवेद्वापि ३२ याचितेनापि दातव्यं ९२ यथा गुरुकृतफल यातश्चेदन्य आधेयः २१७ यथाजाति यथावर्णं २२४ या दिव्या इति मन्त्रेण १०३ यथात्मानं सृजत्यात्मा ४८५ यानं वृत्तं प्रियं शय्यां ९५ यथार्पितान्पशून्गोपः ३१६ यावद्धस्तस्य पादौ द्वौ ९३ यथालाभोपपन्नेषु १०६ यावत्सस्यं विनश्येत्तु ३१५ यथावर्णं प्रदेयानि १३६ युक्तिप्राप्तिक्रियाचिह्नं २४० यथाविधानेन पठन् ४६४ युग्मान्दैवे यथाशक्ति १०२ यथाशास्त्रं प्रयुक्तः सन् १५७ ये च दानपराः सम्यक् ४८६ यथा हि भरतो वर्णैः ४७९ येऽनेकरूपाश्चाधस्तात् ४८१ यथा ह्येकेन चक्रेण १५५ ये पातककृतां लोकाः २२७ यदस्यान्यद्रश्मिशतं ४८१ ये राष्ट्राधिकृतास्तेषां १५० यदा तु द्विगुणीभूतं २२० ये लोका दानशीलानां ९६ यदा सस्यगुणोपेतं १५४ ये समाना इति द्वाभ्यां ११४ यदि कुर्यात्त्समानांशान् २७० योगशास्त्रं च मत्प्रोक्तं ४६३ यदुच्यते द्विजातीनां २३ योगी मुक्तश्च सर्वासां ४७४ यद्ददाति गयास्थश्च १२२ योगीश्वरं याज्ञवल्क्यं १ यद्यप्येकोऽनुवेच्येषां ४६१ योज्या व्यस्ताः समस्ता वा १६२ यद्यस्मिन् पापकृन्मातः २४८ यो दण्ड्यान्दण्डयेद्राजा १५८ यद्ध्येवं स कथं ब्रह्मन् ४६९ यो द्रव्यदेवतात्याग ४६७ यन्मेऽद्य रेत इत्याभ्यां ५७६ योऽभियुक्तः परेतः स्यात् १९४ यमसूक्तं तथा गाथा ३९२ यो मन्येताजितोऽस्मीति ३९० यमापस्तम्बसंवर्ताः ३ यो यस्मान्निःसृतश्चैषां ४८५ यवार्थंस्तु तिलैः कार्याः १०५ यो यावत्कुरुते कर्म ३३६ यवैर्न्ववकीर्याथ १०३ यो येन सवसत्येषां ४९३ यश्च यस्य यदा दुःखः र यश्चैवमुक्तवाऽहं दाता ३५३ रक्तस्रग्वसनां सीमां ३०८
रङ्गावतारिपाखण्डि २२५
७१८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
रखेत्कन्यां पिता विद्म ३६ रङ्गावतारिपाखण्डि २२५ रजसा तमसा चैव ४७२ रजस्तमोभ्यामाविष्टः ४८५ रजस्वलामुखास्वादः ५०५ रथ्याकर्दमतोयानि ८९ रम्यं पश्यन्यमाजीव्यं १४४ रश्मिरश्मी रजश्छाया ८७ रसस्य नव विज्ञेयाः ४६२ रसस्याष्टगुणा परा २०१ रसात्तु रसनं शैत्यं ४५३ रहिते भिक्षुकैर्ग्रामे ४४५ राक्षसो युद्धहरणात् २५ रागोद्लोभाद्भयाद्वापि १६५ राजतादयसः सीसात् १३५ राजदैवोपघातेन ३६२ राजनि स्थाप्यते योऽर्घः ३५९ राजपत्न्यभिगामी च ३७६ राजयानासनारोढुः ३८९ राजा कृत्वा पुरे स्थानं ३३१ राजान्तेवासियाज्येभ्यः ५८ राजा लब्ध्वा निधिं दद्यात् १९८ राजा सुकृतमादत्ते १४६ राज्ञः कुलं श्रियं प्राणान् १५१ राज्ञाऽधर्मज्ञिको दाप्यः २०३ राज्ञाऽन्यायेन यो दण्डो ३९१ राज्ञामेकादशे सैके ७ राज्ञा सचिह्नं निर्वास्याः ३३९ राज्ञा सभासदः कार्याः १६४ राज्ञा सर्वं प्रदाप्यः स्यात् २२८ राज्ञोऽनिष्टप्रवक्तारं ३८८ रिक्थग्राह ऋणं दाप्यो २०८ रुच्या वाऽन्यतरः कुर्यात् २४३ रुद्रस्यानुचरो भूत्वा ४६५ रूपं देहि यशो देहि १३२ रूपाण्यपि तथैवेह ४७० रोगी हीनातिरिक्ताङ्गः ९९ रोम्णां कोट्यस्तु पञ्चाशत् ४६१
श्लोकाः पृष्ठम् रौरवं कुङ्मलं पूति ५०० ल ललाटं स्विद्यते चास्य १७८ ललाटे कर्णयोरक्ष्णोः १३० लशुनं गृञ्जनं चैव ७७ लाङ्गालव्रणमांसानि ४३४ लाभालाभौ यथाद्रव्यं ३६३ लिखितं ह्यमुकेनेति २३७ लिङ्गं छित्त्वा वधस्तस्य ५०७ लिङ्गस्य छेदने मृत्यौ ३५० लिङ्गेन्द्रियग्राह्यरूपः ४८१ लेख्यं तु साक्षिमत्कार्यं २३६ लेख्यस्य पृष्ठेऽभिलिखेत् २४१ लोकानन्त्यं दिवः प्राप्तिः ३१ लोमभ्यः स्वाहेत्यथवा ६१७ लोमभ्यः स्वाहेत्येवं हि ५२१ लौहामिषं महाशाकं १२२ व वङ्क्षणौ वृषणौ वृक्कौ ४५९ वणिग्लाभं न चामोति १२७ वनाद्गृह्याह्ला कृत्वेष्टिं ४४२ वपावसावहननं ४५९ वयः कर्म च वित्तं च १६२ वयोबुद्ध्यर्थवाग्वेषा ५४ वर्णक्रमाच्छुतं द्वित्रि १९९ वर्णानामानुलोम्येन त ३४२ वर्णानामानुलोम्येन दा ३३० वर्णाश्रमेतराणां नो १ वर्णिनां हि वधो यत्र २३४ वर्त्याधारस्नेहयोगात् ४८० वर्षत्यप्रावृतो गच्छेत् ६१ वसा त्रयो द्वौ तु मेदो ४६२ वसानस्त्रीन्पणान्दण्ड्यः ३५५ वसुरुद्रादितिसुताः १२५ वसेत्स नरके घोरे ७९ वस्त्रं चतुर्गुणं प्रोक्तं २१४
श्लोकार्धानुक्रमणिका ७१६
श्लोकार्धानुक्रमणिका ७१६ श्लोकाः पृष्ठानि | श्लोकाः पृष्ठम् वस्त्रधान्यहिरण्यानां २०९ | विनायकस्य जननी १३१ वाकोवाक्यं पुराणं च १७ | विनीतः सत्त्वसंपन्नः १३९ वाक्चक्षुः पूजयति नो १७८ | विनीतस्त्वथ वार्तायां १३९ वाक्पाणिपादचापल्यं ५० | विपाकः कर्मणां प्रेत्य ४७० वाक्शस्तमम्बुनिर्णिक्तं ८६ | विपाकास्त्रिप्रकाराणां ४८५ वाचं वा को विजानाति ४७५ | विपाके गोवृषाणां तु ५८३ वाच्यतामित्यनुज्ञातः ११० | विप्रत्वेन च शूद्रस्य ३८९ वाजेवाज इति प्रीतः १११ | विप्रदण्डोद्यमे कृच्छ्रः ६०६ वानप्रस्थगृहेष्वेव ४४१ | विप्रदुष्टां स्त्रियं चैव ३७५ वानप्रस्थयतिब्रह्म २९७ | विप्रपीडाकरं छेद्यम् ३४६ वानप्रस्थो ब्रह्मचारी ४३६ | विप्रान्मूर्धावसिक्तो हि ४० वायवीयैर्विगण्यन्ते ४६१ | विप्रा हि क्षत्रियात्मानो ६७ वायुभक्षः प्रागुदीचीं ४४१ | विप्रुषो मक्षिकाः स्पर्शे ८७ वायुभक्षो दिवा तिष्ठन् ६२४ | विप्रेभ्यो दीयते द्रव्यं १४५ वायोश्च स्पर्शनं चेष्टां ४५३ | विप्लुतः सिद्धमात्मानं ४७६ वालवासा जटी वापि ५३० | विभक्तेषु सुतो जातः २७७ वासनस्थमनाख्याय २२१ | विभजेरन्सुताः पित्रोः २७१ वासो गृहान्तिके देयं ६१२ | विभागं चेत्पिता कुर्यात् २६९ विकर्णकरनासौष्ठीं ३७५ | विभागनिह्नवे ज्ञाति ३०५ विक्रयावक्रयाधान ३५५ | विभागभावना ज्ञेया ३०५ विक्रियापि च दृष्टैव ४८० | विभावयेन्न चेल्लिङ्गैः १९७ विक्रीणतां वा विहितो ३५९ | विमना विफलारम्भः १२७ विक्रीणीते दमस्तत्र ३६२ | विराजः सोऽन्नरूपेण ४६६ विक्रीतमपि विक्रेयं ३६१ | विरुद्धं वर्जयेत्कर्म ६२ विक्रेतुर्दर्शनाच्छुद्धिः ३२० | विवादयेत्सद्य एव ५७८ विख्यातदोषः कुर्वीत ६१३ | विवादं वर्जयित्वा तु ६९ वितथाभिनिवेशी च ४७१ | विवादाद्विगुणं दण्डं २३२ वित्तात्मानं वेद्यमानं ४८२ | विवीतभर्तुस्तु पथि ३७० विदश्य निम्बपत्राणि ४०१ | विशेषपतनीयानि ६१२ विद्याकर्मवयोबन्धु ५१ | विश्वेदेवाश्च प्रीयन्तां ११० विद्यातपोभ्यां हीनेन ९२ | विषयेन्द्रियसंरोधः ४७८ विद्यार्थी प्राप्नुयाद्विद्यां ६४१ | विषाग्निदां पतिगुरु ३७५ विद्वानशेषमादद्यात् १९८ | विहितस्याननुष्ठानात् ४९७ विनापि शीर्षकात्कुर्यात् २४३ | वीणावादनतत्त्वज्ञः ४६५ विना धारणकाद्वापि २१९ | वृक्षगुल्मलतावीरुत् ५७३ विनापि साक्षिभिर्लेख्यं २३८ | वृथाकृसरसंयाव ७५ विनायकः कर्मविघ्न १२६ | वृथादानं तथैवेह २०५
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकाः | पृष्ठम् |
७२० याज्ञवल्क्यस्मृतिः
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकाः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| वृद्धबालातुराचार्य | ६९ | शक्तोऽप्यमोचयन्स्वामी | ३८७ |
| वृद्धभारिनृपस्नात | ५२ | शक्त्या च यज्ञकृन्मोचे | ४४२ |
| वृषक्षुद्रपशूनां च | ३५४ | शतमानं तु दशभिः | १६० |
| वृष्ट्यायुःपुष्टिकामो वा | १३४ | शते दशपला वृद्धिः | ३२६ |
| वेत्ति सर्वगतां कस्मात् | ४६९ | शतं स्त्रीदूषणे दद्यात् | ३८१ |
| वेद एव द्विजातीनां | १६ | शस्यस्तदर्धिकः पाद् | ३४२ |
| वेदप्प्लावी यवाश्यब्दं | ५८७ | शं नो देवीस्तथा काण्डात् | १३६ |
| वेदमध्यापयेदेनं | ७ | शं नो देव्या पथः क्षिप्त्वा | १०३ |
| वेदं व्रतानि वा पारं | १८ | शपन्तं दापयेद्राजा | ३४१ |
| वेदार्थर्वपुराणानि | ४६ | शब्दः स्पर्शश्च रूपं च | ४८५ |
| वेदानुवचनं यज्ञो | ४८७ | शब्दादिविषयोद्योगं | ४७६ |
| वेदाभ्यासरतं शान्तं | ६२३ | शरणागतबालस्त्री | ६१३ |
| वेदार्थविज्ज्येष्ठसामा | ९८ | शरीरचिन्तां निर्वर्त्य | ४४ |
| वेदार्थानधिगच्छेच्च | ४५ | शरीरपरिसंख्यानं | ४७८ |
| वेदाः स्थानानि विद्यानां | ३ | शरीरसंचये यस्य | ४७९ |
| वेदैः शास्त्रैः सविज्ञानैः | ४८२ | शरीरेण च नात्मायं | ४८० |
| वैणाभिशस्तवाधुष्य | ७० | शशश्च मत्स्येष्वपि हि | ७७ |
| वैतानोपासनाः कार्याः | ४०५ | शस्त्रविक्रयिकर्मार | ७१ |
| वैरूप्यं मरणं वापि | ४५३ | शस्त्रावपाते गर्भस्य | ३७४ |
| वैश्यवृत्त्यापि जीवन्तो | ४३२ | शस्त्रासवमधूच्छिष्टं | ४३२ |
| वैश्यश्च धान्यधनवान् | ६४१ | शस्त्रेण तु हता ये वै | १२३ |
| वैश्यहाब्दं चरेदेतत् | ५६७ | शाकरज्जुमूलफल | ८० |
| वैश्यात्तु करणः शूद्रां | ४१ | शाकाद्रौषधिपिण्याक | ४३२ |
| वैश्या प्रतोदमादद्यात् | २५ | शातातपो वसिष्ठश्च | ३ |
| वैश्याशूद्रयोस्तु राजन्यरात् | ४१ | शास्त्राणि चिन्तयेद्बुद्ध्या | १४८ |
| व्यतीपातो गजच्छाया | ९७ | शिरःकपाली ध्वजवान् | ५१३ |
| व्यत्यये कर्मणां साम्यं | ४३ | शिराः शतानि सप्तैव | ४६० |
| व्यभिचारादृतौ शुद्धिः | २८ | शिल्पैर्वा विविधैर्जीवेत् | ५३ |
| व्यवहारान्नृपः पश्येत् | १६३ | शुक्तं पर्युषितोच्छिष्टं | ७२ |
| व्यवहारान्स्वयं पश्येत् | १५८ | शुक्रः शनैश्चरो राहुः | १३५ |
| व्यवहारांस्ततो दृष्ट्वा | १४६ | शुक्रियारण्यकजपो | ६२२ |
| व्यसनं जायते घोरं | २६२ | शुक्लाम्बरधरो नीच | ५९ |
| व्यासिद्धं राजयोग्यं च | ३६४ | शुचि गोतृप्तिकृत्तोयं | ८७ |
| व्रजन्नपि तथात्मानं | १२७ | शुद्धश्चेद्गमयोर्ध्वं मां | ५५५ |
| श | शुद्धयेत वा मिताशित्वात् | १२५ | |
| शकस्यानौहमानस्य | २७० | शुद्धयेरन्स्त्री च शूद्रश्च | ५९ |
| शक्तितो वा यथालाभं | १३७ | शूद्रः प्रत्रजितानां च | ६५० |
पद्यार्धानुक्रमणिका ७२१
श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम् शूद्रप्रेष्यं हीनसख्यं ५०९ | षण्मासाच्छूद्रहाप्येतत् ५६७ शूद्रस्तथान्य एव स्याद् ३८४ | षष्ठयङ्गुलीनां द्वे पाष्ण्योः ४५६ शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा ५३ | षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि ६ शूद्राज्जातस्तु चण्डालः ४१ | षष्ठे बलस्य वर्णस्य ४५४ शूद्रादायोगवं वैश्यात् ४२ | षष्ठेऽष्टमे वा सीमन्तः ६ शूद्रेषु दासगोपाल ७२ | षोडशर्तुनिशाः स्त्रीणां ३१ शूद्रोऽधिकारहीनोऽपि ५५० | षोडशाङ्गुलकं ज्ञेयं २५४ शोणितेन विना दुःखं ३४८ | षोडशाद्यः पणान्दाप्यो ३५० शोध्यस्य मृच्च तोयं च ४२९ | ष्ठीवनासृक्शकृन्मूत्र ६२ शौल्किकैः स्थानपालैर्वा ३२१ | स श्मश्रु चास्यगतं दन्त ८८ | स आत्मा चैव यज्ञश्च ४६६ श्रद्धा च नो मा व्यगमत् १११ | सकटान्नं च नाश्नीयात् ४०३ श्रद्धोपवासः स्वातन्त्र्य ४८७ | सकामास्त्वनुलोमासु ३८० श्राद्धकृत्सत्यवादी च ४९१ | सकायः पावयेत्तज्जः २४ श्राद्धं प्रति रुचिश्चैव ९७ | सकाश्यादात्मनस्तद्वत् ४४९ श्रान्तसंवाहनं रोगी ९४ | स कांस्यपात्रा दातव्या ९२ श्रीकामः शान्तिकामो वा १३४ | स कूटसाक्षिणां पापैः २२९ श्रुताध्ययनसंपन्नः १६४ | सकृत् प्रदीयते कन्या २६ श्रुतार्थस्योत्तरं लेख्यं १७० | सकृत्प्रसिञ्चन्युदकं ३९६ श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः ४ | सखिभार्याकुमारीषु ५०६ श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यक् १८ | स गुर्व्याः क्रियाः कृत्वा १४ श्रुत्वैतद्राजसत्तमोऽपि ६४२ | सगोत्रासु सुतस्त्रीषु ५०६ श्रुत्वैतानृषयो धर्मान् ६४० | सगौरसर्षपैः क्षौमं ८३ श्रेणिनैगमपाखण्डि ३३४ | संग्रामे वा हतो लब्ध्व ५२२ श्रेयसा सुखदुःखाभ्यां ४८२ | संघातं लोहितोदं च ५०० श्रौतं स्मार्तं फलस्नेहैः ४३९ | सचिह्नं ब्राह्मणं कृत्वा ३७० श्रौतस्मार्तक्रियाहेतोः १४१ | सचैलं स्नातमाहूय २४४ श्लेष्माथ्रु बान्धवैर्मुक्तं ४०१ | सजातावुत्तमो दण्डः ३७८ श्लेष्मौजसस्तावदेव ४६२ | सजातीयेष्वयं प्रोक्तः २८८ श्लोकत्रयमपि ह्यस्माद्यः ६४१ | स ज्ञेयस्तं विदित्वेह ४६३ श्लोकाः सूत्राणि भाष्याणि ४८७ | संततिः स्त्रीपशुष्वेव २१४ श्वक्रोष्ट्रगर्दभोल्लूक ६६ | स तद्द्याद्विप्लवाच्च ३६४ श्वित्री वस्त्रं श्वारसं तु ४९५ | स तमादाय सप्तैव २५४ ष | स तान्सर्वानवाप्नोति २२७ षट पञ्चाशच्च जानीत ४६१ | स तु सोमघृतैर्देवान् १६ षट् श्लेष्मा पञ्च पित्तं च ४६२ | सत्कृत्य भिक्षवे भिक्षां ४८ षडङ्गानि तथास्थ्नां च ४५५ | सत्क्रियाऽन्वासनं स्वादु ४९ | सत्यंकारकृतं द्रव्यं २१८
७२२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम् सत्यमस्तेयमक्रोधो ४४८ सब्रह्मचारिकात्मीय २३६ सत्यसंधेन शुचिना १५६ संभूय कुर्वतामर्घं ३५९ सत्यामन्यां सवर्णायां ३८ संभूय वणिजां पण्यं ३५९ सत्यासत्यान्यथास्तोत्रैः ३४० संभोज्यातिथिभृत्यांश्च ४७ सत्येन माऽभिरक्ष त्वं २५६ सभ्याः पृथक्पृथग्दण्ड्याः १६५ सत्रिब्रतिब्रह्मचारि ४२३ सभ्याः सजयिनो दण्ड्याः ३८९ सत्त्वं रजस्तमश्चैव ४८५ सभ्यैः सह नियोक्तव्यो १६५ स दग्धव्य उपेतश्चेत ३९२ समकालमिषुं मुक्तं २५७ स दद्यात्प्रथमं गोभिः ६१३ स मन्त्रिणः प्रकुर्वीत १४१ स दानमानसत्कारैः ३३३ सममेषां विवीतेऽपि ३१४ सं दाप्योऽष्टगुणं दण्डं २३४ समवायी तु पुरुषो ४६८ संदिग्घलेख्यशुद्धिः स्यात् २४० समवायेन वणिजां ३६३ संदिग्धार्थं स्वतन्त्रो यः १७९ समाप्तेऽर्थे ऋणी नाम २३७ संदिष्टस्याप्रदाता च १५३ समाप्य वेदं घुनिशं ६४ सदानमानसत्कारान् १५० समामासतदर्थार्हनामजाति २३६ सद्यो वा कामजैस्त्रिहैः ३७७ समामासतदर्थार्हनामजात्या १६८ संधिं च विग्रहं यानम् १५४ संमितानि दुराचारो ७९ संधिन्यनिर्द्दशा वत्सा ७५ समुद्रपरिवर्त्तं च ३५८ सन्ध्यागर्जितनिर्घात ६४ समूहकार्यं आयातान् ३३३ सन्ध्यामुपास्य शृणुयात् १४७ समूहकार्यप्रहितो ३३३ सन्ध्यां प्राक्प्रातरेवं हि १० समेष्वेवं परस्त्रीषु ३४६ स नानकपरीक्षी तु ३५६ सम्यक्तु दण्डनं राज्ञः १५७ संनिरुध्येन्द्रियग्राम ४४६ सम्यक्प्रयुक्ताः सिध्येयुः १५३ संनिरुध्येन्द्रियग्रामं ४८९ सम्यक्संकल्पजः कामो ४ स नेतुं न्यायतोऽशक्यौ १५६ संयतेन्द्रियता विद्या ४४८ सन्ततिस्तु पशुस्त्रीणां २०१ संयतोपस्करा दक्षा ३५ सपशचेद्गवादः स्यात् १८० संयोगे केचिदिच्छन्ति १५५ सपिण्डो वा सगोत्रो वा २७ संयोज्य वायुना सोमं ४६७ सप्तत्रिंशदनध्यायाः ६७ स राजसो मनुष्येषु ४७२ सप्तमाद्दशमाद्वापि ३९४ सर्गादौ स यथाकाशं ४५० सप्तमे चाष्टमे चैव ४५४ सर्वतः प्रतिगृह्णीयात् ९७ सप्तर्षिनागवीध्यन्तः ४८७ सर्वदानाधिकं यस्मात् १४९ सप्तषष्टिस्तथा लक्षाः ४६१ सर्वधर्ममयं ब्रह्म ९५ सप्ताश्वत्थस्य पत्राणि २५२ सर्वपापहरा ह्येते ६२३ सप्ताहेन तु कृच्छ्रोऽयं ६२६ सर्वभूतहितः शान्तः ४४४ ससैव तु पुरीषस्य ४६२ सर्वमन्नमुपादाय १०९ ससोत्तरं मर्मशतं ४६१ सर्वः साक्षी संग्रहणे २१९ स प्रदाप्यः कृष्टफलं ३१३ सर्वस्य प्रभवो विप्राः ९०
पद्यार्धानुक्रमणिका ७२३ श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम् सर्वस्वहरणं कृत्वा ३३२ | साशीतिपणसाहस्रो १६१ सर्वान्कामानवाप्नोति ७२ | साहसस्तेयपारुष्य १७८ सर्वाश्रयां निजे देहे ४७४ | साहसी दृष्ट दोषश्च २९५ सर्वेष्वर्थविवादेषु १८६ | सिद्धे योगे त्यजन्देहं ४२१ सर्वौषधैः सर्वगन्धैः १२८ | सितासिताः कर्बुरूपा ४८१ सलिलं भस्म मृद्वापि ८४ | सीम्नो विवादे क्षेत्रस्य ३०६ सलिलं शुद्धिरितेषां ४४६ | सुकृतं यत्त्वया किंचित् २२७ सवत्सारोमतुल्यानि ९३ | सुतविन्यस्तपत्नीकः ४३६ सवर्णासु विधौ धर्म्ये ३८ | सुताश्चैषां प्रहर्तव्याः ३०१ सवर्णैभ्यः सवर्णासु ३९ | सुराकामद्यूतकृतं २०५ संविशेत्तूर्यघोषेण १४८ | सुरापी व्याधिता धूर्ता २९ सव्याहृतिकां गायत्रीं १०८ | सुरापोऽन्यतमं पीत्वा ५२७ सश्रीफलैरंशु पट्टं ८२ | सुराप्य आत्मत्यागिन्यो ३९६ स सम्यक्पालितो दद्यात् ३३८ | सुराम्बुघृतगोमूत्र ५२७ संसृष्टिनस्तु संसृष्टी २९८ | सुस्थ इन्दौ सकृत्पुत्रं ३२ संश्राव्य पाययेत्तस्मात् २६१ | सूर्यः सीमो महीपुत्रः १३५ सं संदिग्धमतिः कर्म ४७६ | सूर्यस्य चाप्युपस्थानं १० सहस्रकरपञ्चेत्रः ४६६ | सृजत्यात्मानमात्मा च ४७५ सहस्रशीर्षाजापी तु ६१८ | सृजत्येकोत्तरगुणान् ४५० सहस्रान्नं शतधारं १२९ | सेकादुल्लेखनाल्लेपात् ८४ सहस्रात्मा मया यो पः ४६८ | सेतुभेदकरीं चाप्सु ३७५ स ह्याश्रमेविजिज्ञास्यः ४८८ | सेतुवल्मीकान्तर्नास्थि ३०६ साक्षिणः श्रावयेद्वादि २२६ | सेकानूप नृपा भेत्त ४३४ साक्षिणश्च स्वहस्तेन २३७ | सेह कीर्तिमवाप्नोति प्रे ३८ साक्षिमच्च भवेद्यद्वा २४२ | सेह कीर्तिमवाप्नोति मो ३० साक्षित्वत्पुण्य पापेभ्यो २५३ | सोऽचिराद्विगतश्रीका १५१ साक्षिषूभयतः सत्सु १८० | सोदयं तस्य दाप्योऽसौ ३६१ साधारणस्यापलापी ३५४ | सादृग्स्य तु सोदरः २९८ साधूंत्संमानयेद्राजा १५० | सोऽपि यत्नेन संरक्ष्यो ३३२ साध्यमानो नृपं गच्छन् २०२ | सोमः शौचं ददावासां २८ सा ब्रूते यं स धर्मः स्यात् ५ | सोषरादकगोमूत्रैः ८२ सामन्तकुलिकादीनाम् ३५३ | सौवर्णराजताब्जानाम ८० सामन्ता वा समग्रामा ३०८ | स्तनान्तर भ्रुवोर्मध्य ५७६ समानि तृप्तिं कुर्याच्च १६ | स्त्रीद्रव्यव्रत्तकामो वा ३७६ सामान्यद्रव्यप्रसभ ३५१ | स्त्रीनक्तमन्तरागार १९५ सामान्यार्थसमुत्थाने २७६ | स्त्रीनिषेधे शत दद्यात् ३७८ सरसैकशफान्हंसान् ७५ | स्त्रीपुंसयोस्तु संयोगे ४५१ सावधानस्तदभ्यासात् ४६४ | स्त्रीप्रसूताधिवेत्तव्या २९ सावित्रीपतिता व्रात्या १५ | स्त्रीबालवृद्धकितव २२५ सावित्रीमशुचौ दृष्टे ५७७ | स्त्रीभिर्भर्तृवचः कार्यं ३० ४६ या०
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७२४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम् स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधो ५०९ | स्वाध्यायाग्निसुतत्यागी ५०९ स्त्रयालोकालम्भगविगमः ४७: | स्वाध्यायवान्दानशीलः ४३९ स्थानासनविहारैर्वा ४४० | स्वाध्यायं सततं कुर्यात् ४७ स्थाल्यै सह चतुः षष्टिः ४५६ | स्वाम्यमात्या जनो दुर्गं १५६ स्थैर्य चतुर्थे त्वङ्गानां ४५४ | स्वागिने योऽनिवेद्यैव क्षेत्रे ३१२ स्नपनं तस्य कर्तव्यं १२८ | स्वामिप्राणप्रदो भक्तः ३२९ स्नातस्य सार्षपं तैलं १३० | स्वैरिणी-या पतिं २७ स्नातानपवदेयुस्तान् ४०० | ह स्नात्वा देवान्पितॄंश्चैव ४५ | हंसश्येनकपिक्रव्याजल० ५७२ स्नात्वा पीत्वा क्षुते सुप्ते ८९ | हतानां नृपगोविप्रेरत्नवस्त्रं ४१४ स्नानमब्दैवतैर्मन्त्रैः १० | हत्वा त्र्यहं पिबेत्क्षीरं ५७१ स्नान मौनोपवासैज्या ६२५ | हविष्यान्नेन वै मासं १२१ स्नायान्नदीदवखात ६९ | हस्तेनोघाधभावे वा ६३ स्फीतादपि न संचारि २२ | हस्तौ पायुरुपस्थं च ४५८ स्फ्यशूर्पाऽजिनधान्यानां ८१ | हानिविक्रेतुरस्वामौ ३६२ स्मृत्याचारव्यपेतेन १६६ | हानिश्चेत्केतृदोषेण ३६१ स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु १८३ | हास्य परगृह यानं ३५ स्यादोषधिवृथाच्छेदे ५७४ | हित तस्याचराज्ञप्त्यं ११ स्याद्राज्ञा भृत्यवर्गश्च १४९ | हितोहिता नाम नाड्यस्तासां ४६३ स्व कुटुम्बाविरोधेन ३२२ | हिताहितेषु भावेषु ४७७ स्व लभतान्यविक्रीतं ३१८ | हिरण्यभूमिलाभेभ्यो १५५ स्वकर्म ख्यापयस्तेन ५३४ | हिरण्यं व्यापृतानीतं १४७ स्वच्छन्दविधवागामी ३५४ | हिंसकश्चाविधानेन ४७१ स्वदारानरतश्चैव स्त्रियो ३२ | हिंस्रयन्त्रविधानं च ५०९ स्वदेशपण्यं तु शतं ३६० | हीनकल्पं न कुर्वीत ५६ स्वधर्माच्चालतानाज्ञा विनीय १७८ | हीनजाति परिक्षीण २०४ स्वप्नेऽवगाहतेऽस्वर्थ १२७ | हीनजातौ प्रजायेत ४९४ स्वप्न्याद् भूमौ शुचौ रात्रौ ४४० | हीनाद्रहो हीनमूल्ये ३१ स्वभावाद्विकृतिं गच्छेत् १७८ | हीना न स्याद्विना भर्त्रा ३६ स्वयं कृतं वा यहणं २०६ | हीनेष्वर्धदमो मोह ३४६ स्वरन्ध्रगोप्ताऽऽन्वीक्षिक्यां १२९ | हुतशेषं प्रदद्यात्तु १०६ स्वर्गः स्वप्नश्च भावानां ४८३ | हुत्वाऽग्नीन्सूर्यदैवत्यान् ४५ स्वर्गं ह्यापत्यमोजश्च शौर्य १२४ | हतं प्रणष्टं यो द्रव्यं ३२१ स्वर्यातस्य ह्यपुत्रस्य २०९ | हताधिकारां मलिनां २८ स्ववर्णैर्वा पटे लेख्या १३५ | हृत्कण्ठतालुगाभिस्तु ९ स्वसीम्नि दद्याद् ग्रामस्तु ३७१ | हेमशृङ्गी शफे रौप्यैः ९२ स्वस्तिवाच्य ततः कुर्यात् १९० | हेममात्रमुपादाय रूपं ४.५ स्वस्त्रीयऋत्विग्जामात्र ९९ | हेमहारी तु कुनखी ४९३ स्वहस्तकालसपन्नं १४३ | होतव्या मधुसर्पिभ्यां १३७
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