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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

इस श्लोक के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि इनके गुरु का नाम

( २४ ) इस श्लोक के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि इनके गुरु का नाम उत्तमात्मा अथवा आत्मोत्तम रहा होगा । इन्होंने अपनी मिताक्षरा में विक्रमादित्य देव को अपने आश्रयदाता के रूप में निर्दिष्ट किया है । विक्रमादित्य देव का वर्णन 'विक्रमाङ्कदेव-चरित' महाकाव्य में महाकवि बिल्हणद्वारा विशद रूप में वर्णित है । "विक्रमाङ्क-देव-चरित" के सम्पादक म० म० पं० रामावतार पाण्डेयजीने अपनी भूमिका में चालुक्यवंशीय विक्रमादित्य का समय १०७६ से १११४ ई० के बीच माना है । अतः विज्ञानेश्वर का भी समय वही होना चाहिए । अपरादित्य ( द्वादश शतक-पूर्वार्ध ) या० स्मृ० पर तीसरी व्याख्या अपरार्क है । यह व्याख्या मिताक्षरा से विस्तृत तथा धर्म-शास्त्र के सिद्धान्तों का आकर है । आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थावली, पूना से १९०३-४ में दो भागों में यह प्रकाशित हुई है । इस व्याख्या में पुराणों से बहुत ही उद्धरण किये गए हैं । पुराणों से अतिरिक्त गौतम आदि धर्म-शास्त्रों से भी बहुत प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं। इनका जन्म-समय १११५ से ११३० ई० के मध्य में माना जाता है । इनके पिता का नाम अनन्त देव तथा पितामह का नागार्जुन था । ये जीमूतवाहन के वंश में उत्पन्न हुए हैं, जैसा या० स्मृ० की व्याख्या के अन्त में इनके लेख से स्पष्ट होता है—'इति श्री- विद्याधरवंशप्रभवश्रीशिलाहार नरेन्द्र-जीमूतवाहनान्वयप्रसूत श्रीमदपरादित्य देव............' । एक दूसरे अपरादित्य देव भी हुए हैं जिनका जन्म समय ११८४-११८७ है परन्तु डा० काणे के कथनानुसार या० स्मृ० के व्याख्याता प्रथम अपरादित्य देव ही है। कहीं-कहीं इनका नाम केवल आदित्यदेव भी पाया जाता है। भासर्वज्ञ के न्यायसार पर भी इनकी एक बृहद्व्याख्या—न्यायमुक्ता- वली है, जो १९६१ ई० में मद्रास से प्रकाशित हुई है । इनके विषय में विशेष विवरण के लिए डा० काणे का History of Dharmaśāstra ( PP. 328-334 ) देखना चाहिए । शूलपाणि ( १३७५-१४६० ई० ) शूलपाणि बङ्गाल के धर्म-शास्त्रीय-निबन्ध-कारों में प्रमुख माने जाते हैं । इन्होंने या० स्मृति की टीका लिखी । इस टीका का नाम 'दीप-कलिका' है । यह व्याख्या अत्यन्त-संक्षिप्त होने पर भी प्रामाणिक है । यही कारण है कि वीर- मित्रोदय तथा अष्टाविंशति-तत्त्व आदि प्रामाणिक निबन्धों में इनके मत का उल्लेख है । ये साहुदियाल वंश के बङ्गीय ब्राह्मण थे । प्रो० काणे के निर्देशानुसार, बल्लालसेन के राज्य-काल से राढीय ब्राह्मणवर्ग के निम्न-तर वर्गीय ब्राह्मण ही साहुदियाल कहलाते हैं । रुद्रधर के द्वारा 'गौड़ीय' शब्द से निर्दिष्ट होने के कारण इनका बङ्गीयत्व माना जाता है। इनका समय प्रो० काणे तथा जगन्नाथ रघुनाथ घारपुरे के अनुसार १४ शतक के अन्त तथा १५ शतक के मध्य के बीच माना जाता है ।

( २५ ) मित्र-मिश्र ( १८०० ई० ) मित्र-मिश्र के नाम से प्रसिद्ध 'वीरमित्रोदय' व्याख्या विशाल-काय तथा प्रमेय बहुल है। मित्र मिश्र का समय १८वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जा सकता है, क्योंकि आनन्द चम्पू में इन्होंने इसके निर्माण-काल का उल्लेख किया है— 'मीनारोहिणि-रोहिणी-सहचरे कृत्वाऽन्तिके रेवतीं याते चण्ड-मरीचि-मालिनि तुलां वारे च वाचस्पतेः। शाके खाङ्गतर्तुभू ( १६९० ) परिमिते ह्यानन्दकन्दाभिधां चम्पूमपूरितवान् सित-स्मर-तिथौ श्रीमिश्र-मिश्रः कृती ॥' अतः इनका समय यदि १८ शतक का मध्य-भाग माना जाय तो कुछ अनुपपत्ति नहीं दीखती है। इनकी व्याख्या में अनेक स्मृति तथा पुराणों का उद्धरण तथा विवेचन मिलता है, जिनसे इनके विद्या-वैभव का पता चलता है। परन्तु यह विषय ध्यान देने योग्य है कि यह व्याख्या इनकी अपनी लिखी हुई नहीं है अपितु किसी सदानन्द नाम के विद्वान् ने मित्र मिश्र के अनुरोध से इसका संग्रथन किया था और मित्र मिश्र के नाम से ही इसे प्रख्यापित किया। इसके समर्थन में वी० मि० (या० स्मृ० व्याख्या) में उल्लिखित निम्ननिर्दिष्ट श्लोक है— उत्तंसस्तीरभुक्तेः अखिल-बुध-गुरुः श्रीसदानन्दधीमान् श्रीभाजो मित्रमिश्राज्जगदुपकृतये बिभ्रदादेशदीपम्। ज्ञानानान्द्यैन्य-दोषपहमकलि-भयं याज्ञवल्क्योक्तिकोशात् दृष्ट्वा स्मृत्यर्थसारं समचिनुत यशो धर्म-लक्ष्मी-विहारम् ॥ ( या० स्मृ० व्या० आ० अ० मङ्गल श्लो० १६ ) जो कुछ भी हो, वीर-मित्रोदय व्याख्या के महत्त्व का अपलाप तो कथमपि नहीं किया जा सकता। धर्म-शास्त्र-कानन में परिभ्रमण करने की इच्छा रखने वाले सज्जन के लिए तो यह व्याख्या विशेषतः उपयोगी है। प्रस्तुत-संस्करण प्रस्तुत संस्करण में आधुनिक युग के नियोग को ध्यान में रखकर मूल स्मृति का हिन्दी-अनुवाद समन्वित कर दिया गया है, जिससे संस्कृत के प्रगाढ़ ज्ञान से रहित जिज्ञासुजन का भी अभिलाष पूर्ण हो सके। साथ ही विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा, जिसका महत्त्व प्राच्य तथा पाश्चात्त्य-दोनों ही दृष्टियों से अनुपम है, का समावेश कर दिया गया है जिससे प्राचीन तथा नवीन का सह-स्रोत प्रवाहित होता रहे।

( २६ ) आशा है विद्वज्जन इस नवीन संस्करण का यथोचित स्वागत कर चौखम्बा प्रकाशन के अध्यक्ष को प्रोत्साहित करेंगे जिससे ये इसी तरह संस्कृत तथा संस्कृतज्ञ की सेवा में सोत्साह तत्पर रह सकें। मति-मान्द्यादनुचिताः सम्भवन्ति पदे पदे ॥ तथापि ते नहि पदं लभन्ते महतां हृदि ॥ १ ॥ तुच्छोऽप्यवस्थातुमर्हः प्रकाशः सवितुर्मुखे ॥ अन्धं तमो महदपि न कदाचिदपीत्यलम् ॥ २ ॥ —श्री नारायणमिश्रः

भूमिका स्मृति साहित्य भारतीय धर्मशास्त्र में वैदिक धर्मसूत्रों के उपरान्त स्मृतियाँ आती हैं। स्मृति शब्द का प्रयोग श्रुति से विपर्यास प्रदर्शित करने के लिए किया गया है। श्रुति तथा स्मृति द्वारा विहित आचार को धर्म बताया गया है (श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः, वसिष्ठधर्मसूत्र, १. ४. ६) श्रुति से वेद का अर्थ लिया जाता है और स्मृति शब्द का प्रयोग श्रुति अर्थात् ईश्वरप्रकाशित एवं ऋषिदृष्ट वाङ्मय से भिन्न साहित्य के लिए हुआ है। उपयुक्त अर्थ में धर्मसूत्र भी स्मृति ग्रन्थ हैं। ("श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः", मनु० २. १०)। श्रुति श्रवण, मनन और अध्यापन का विषय है; स्मृति स्मरण का विषय है और परम्परागत धार्मिक साहित्य है। संकीर्ण अर्थ में स्मृति और धर्मशास्त्र में कोई भेद नहीं है। वैदिक साहित्य में हम सूत्रों के अन्तर्गत श्रौतसूत्र या श्रुति पर आधारित सूत्रों का विभाजन पाते हैं। "श्रौतसूत्रों के साथ ही साथ हम दूसरे प्रकार के कल्पसूत्र भी पाते हैं, जिन्हें गृह्यसूत्र कहा गया है। ये गृहस्थजीवन की उन क्रियाओं का वर्णन करते हैं जो जन्म, जन्म के पूर्व, विवाह, मृत्यु और मृत्यु के बाद के अवसरों पर की जाती हैं। इन रचनाओं की उत्पत्ति उनके नाम से ही पर्याप्त रूप में प्रकट हो जाती है, कारण गृह्यसूत्र के अतिरिक्त उनका नाम स्मार्त- सूत्र या स्मृति पर आधारित सूत्र भी है। स्मृति का अर्थ वह है जो याद किया जाने योग्य हो। इस प्रकार हम स्मृति का श्रुति अर्थात् श्रवण के विषय से स्पष्ट रूप से भेद कर सकते हैं, कारण, स्मृति सीधे स्मरण शक्ति पर छाप डालती है और इसके लिए किसी विशेष शिक्षा या साधन की आवश्यकता नहीं पड़ती।"१ इसी विद्वान् ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय लोग विधि का व्यवहार "स्मृति द्वारा ही" "अथो नोमिस" किया करते थे।२ संकुचित अर्थ में स्मृति से धर्मशास्त्र की उन रचनाओं का तात्पर्य है जो प्रायः श्लोकों में हैं और उन्हीं विषयों का विवेचन करती हैं जिनका प्रतिपादन धर्मसूत्रों में किया गया है। इन स्मृतियों में अग्रणी हैं-मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ। मनुस्मृति सबसे प्राचीन है और ईसा से कई सौ वर्ष पहले रची गई थी। अन्य स्मृतियाँ ४०० से १००० ई० के बीच की हैं। स्मृतिकारों की संख्या विस्तृत है। १. भारतीयसाहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० ११। २. वही, पृ० १४

( २८ ) स्मृतियाँ प्रायः पद्य में हैं और भाषा की दृष्टि से स्मृतियाँ धर्मसूत्रों के बाद की रचनाएँ हैं। स्मृतियों की भाषा लौकिक है। विषयवस्तु की दृष्टि से स्मृतियाँ धर्मसूत्रों से अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं। मुख्य स्मृतिकार १८ हैं—मनु, बृहस्पति, दक्ष, गौतम, यम, अंगिरा, योगीश्वर, प्रचेता, शातातप, पराशर, संवर्त, उशनस्, शंख, लिखित, अत्रि, विष्णु, आपस्तम्ब, हारीत । इनके अतिरिक्त उपस्मृतियों के भी लेखकों के नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं— नारदः पुलहो गार्ग्यः पुलस्त्यः शौनकः क्रतुः । बौधायनो जातुकर्ण्यो विश्वामित्रः पितामहः ॥ जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षिकश्यपौ । व्यासः सनत्कुमारश्च शान्तनुर्जनकस्तथा ॥ व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातुकण्यः कपिञ्जलः । बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च । पैठीनसिर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः ॥ वीरमित्रोदय, परिभाषा प्रकरण के अनुसार स्मृतिकारों की संख्या २१ है और वे हैं— वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः । विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥ जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥ पारस्करश्च्यवङ्गो वैजवापस्तथैव च । इत्येते स्मृतिकर्तार एकविंशतिरीरिताः ॥ स्वयं स्मृतिकारों ने दूसरे स्मृतिकारों का उल्लेख किया है और उनकी संख्या का अपने ज्ञान के अनुसार निर्देश किया है। मनु ने ६ के, याज्ञवल्क्य ने २० के, पराशर ने १९ के नाम गिनायें हैं। स्मृतियों की संख्या के विषय में भिन्न प्रकार की सूचनाएँ मिलती हैं। जैसा कि प्रो० काणे ने निष्कर्ष निकाला है—'यदि बाद में आनेवाले निबन्धों, यथा निर्णयसिन्धु, नीलकण्ठ, एवं वीरमित्रोदय की मयूख सूचियों को देखा जाय तो स्मृतियों की संख्या १०० हो जायगी।' यहाँ उल्लेखनीय है कि जो स्मृतियाँ उपलब्ध हैं उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है। अनेक स्मृतियों की केवल व्याख्याएँ उपलब्ध हैं। साथ ही स्वरूप तथा शैली की दृष्टि से भी ये स्मृतियाँ भिन्न हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति स्मृति साहित्य में मनुस्मृति के बाद दूसरी महत्वपूर्ण स्मृति है याज्ञवल्क्य- स्मृति। कुछ दृष्टि से तो याज्ञवल्क्यस्मृति का मनुस्मृति की अपेक्षा भी अधिक १. धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग १, अनु० काश्यप, पृ० ४१ ।

( २६ ) व्यावहारिक महत्त्व है। याज्ञवल्क्यस्मृति मनुस्मृति के बाद की रचना है यह बात विषयवस्तु के कारण तो स्पष्ट है ही और भी अनेक विशिष्ट तथ्यों के कारण भी स्पष्ट है। इसमें विषयवस्तु का विधिवत् विभाजन किया गया है। गणेश और ग्रहों की पूजा भी इस स्मृति की विशेषता है। दान से संबद्ध कर्मों का ताम्रपत्र पर लेख और मठों के संगठन का वर्णन भी इस स्मृति में पाया जाता है, ये बातें मनु में नहीं उपलब्ध होतीं। इसमें बौद्धमत का खण्डन किया गया है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति की तुलनात्मक विशेषताओं के विषय में वेबर ने निम्न- लिखित विचार व्यक्त किये हैं: 'जो विषय दोनों में पाये जाते हैं उनमें भी हम याज्ञवल्क्य में अधिक सूक्ष्मता और स्पष्टता पाते हैं, और विशिष्ट उदाहरणों में, जहां दोनों में ठोस अन्तर दिखाई पड़ता है, याज्ञवल्क्य का दृष्टिकोण स्पष्टतः बाद के समय का है।' १ मनु ने व्यवहार के जितने प्रमाण गिनाये हैं उनकी अपेक्षा याज्ञवल्क्यस्मृति में लिखित ताम्रपत्र अधिक गिनाया गया है। मनु ने दिव्यों के अन्तर्गत अग्नि और जल के दो दिव्यों का वर्णन किया है जब कि याज्ञवल्क्य ने पांच दिव्यों का वर्णन किया है। दार्शनिक विषयों के विवेचन में याज्ञवल्क्य और मनुस्मृति में समानता है, किन्तु भ्रूणविज्ञान याज्ञवल्क्यस्मृति में नवीन विषय है, जिसे कीथ ने किसी आयुर्वेदिक ग्रन्थ से लिया हुआ माना है। याज्ञवल्क्यस्मृति मनुस्मृति की अपेक्षा छोटी है। मनुस्मृति में २७०० श्लोक हैं, जबकि याज्ञवल्क्यस्मृति में लगभग एक हजार श्लोक हैं। शैली की दृष्टि से याज्ञवल्क्यस्मृति संक्षिप्त है और प्रवाहमय है। प्रो० काणे ने यह संभावना व्यक्त की है कि याज्ञवल्क्यस्मृति के रचयिता के सामने रचना करते समय मनुस्मृति रही होगी, कारण अनेक स्थलों पर दोनों स्मृतियों में समान शब्द पाये जाते हैं। किन्तु जैसा कि ऊपर निर्देश किया जा चुका है याज्ञवल्क्य एक मौलिक विचारक और धर्मशास्त्रकार हैं। वे पहले के आचार्यों का पिष्टपेषण मात्र नहीं करते, अपितु देशकाल के परिवर्तनों के साथ परिवर्तित मान्यताओं को प्रस्थापित करते हैं और अपने पूर्ववर्ती मनु से कई स्थलों पर सहमत नहीं होते। भाषा की दृष्टि से याज्ञवल्क्यस्मृति पाणिनि के नियमों का पालन करती है। एकाध शब्द अपवाद भी मिल जाते हैं। पूर्ववर्ती साहित्य से सम्बन्ध— याज्ञवल्क्यस्मृति में वेद, वेदांगों, आरण्यकों, उपनिषदों, पुराणों, इतिहास, नाराशंसी के साथ-साथ स्वयं याज्ञवल्क्यप्रणीत बृहदारण्यक और योगशास्त्र का उल्लेख है। आरम्भ में उन्नीस धर्मशास्त्रकारों के नाम गिनाये गये हैं। पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ १. भारतीय साहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० २७८ ।

( ३० ) मन्वत्रिविष्णुहारीत याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः । यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥ पराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ । शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः ॥ १. ३-५॥ आन्वीक्षिकी अर्थात् दर्शनशास्त्र एवं दण्डनीति का उल्लेख भी हुआ है— श्वरन्ध्रगोप्ताऽऽन्वीक्षिक्यां दण्डनीत्यां तथैव च। विनीतस्त्वथ वार्तायां त्रय्यां चैव नराधिपः ॥ १. ३११॥ सूत्रों, स्मृतियों, धर्मशास्त्रों का नामतः उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु सामा- न्यतः इनकी चर्चा याज्ञवल्क्यस्मृति में मिलती है। याज्ञवल्क्यस्मृति में शुक्लयजुर्वेद की वाजसनेयी-संहिता के अनेक मन्त्रों का उल्लेख है और विवेचित विषयों की दृष्टि से पारस्करगृह्यसूत्र से भी इसका संबन्ध है। पो० काणे के अनुसार "स्मृति के कुछ अंश बृहदारण्यकोपनिषद् के केवल अन्वय मात्र हैं।" इस प्रकार याज्ञवल्क्यस्मृति का संबन्ध याज्ञवल्क्य के नाम से ख्यात रचनाओं के साथ तथा शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा के साथ भी दिखाई पड़ता है। गरुडपुराण और अग्निपुराण में याज्ञवल्क्यस्मृति के समान बहुत सी बातें उपलब्ध होती हैं। शंखलिखितधर्मसूत्र में भी याज्ञवल्क्य का उल्लेख है। विद्वानों का विचार है कि याज्ञवल्क्यस्मृति का मुख्य स्मृतिभाग ७०० ई० से अपरिवर्तित चला आ रहा है।¹ याज्ञवल्क्यस्मृति का समय— याज्ञवल्क्यस्मृति के समय के विषय में वेबेर का मत है : "इस रचना के लिए प्राचीनतम सीमा दूसरी शताब्दी ई० के आसपास की मानी जा सकती है, कारण, इसमें मुद्रा के अर्थ में नानक शब्द का प्रयोग है और जैसा कि विल्सन ने अनुमान किया है यह शब्द कनेर्कि के सिक्कों से लिया गया है, जिसने ४० ई० में शासन किया था। दूसरी ओर इस समय की निचली सीमा छठीं या सातवीं शताब्दी रखी जा सकती है, कारण, विल्सन के अनुसार इस स्मृति के अंशों को भारत के अनेक भागों में शिलालेखों में उद्धृत किया गया है।² याकोबी ने याज्ञवल्क्यस्मृति का समय बारह ग्रहों की संख्या के आधार पर चतुर्थ शताब्दी ई० के बाद माना है।³ प्रो० काणे ने याज्ञवल्क्यस्मृति के समय के विषय में जो निष्कर्ष निकाले हैं उनके अनुसार इस स्मृति के समय की निचली सीमा नवीं शताब्दी के बाद की नहीं हो सकती। कारण— २. काणे, वही, पृ० ५१ । १. भारतीय साहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० २७८ । ३. वही, पृ० २७८, टिप्पणी २ ।

१ टीकाकार विश्वरूप नवीं शताब्दी के हैं। २. विश्वरूप ने अपने पहले के कई भाष्यकारों का उल्लेख किया है, जिन्होंने याज्ञवल्क्यस्मृति पर टीकायें लिखी हैं। ३. शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र के भाष्य में याज्ञवल्क्यस्मृति ३. २२६ का निर्देश किया है। अतः 'याज्ञवल्क्यस्मृति को हम ई० पू० पहली शताब्दी तथा ईसा के बाद की तीसरी शताब्दी के बीच कहीं रख सकते हैं।'१ वर्णित विषय— याज्ञवल्क्यस्मृति का आरम्भ मुनियों के प्रश्न से होता है। योगीश्वर याज्ञवल्क्य मिथिला को सुशोभित कर रहे थे। मुनियों ने उनकी पूजा की और कहा कि आप वर्णों, आश्रमों और दूसरे (अनुलोम, प्रतिलोम, संकर जातियों) का धर्म हमें पूरी तरह से समझाइये। योगीश्वरं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मुनयोऽब्रुवन् । वर्णाश्रमेतराणां नो ब्रूहि धर्मानशेषतः ॥ १।१॥ और तब याज्ञवल्क्य उस देश में किये जाने वाले धर्म का प्रतिपादन करते हैं, जिस देश में काले मृग स्वच्छन्द विचरण करते हैं। यस्मिन् देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्निबोधत ॥ इस उपक्रम के बाद याज्ञवल्क्यस्मृति आरम्भ होती है, और बीच-बीच में पृच्छालु मुनिगण शंका करते हैं जिनका समाधान याज्ञवल्क्य करते चलते हैं। यह स्मृति लगभग समान विस्तार के तीन अध्यायों में विभक्त है। संक्षेप में इस स्मृति में वर्णित विषयों को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है— आचाराध्याय—चौदह विद्याएं, एवं धर्म के उपादान। संस्कार-जन्म से विवाह तक। उपनयन और उसका समय। ब्रह्मचारी के कर्त्तव्य एवं निषिद्ध कर्म। विवाह, विवाह की योग्यता, सपिण्ड संबन्ध का नियम। अन्तर्जातीय विवाह, आठ प्रकार के विवाह। क्षेत्रज पुत्र और पुनर्विवाह। गृहस्थ के कर्त्तव्य। पंच महायज्ञ, अतिथि सत्कार, मधुपर्क। चारों वर्णों के कर्त्तव्य। आचार के दस सिद्धान्त, गृहस्थ की जीवनवृत्ति। स्नातक के कर्त्तव्य। अनध्याय, भक्ष्याभक्ष्य का नियम, पवित्रीकरण के नियम। दान के नियम, पात्र एवं वस्तुएँ। श्राद्ध के नियम, इसका समय, श्राद्ध में बुलाने जाने योग्य ब्राह्मण, श्राद्ध की विधि एवं दक्षिणा। ग्रह शान्ति। राजधर्म और दण्ड। व्यवहाराध्याय—न्याय करने वाले व्यक्ति, न्याय करने वाली परिषद् के सदस्य। जमानत, ब्याज की दर, ऋण, बन्धक के प्रकार। साक्षी की पात्रता, शपथ, लेखप्रमाण। दिव्य। धन का विभाजन, स्त्री का भाग, पुत्रों के प्रकार और १. काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, अनु० आचार्य काश्यप, पृ० ५३।

( ३२ ) उनमें विभाजन के नियम, स्त्रीधन, स्वामी और भृत्य के विवाद, दास्य के नियम । मजदूरी । जुआ, मानहानि और व्यभिचार आदि जैसे अपराधों का दण्ड । प्रायश्चित्ताध्याय-अशौच के नियम, मृत के संस्कार, तर्पण । जन्मविषयक अपवित्रता । विपत्ति में आचार और जीविका निर्वाह । वानप्रस्थ के नियम, यति के नियम । गर्भ में शिशु का विचार और मानव शरीर रचना, आत्मा का जन्म क्यों ? योगी की अमरता का रहस्य । आत्मज्ञान के साधन । रोगव्याधियाँ, नरक, महापातक, उपपातक और इनके प्रायश्चित्त । दस 'यम एवं नियम । सान्तपन, महासान्तपन, तप्तकृच्छू, पराक, चान्द्रायण, एवं अन्य व्रत । टीकाकार और संस्करण— याज्ञवल्क्यस्मृति पर मुख्य चार टीकाकारों की टीकाएं हैं, वे हैं : विश्वरूप, विज्ञानेश्वर, अपरार्क और शूलपाणि । विश्वरूप की बालकीडा नाम की टीका गणपतिशास्त्री ने त्रिवेन्द्रम संस्कृत ग्रन्थमाला में प्रकाशित की है । मिताक्षरा में इस टीका का उल्लेख है । विश्वरूप का समय ७५० ई० तथा १००० ई० के बीच का है । विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है । इसके विषय में म० म० काणे ने ठीक ही कहा है : "यह ग्रन्थ उतना ही प्रभाव- शाली माना जाता रहा है जितना व्याकरण में पतंजलि का महाभाष्य एवं साहित्यशास्त्र में मम्मट का काव्यप्रकाश । विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में अपने पूर्व के लगभग दो सहस्र वर्षों से चले आये हुए मतों का सारतत्त्व ग्रहण किया और ऐसा रूप खड़ा किया जिसके प्रकाश में अन्य मतों और सिद्धान्तों का विकास हुआ ।'१ इस टीका की रचना का समय १०७०-११०० ई० का माना जाता है । याज्ञवल्क्यस्मृति पर तीसरी प्रमुख टीका अपरादित्य की है । यह आनन्दाश्रम प्रेस पूना से प्रकाशित है और अपरार्क-धर्मशास्त्र-निबन्ध नाम से अभिहित है । मिताक्षरा की अपेक्षा यह बड़ी है और इसमें अन्य धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों से बहुत अधिक उद्धरण लिए गये हैं और पुराणों के अंश भी उद्धृत किये गये हैं । अपरार्क की तिथि ११००-१२०० ई० के बीच होने का अनुमान किया जाता है । बंगाल के धर्मशास्त्रकार शूलपाणि की टीका है दीपकलिका, जो छोटे आकार की है । इसमें मिताक्षरा और विश्वरूप के मतों का उल्लेख है । शूलपाणि का समय चौदहवीं शताब्दी के अन्तिम पाद से आरम्भ कर पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के बीच माना जा सकता है । याज्ञवल्क्यस्मृति के अनेक संस्करण हुए हैं । प्रमुख हैं : निर्णयसागर संस्करण, त्रिवेन्द्रम संस्करण और आनन्दाश्रम संस्करण । इन संस्करणों में श्लोकों की संख्या में कुछ भिन्नता है । याज्ञवल्क्य याज्ञवल्क्यस्मृति का संबन्ध याज्ञवल्क्य ऋषि से है । वैदिक ऋषियों की परम्परा में याज्ञवल्क्य का महत्वपूर्ण स्थान है, जिसके अनुसार याज्ञवल्क्य १. काणे, वही, पृ० ७२ ।

( ३३ ) मुख्यतः शुक्लयजुर्वेद और शतपथब्राह्मण के द्रष्टा हैं। शतपथब्राह्मण में भी याज्ञवल्क्य के विषय में अनेक आख्यान आये हैं और इनमें याज्ञवल्क्य के विचारों को मान्यता दी गयी है। ११।३।१।२ में वे जनक को अग्निहोत्र यज्ञ समझाते हैं और स्वयं जनक से गूढ़ यज्ञिय क्रिया का ज्ञान प्राप्त करते हैं। ११।६।३ में. याज्ञवल्क्य और शाकल्य के शास्त्रार्थविवाद का वर्णन है, जिसमें देवताओं की संख्या के विषय में विचार किया गया है और अन्त में याज्ञवल्क्य के एकेश्वर- वाद के सिद्धान्त को स्वीकारा गया है। परन्तु याज्ञवल्क्य अपने प्रतिद्वन्द्वी शाकल्य को उनकी हठधर्मिता के कारण शीघ्र मृत्यु प्राप्त करने का शाप देते हैं। याज्ञवल्क्य को अनेक यज्ञों का उद्घोषक माना गया है। शतपथब्राह्मण के अतिरिक्त याज्ञवल्क्य का नाम किसी अन्य वैदिक ग्रन्थ में नहीं आता। शांखायन आरण्यक में दो स्थलों पर याज्ञवल्क्य का उल्लेख है किन्तु उन अंशों को विद्वानों ने शतपथब्राह्मण से उद्धृत माना है।१ याज्ञवल्क्य शुक्ल यजुर्वेद, शतपथब्राह्मण तथा बृहदारण्यकोपनिषद् के प्रणेता या उद्घोषक थे इस विषय में प्रायः सन्देह व्यक्त किया गया है। शुक्ल यजुर्वेद की संहिता वाजसनेयी-संहिता कहलाती है और यह नाम याज्ञवल्क्य की उपाधि वाजसनेय के आधार पर पड़ा है। यदि याज्ञवल्क्य इस संहिता के उद्घोषक न भी हों तो भी उन्हें संकलनकर्ता मानने में कोई आपत्ति नहीं। इसी प्रकार शतपथब्राह्मण का भी प्रचुर अंश सीधे याज्ञवल्क्यरचित है और शेष अंश को आधिकारिक रूप देने के लिए उनका नाम संबद्ध कर दिया गया है, ऐसी संभावना की जाती है। अतः जैसा कि जे० डाउसन ने कहा है : "यह मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि शतपथब्राह्मण की रचना उनके अधीक्षण में या उनके शिष्यों द्वारा की गयी थी।"२ शतपथब्राह्मण से संबद्ध बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य एक यज्ञक्रिया के आचार्य की अपेक्षा दार्शनिक के रूप में दिखायी पड़ते हैं। इस उपनिषद् में याज्ञवल्कीय काण्ड नाम का अंश विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसमें याज्ञवल्क्य की प्रशस्ति है और उनके आत्मविषयक दार्शनिक विचारों का संग्रह है। इस उपनिषद् में याज्ञवल्क्य का जिस प्रकार उल्लेख किया गया है उससे स्पष्ट है कि यह अकेले याज्ञवल्क्य की रचना न होकर उनके शिष्यों और अनुयायियों द्वारा भी रचित है। विण्टरनित्स का इस विषय में यह मत है कि स्वयं बृहदारण्यकोपनिषद् में अन्य आचार्यों का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त याज्ञिक और तत्त्वचिन्तनविषयक इतने विभिन्न मतों को याज्ञवल्क्य से संबद्ध किया गया है कि उन्हें इन सबका उद्घोषक स्वीकारना कठिन प्रतीत होता है।३

१. मैकडानल एवं कीथ, वैदिक इण्डेक्स, भाग २, पृ० १८९ । २. ए क्लासिकल डिक्शनरी आफ हिन्दू माइथोलोजी, पृ० ३७२ । ३. हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर, भाग १, पृ० २४६, टिप्पणी ।

( ३४ ) बृहदारण्यकोपनिषद् ६।५।३ में उन्होंने मैत्रेयी को आत्मा के विषय में तथा अमरता के बारे में जो व्याख्यान दिये हैं वे भारतीय दर्शन में उत्कृष्ट कोटि के चिन्तन के परिचायक हैं। इस उपनिषद् के तीसरे और चौथे अध्यायों के प्रायः सभी ब्राह्मणों में याज्ञवल्क्य किसी न किसी आचार्य से दार्शनिक विवेचन करते हुए दिखाई पड़ते हैं, जैसे जनक, अश्वल, आर्तभाग, भुज्यु, कोहल, गार्गी, आरुणि या शाकल्य से । महाभारत में याज्ञवल्क्य युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर उपस्थित दिखाये गये हैं, यह कुछ विचित्र प्रतीत होता है। याज्ञवल्क्य-रचित एक योगशास्त्र का भी उल्लेख कूर्मपुराण १।२५-२७ में मिलता है और विण्टरनिट्स का विचार है कि यह याज्ञवल्क्यगीता का निर्देश करता है जिसमें योग की व्याख्या की गयी है ।१ प्रश्न उठता है : क्या वैदिक परम्परा के ऋषि याज्ञवल्क्य ही प्रस्तुत याज्ञ- वल्क्यस्मृति के प्रणेता हैं ? प्रश्न सकारण है। वैदिक ग्रन्थों की भाषाशैली से स्मृति की भाषा और शैली नितान्त भिन्न है और इनमें समय की दृष्टि से सामीप्य नहीं है, और शायद इसी तथ्य को दृष्टिगत करके मिताक्षरा टीका के लेखक विज्ञानेश्वर ने स्पष्ट संकेत किया है कि याज्ञवल्क्य के किसी शिष्य ने धर्मशास्त्र को संक्षिप्त करके वर्तमान रूप प्रदान किया है। परन्तु स्वयं याज्ञवल्क्य- स्मृति ( ३. ११० ) में इस बात की घोषणा की गई है कि इस स्मृति के प्रणेता आरण्यक अर्थात् बृहदारण्यकोपनिषद् के रचयिता हैं और उन्हें सूर्य ने ज्ञान प्रदान किया, तथा वे योगी थे- ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान् । योगशास्त्रं च मत्प्रोक्तं ज्ञेयं योगमभीप्सता ॥ याज्ञवल्क्य के साथ इस स्मृति का संबन्ध संभवतः इसे महत्ता प्रदान करने के लिए जोड़ा गया है । किन्तु एक बात निर्विवाद है और वह यह कि शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा से इस स्मृति का संबन्ध है, इस तथ्य पर यहाँ हमने याज्ञवल्क्यस्मृति का परिचय देते समय प्रकाश डाला है । बृहदारण्यकोपनिषद् ६।३।१५ में याज्ञवल्क्य को उद्दालक आरुणि का शिष्य बताया गया है और राजा जनक के साथ इनके संबन्धों के कारण इन्हें विदेह का निवासी कहते हैं, किन्तु मैकडानल और कीथ के मत में यह सन्देहास्पद है- ‘Despite the legend of Janaka’s patronage of him, his association with Uddalaka, the Ku'ru Pancala renders this doubtful.’ -वैदिक इण्डेक्स, भाग २, पृ० १८९ । शतपथब्राह्मण के अन्त में ( १४।९।४।२९ आदि ) आचार्यों की जो सूची दी गयी है उसमें याज्ञवल्क्य ४५ वें स्थान पर आते हैं और उसमें भी उनके गुरु का १. विण्टरनिट्स, वही, भाग १, पृ० ५७४, टिप्पणी ।

( ३५ ) नाम उद्दालक आरुणि है। जहाँ तक याज्ञवल्क्य के समय का प्रश्न है वे परवर्ती संहिताओं और ब्राह्मणों के काल के ऋषि हैं। किसी भी स्थिति में वे पाणिनि के पहले के हैं। याज्ञवल्क्यविषयक ब्राह्मणीय आख्यानों का विवेचन प्रस्तुत लेखक ने अपने शोधग्रन्थ ‘द लेजेण्ड्स इन द शतपथब्राह्मण’ में किया है । योगियाज्ञवल्क्य एवं बृहद् याज्ञवल्क्य नाम की याज्ञवल्क्य की रचनाओं के विषय में डा० काणे ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में डेकन कालेज संग्रहालय की पाण्डुलिपियों का हवाला दिया है, जिनमें प्रथम में १२ अध्याय और ४९५ श्लोक हैं तथा दूसरे में १२ अध्याय और ९३० श्लोक हैं। वृद्धयाज्ञवल्क्य नाम की स्मृति का भी उल्लेख मिलता है। इससे विश्वरूप ने अपनी टीका में उद्धरण लिए हैं। मिताक्षरा में भी इसका उल्लेख आया है। —उमेशचन्द्र पाण्डेय ४ प्र० या०

( १ ) उपोद्घातप्रकरण

विषयानुक्रम ( टीका में विवेचित महत्त्वपूर्ण विषयों का भी निर्देश इस विषयानुक्रम में किया गया है ) १. आचाराध्याय ( १ ) उपोद्घातप्रकरण मुनियों की जिज्ञासा - १ छः प्रकार का स्मार्त धर्म - २ धर्म के चौदह स्थान - ३ धर्मशास्त्रकार ऋषि - ” धर्म के कारक हेतु - ४ धर्म के ज्ञापक हेतु - ” देश आदि कारक हेतुओं का अपवाद - ५ हेतुविषयक सन्देह का निर्णय - ” ( २ ) ब्रह्मचारिप्रकरण वर्ण - ५ गर्भाधान आदि संस्कार - ६ संस्कार करने का फल - ७ स्त्रियों के संस्कार - ” उपनयन का समय - ” गुरु के धर्म - ” शौच के नियम - ८ प्राजापत्य आदि तीर्थ - ९ आचमन की विधि - ” प्राणायाम - १० सावित्रीजप की विधि - ” अग्निकार्य - ११ अभिवादन की विधि - ” अध्यापन के योग्य व्यक्ति - ” दण्ड इत्यादि का धारण - १२ भिक्षाचरण की विधि - ” भोजन का नियम - १३ ब्रह्मचारी के लिए निषिद्ध कर्म - १३ गुरु, आचार्य आदि के लक्षण - १४ उपाध्याय, ऋत्विक् के लक्षण - ” ब्रह्मचर्य की अवधि - ” उपनयन की समयसीमा - १५ द्विजत्व का कारण - ” वेदाध्ययन का फल - १६ काम्यब्रह्मयज्ञाध्ययन का फल - ” पञ्चमहायज्ञ का फल - १७ नैष्ठिक ब्रह्मचारी के धर्म - १८ ( ३ ) विवाहप्रकरण गुरुदक्षिणा के पूर्व का स्नान - १८ कन्या के लक्षण - २० सपिण्ड का विचार - २१ कन्यावरण का नियम - २२ कन्यादान में वर के नियम - ” द्विजातियों के लिए शूद्रा से विवाह का निषेध - २३ अनुलोमविवाह - ” आठ प्रकार के विवाह - २४ सवर्णा से विवाह में विशेषता - २५ कन्यादान देने वाले - ” कन्याहरण का दण्ड - २६ कन्या के दोष का गोपन - ” नियोग की विधि - २७ व्यभिचारिणी के लिए दण्ड - २८ स्त्रियों की पवित्रता - ” दूसरे विवाह के हेतु - २९

ऋतुकाल का समय ,, ( ६ ) स्नातकधर्मप्रकरण

( ३७ ) पतिव्रता की प्रशंसा ३० जीवनवृत्ति का चुनाव ५४ अधिवेत्ता के लिए दण्ड ,, श्रौतकर्म ५५ स्त्री के धर्म ,, यज्ञ के लिए हीनभिक्षा का निषेध ५६ शास्त्रानुसार दारसंग्रह का फल ३१ आर्थिक अवस्था का विचार ,, ऋतुकाल का समय ,, ( ६ ) स्नातकधर्मप्रकरण स्त्रीगमन के लिए निषिद्ध दिन ,, स्नातक के व्रत ५७ ऋतुकाल के अतिरिक्त स्त्रीगमन ३२ स्नातक का राजादि धन लेना ५८ स्त्रियों का आदर ३५ शारीरिक पवित्रता ५९ स्त्रियों के कर्तव्य ,, स्नातक के औपचारिक कर्म ६० प्रोषितपतिका का कर्तव्य ३६ दान लेने में दोष ६३ पतिहीना का कर्तव्य ३८ उपाकर्म का समय ,, अनेक पत्नियों में सहधर्मिणी ,, उत्सर्जन का समय ६४ पत्नी की मृत्यु पर दूसरा विवाह ३९ अनध्याय के अवसर ,, ( ४ ) वर्णजातिविवेकप्रकरण औपचारिक कर्तव्य ६७ सजातिपुत्र ,, धर्माचरण का आधार ६९ अनुलोमविवाह से उत्पन्न पुत्र ४० विवाद के परित्याग का फल ,, प्रतिलोमविवाह से उत्पन्न पुत्र ४१ स्नान का नियम ७० जाति के उत्कर्ष का नियम ४३ दूसरे की वस्तु के उपयोग का निषेध ,, ( ५ ) गृहस्थधर्मप्रकरण अभोज्य अन्न ,, स्मार्त और श्रौतकर्म की अग्नि ४४ अन्नग्रहण के नियम का अपवाद ७२ गृहस्थ के धर्म ,, ( ७ ) भक्ष्याभक्ष्यप्रकरण योगक्षेम के लिए राजाश्रय ४५ निषिद्ध अन्न ७२ वेद आदि का जप ४६ कतिपय बासी खाद्य वस्तुएँ ७३ पञ्चमहायज्ञ ,, अपेय दूध ७४ भोजन कराने का क्रम ४७ मांसभक्षण के लिए निषिद्ध पक्षी ७५ अतिथियों को भोजन कराने में प्याज आदि का निषेध ७७ वर्ण का विचार ४८ मांसभक्षण का अवसर ७८ वेदपाठी का सत्कार ४९ यज्ञ के अतिरिक्त पशुवध का फल ७९ मधुपर्क के पात्र ,, मांस न खाने का फल ,, सायंकालीन कर्तव्य ५१ ( ८ ) द्रव्यशुद्धिप्रकरण धर्म, अर्थ, काम का संतुलन ,, सोने के पात्रों की शुद्धि ८० मान्य व्यक्ति ५२ यज्ञिय पात्रों की शुद्धि ८१ मार्ग देने योग्य व्यक्ति ,, लेपयुक्त पात्रों की शुद्धि ,, द्विजातियों के कर्तव्य ,, वस्त्रों की सफाई ८२ शूद्र के कर्तव्य ५३ पृथ्वी की शुद्धि ८४ साधारण धर्म ५४ अन्न की शुद्धि ,,

( ३८ ) [बायाँ स्तम्भ] जल और मांस की शुद्धि का विचार ८७ पशुओं के मुख की शुद्धि-अशुद्धि ८८ मुख की शुद्धि ८९ आचमन के अवसर " ( ९ ) दानप्रकरण • ब्राह्मणों का महत्त्व ९० दान की वस्तुएँ ९१ दान के पात्र ९२ गोदान और उसका फल " उभयतोमुखी गोदान ९३ गोदान के तुल्य कर्म ९४ दान की अन्य वस्तुएँ " दान न लेने की प्रशंसा ९६ अयाचित वस्तु को स्वीकार करना " दाता के चरित्र का विचार ९७ वृत्तिनिर्वाह के लिए नियमापवाद " ( १० ) श्राद्धप्रकरण श्राद्ध का अर्थ ९७ पार्वणश्राद्ध का स्वरूप " श्राद्ध के ब्राह्मण ९८ श्राद्ध में वर्जित ब्राह्मण ९९ पार्वणश्राद्ध का प्रयोग १०१ अग्नौकरण १०६ ब्राह्मण भोजन की विधि १०८ पिण्डदान १०९ अक्षय्योदकदान ११० स्वधावाचन " ब्राह्मणप्रार्थना और विसर्जन १११ वृद्धिश्राद्ध ११२ एकोद्दिष्ट कर्म ११३ सपिण्डीकरण ११४ एकोद्दिष्ट का समय १२१ भोज्यवस्तुओं का विशिष्ट फल " श्राद्ध की तिथि के अनुसार फल १२३ नक्षत्र के अनुसार श्राद्ध का फल १२४ श्राद्ध के देवता १२५ [दायाँ स्तम्भ] ( ११ ) गणपतिकल्पप्रकरण विघ्न के कारक हेतु १२६ विघ्न के ज्ञापक हेतु १२७ विघ्न के प्रत्यक्ष लक्षण " विघ्न की शान्ति के लिए कर्म १२८ स्नपन की विधि " उपस्थान के मन्त्र १३२ ग्रहपूजा १३३ महागणपति की पूजा का फल १३४ ( १२ ) ग्रहशान्तिप्रकरण ग्रहयज्ञ १३४ नव ग्रहों के नाम १३५ ग्रहों की मूर्तियों की धातुएँ " ग्रहपूजा की विधि १३६ ग्रहपूजा के मन्त्र " ग्रहपूजा की समिधाएँ " नवग्रहों के भोजन १३७ ग्रहपूजा की दक्षिणा १३८ दुष्टग्रहों की पूजा " ( १३ ) राजधर्मप्रकरण • अभिषिक्त राजा का धर्म १३९ राजा का मन्त्री १४१ राजा का पुरोहित " राजा द्वारा ब्राह्मणों का सत्कार १४२ राजा का लक्ष्य " भूमिदान का लेख्यकरण १४३ लेख्यकरण की विधि " राजा का निवासस्थान १४४ विभागीय अध्यक्षों की नियुक्ति १४५ युद्ध में अपहृत धन का दान " युद्ध में वीरगति " युद्ध में अवध्य व्यक्ति १४६ राजा का दैनिक कार्यक्रम " राजा का विशेष व्यक्तियों से विशेष व्यवहार १४९ प्रजापालन का फल " पीडित प्रजा की रक्षा १५०

( ३६ ) धर्मपूर्वक कोश की वृद्धि १५१ दूसरे राष्ट्र की विजय का फल ,, पराजित देश की मर्यादा का पालन १५२ मन्त्रणा का गोपन ,, पड़ोसी राज्यों से सतर्कता १५३ साम दान आदि उपाय ,, सन्धि और विग्रह १५४ आक्रमण करने का समय ,, दैव और पौरुष ,, मित्र की प्राप्ति की श्रेष्ठता १५५ राज्य के अङ्ग १५५ दण्ड और धर्म ,, दण्डधारण की योग्यता ,, अनुचित दण्डप्रयोग का अधर्म १५७ शास्त्रानुसार दण्डप्रयोग का फल ,, अधर्मी स्वजन भी दण्ड्य ,, उचित दण्डप्रयोग का पुण्य १५८ त्रसरेणु, लिक्षा, राजसर्षप, गौरसर्षप, मध्यमयव, कृष्णल, माष, सुवर्ण और पल का परिमाण १५९ रूप्यमाष, धरण, पल, निष्क, कर्ष, पण १६० उत्तम, मध्यम, अधम साहस के लिए आर्थिक दण्ड की मात्रा १६१ दण्ड के प्रकार १६२ दण्डव्यवस्था के निमित्त ,, २. व्यवहाराध्यायः ( १ ) साधारणव्यवहारमातृका- प्रकरण व्यवहार के सभासदों की योग्यता १६४ राजा की अनुपस्थिति में धर्मज्ञ ब्राह्मण की नियुक्ति १६५ धर्मविरुद्ध सभासदों को दण्ड १६६ व्यवहार के विषय १६६ व्यवहार की कार्यवाही १६९ चार प्रकार का विवाद १७४ ( २ ) असाधारणव्यवहारमातृका- प्रकरण प्रत्यभियोग १७५ कलह और साहस के अपराध में अभियोग १७६ अभियोग को छिपाने पर दण्ड १७७ तात्कालिक निर्णय वाले वाद १७८ दुष्ट साक्षी के लक्षण १७९ साक्षियों का क्रम १८० सपणविवाद का निर्णय १८१ दो धर्मशास्त्रवचनों में विरोध की स्थिति १८३ लिखित, भुक्ति, साक्षी प्रमाण १८४ दूसरे का कब्जा होने पर अधिकार निर्णय १८६ इसका अपवाद १८९ लेख और भोग का विचार १९२ आगम या लेख का उपयोग १९३ व्यवहार देखने वाले अन्य व्यक्ति १९४ पुनर्विचार के योग्य व्यवहार १९५ असिद्धव्यवहार १९५ खोयी वस्तु के विषय में विचार १९७ चोरों से छीने गये धन १९९ ( ३ ) ऋणादानप्रकरण ब्याज की दर १९९ ऋण की वापसी २०२ ऋण भुगतान में जाति का विचार २०३ ऋण दिलवाने में राजा का अंश २०३ ऋण न लौटाने पर जाति के अनुसार कार्य २०४ ब्याज न लगने की स्थिति ,, ऋणी की मृत्यु पर ऋण भुगतान २०५ न लौटाये जाने वाले दूसरे के ऋण ,, स्त्रियों द्वारा लिया गया ऋण २०६ स्त्री द्वारा देय ऋण - पुत्र और पौत्र द्वारा देय ऋण २०७ प्रातिभाव्य का अर्थ २११

( ४० ) अनेक प्रतिभू द्वारा ऋण भुगतान २१३ | लेख्य के ऋण की वापसी की प्रतिभू द्वारा स्त्री का आदान-प्रदान २१४. | अवधि २३८ बन्धक रखी वस्तु के प्रणष्ट होने का | दूसरा लेख्य लिखने की स्थिति २३९ समय २१५ | सन्दिग्ध लेख्य की शुद्धि २४० ब्याज न देने की स्थितियाँ २१६ | ऋण भुगतान पर लेख्य २४१ आधिनाश पर दूसरी आधि की | ( ७ ) दिव्यप्रकरण व्यवस्था २१७ | दिव्य और उसके भेद २४२ बन्धक वापस न देने पर दण्ड २१९ | दिव्य के प्रयोग के पात्र और भोग्य आधि के विषय में विचार २२० | अवसर २४३ ( ४ ) उपनिधिप्रकरण | तुलादिव्य के लिए अयोग्य व्यक्ति २४५ उपनिधि की परिभाषा २२१ | तप्तकाल, विष, तुलादिव्य की उपनिधि लौटाने के नियम का | अवस्था २४७ अपवाद २२२ | तुलादिव्य के प्रयोग की विधि उपनिधि के भोग का दण्ड ” | और मंत्र २४८ ( ५ ) साक्षिप्रकरण | अग्निदिव्य के प्रयोग की विधि साक्षी के स्वरूप का निर्णय २२३ | और मन्त्र २५३ साक्षी के भेद और योग्यता २२४ | जलदिव्य के प्रयोग की विधि और साक्षी होने के अयोग्य व्यक्ति २२५ | मन्त्र २५६ साक्षी के विषय में नियम का | विषदिव्य की विधि और मन्त्र २५९ अपवाद २२६ | कोशविधि २६१ साक्षियों को उद्‌बोधन या उपदेश २२७ | तण्डुलविधि, तप्तमाषकविधि २६२ झूठे साक्षी के लिए दण्ड २२८ | धर्माधर्मविधि २६३ साक्षियों के वचनों में विरोध की | ( ८ ) दायविभागप्रकरण स्थिति २२९ | दायशब्द का अर्थ २६५ साक्षियों की सत्यता के विषय में | दाय के दो भेद २६९ विचार २३० | पिता द्वारा किया गया सम, विषम कूटसाक्षियों के दण्ड २३२ | विभाग २७० साक्षी का असत्य भाषण विहित | माता-पिता की मृत्यु के बाद विभाग होने की स्थिति २३४ | की विधि २७१ असत्य भाषण का प्रायश्चित्त २३५ | अविभाज्य धन २७३ ( ६ ) लेख्यप्रकरण | अविभाज्य धन के अपवाद २७६ लेख्य के दो प्रकार २३६ | पौत्र का अंश ” लेख्य में व्यक्ति और समय का | पितामह के धन में अंश २७६ विस्तृत लेखन ” | माता का अंश २७९ ऋणदाता और ऋणी साक्षियों और | असंस्कृत भाइयों के संस्कार का लेखक के हस्ताक्षर २३७ | दायित्व ” स्वयं लिखा गया लेख्य २३८ | अनेक वर्ण की कई पत्नियों के | पुत्रों का भाग २८१

( ४१ ) छिपा कर रखे हुए धन का विभाग २८३ | ( १० ) स्वामिपालविवादप्रकरण नियोगज पुत्र का भाग ,, | दूसरे का खेत चराने पर दण्ड ३१३ औरसपुत्र और पुत्रिकासुत २८५ | अधिक अपराध होने पर दूना दण्ड ३१४ गूढज और कानीन पुत्र ,, | चरवाहे और पशु के स्वामी को पौनर्भव और दत्तक पुत्र २८६ | दण्ड ३१५ क्रीत और कृत्रिम सहोढज पुत्र ,, | क्षेत्रविशेष के विषय में अपवाद ,, अपविद्ध पुत्र २८७ | पशुविशेष के संबन्ध में दण्ड का दासीपुत्र का अंश २८९ | अभाव ३१६ पुत्रहीन के धन का अधिकारी ,, | चरवाहे का पशुस्वामी के प्रति वाणप्रस्थ, यति, ब्रह्मचारी की | दायित्व ,, संपत्ति २९७ | पशुनाश पर चरवाहे को दण्ड ३१७ संसृष्टी को धन का विचार २९९ | चरागाह की व्यवस्था ,, विभाग में अंशप्राप्ति के लिए अयोग्य | चरागाह की भूमि और स्थान ३१८ व्यक्ति ३०० | ( ११ ) अस्वामिविक्रयप्रकरण इस नियम का अपवाद ,, | अस्वामिविक्रय का लक्षण ३१८ अयोग्य सदस्यों की स्त्रियों की | कममूल्य पर क्रय का निषेध ,, स्थिति ३०१ | खोई वस्तु देखने पर कर्तव्य ३१९ स्त्रीधन ,, | लेख्य और उपभोग द्वारा खोई स्त्रीधन का उत्तराधिकारी ३०२ | वस्तु ३२० वाग्दत्ता का धन, उसके हरण | स्वयं अपनी अपहृत वस्तु लेने पर का दण्ड ३०४ | दण्ड ३२१ पति द्वारा स्त्रीधन न लौटाने की | राजा को अर्पित खोई वस्तु का स्थिति ३०४ | निर्णय ,, दो पत्नियों में पहली पत्नी का | खोये हुए पशु की प्राप्ति पर राजा स्त्रीधन ३०५ | को देय धन ३२२ घर और खेत का विभाग ,, | ( १२ ) दत्ताप्रदानिकप्रकरण ( ६ ) सीमाविवादप्रकरण | दत्ताप्रदानिक का स्वरूप ,, सीमाविवाद का निर्णय ३०६ | दत्तानपाकर्म का स्वरूप ,, सीमानिर्णय के साधन ३०८ | चार प्रकार का दत्तानपाकर्म ,, ग्राम सामन्ता आदि ३०८ | दान कितना दें, क्या न दें ? ३२३ झूठे बोलने वाले सामन्तादि के | दान सबके सामने लेना चाहिए ,, दण्ड ३०९ | दत्तादत्त का स्वरूप ३२४ मर्यादा तोड़ने का दण्ड ३११ | अदत्त का प्रकार ,, खेत छीन लेने का दण्ड ,, | ( १३ ) क्रीतानुशयप्रकरण दूसरे के खेत में कूप, सेतु का | क्रीतानुशय ३२५ निर्माण ३१२ | क्रीतानुशय का स्वरूप ,, खेत की जोत की व्यवस्था ३१३ |

[Page Header] ( ४२ )


[बायाँ स्तम्भ]

प्रत्यर्पणीयनिर्णय ३२५ बीजा आदि खरीदने में परीक्षावधि ,, सोना, चाँदी, पीतल, शीशा, ताँबा, लोहा की परीक्षा ३२६ कम्बल और सूती कपड़े के वजन ,, कसीदाकारी आदि से वस्त्र के भार में कमी ३२७ द्रव्य के नाश होने पर निर्णय ,, (१४) अभ्युपेत्याशुश्रूषाप्रकरण अभ्युपेत्या शुश्रूषा का स्वरूप ३२७ पाँच प्रकार के शुश्रूषक ३२८ चार प्रकार के कर्मकर ,, दो प्रकार के कर्म ,, तीन प्रकार के भृतक ,, दासों के भेद ,, दासता से मुक्ति का समय ३२९ संन्यास से च्युत व्यक्ति राजा का दास ३३० दास अपने से निम्नवर्ण का होता है ,, अन्तेवासी का धर्म ,, (१५) संविद्व्यतिक्रमप्रकरण संविद्व्यतिक्रम का लक्षण ३३१ धर्म की रक्षा के लिए ब्राह्मण की स्थापना ,, सामयिक और राजा द्वारा निर्दिष्ट धर्म का पालन ३३२ गण के व्यक्तियों के अनुसरण का नियम ,, समूह के कार्य के लिए आये हुए व्यक्तियों का राजा द्वारा सत्कार ३३३ समूह के कार्य से प्रेषित व्यक्ति को प्राप्त धन ,, कार्यचिन्तकों के लक्षण ,, श्रेणी, नैगम, पाखण्डी, गण के विषय में नियम ३३४


[दायाँ स्तम्भ]

(१६) वेतनादानप्रकरण वेतनादान का स्वरूप ३३४ वेतन लेकर काम छोड़ने पर दण्ड ,, बिना वेतन लिए कार्य करना स्वीकार करके कार्य न करने पर दण्ड ३३४ भृत्यों को लाभांश (वोनस) का विधान ३३५ भृत्य के कार्य से हानि और लाभ तथा उसका वेतन ,, दो भृत्यों के एक कार्य करने पर वेतन ३३६ भार ढोने वाले भृत्य के विषय में निर्णय ,, मार्ग में कार्य छोड़ने वाले की मजदूरी ,, (१७) द्यूतसमाह्वयप्रकरण जुए की बाजी का स्वरूप ३३७ द्यूतसभा के अधिकारी का अंश ३३८ द्यूताधिकारी का कर्त्तव्य ,, राजा का सभिकों के प्रति कर्तव्य ,, जुए में हारजीत का निर्णय ३३९ कपटपूर्वक जुआ खेलने वाले का दण्ड ,, जुए के निषेध के लिए दण्ड ,, द्यूताध्यक्ष की नियुक्ति ,, प्राणिद्यूत का नियम ३४० (१८) वाक्पारुष्यप्रकरण वाक्पारुष्य का लक्षण ३४० वाक्पारुष्य के तीन प्रकार ,, निष्ठुर आक्रोश का दण्ड ,, गाली देने का दण्ड ३४१ गाली देने के दण्ड में वर्ग का विचार ,, वर्णों की प्रतिलोमता के आधार पर दोष लगाने का दण्ड ३४२

( ४३ )

बायाँ स्तम्भ (Left Column):

अंग तोड़ने की धमकी का दण्ड ३४३ धमकी के सम्बन्ध में शक्ति का विचार ,, तीव्र आक्रोश का दण्ड ,, दोष लगाने पर दण्ड का विधान ३४४ (१९) दण्डपारुष्यप्रकरण दण्डपारुष्य का स्वरूप ३४४ दण्डपारुष्य के तीन भेद और पाँच विधियाँ ,, दण्डपारुष्य के सन्दिग्ध स्वरूप का निर्णय ३४५ साधन के अनुसार दण्ड ,, वर्ण की प्रतिलोमता के अनुसार दण्ड ३४६ समान जाति वाले को मारने पर दण्ड ३४७ पैर, केश, वस्त्र, हाथ पकड़ कर खींचने का दण्ड ,, लकड़ी आदि से मारने का दंड ३४८ मारकर खून निकालने पर दंड ,, अंग तोड़ने पर दण्ड ,, कई व्यक्तियों द्वारा एक व्यक्ति के पीटे जाने पर दण्ड ३४९ दूसरे की दीवाल तोड़ने पर दण्ड ,, दूसरे के घर में काँटा, विष, सर्प छोड़ने पर दण्ड ३५० पशुओं को मारने पर दण्ड ,, वृक्षों को हानि पहुँचाने पर दंड ३५१ लताओं को हानि पहुँचाने पर दण्ड ,, (२०) साहसप्रकरण साहस का लक्षण ३५२ साहस के तीन प्रकार ,, प्रथम, मध्यम और उत्तम साहस ,, दूसरे का धन लेने पर दण्ड ३५३ अपराध कराने वाले का दण्ड ,, विशेष प्रकार के साहसिक ,,


दायाँ स्तम्भ (Right Column):

बिना नियोग के विधवा संभोग, भयात्तुर की रक्षा के लिए न दौड़ने, उच्च वर्णों के स्पर्शवर्ण के अयोग्य कर्म करने वाले, झूठी शपथ लेने, पशुओं को बधिया करने, दासी का गर्भपात, निर्दोष सम्बन्धी का त्याग करने का दण्ड ३५४ धोबी के विषय में दण्डव्यवस्था ३५५ पिता और पुत्र के कलह में साक्षी के लिए दण्ड ,, तौलने आदि में धूर्तता का दण्ड ३५६ खोटा सिक्का चलाने वाले का दण्ड ,, अल्पज्ञानी वैद्य का दण्ड ,, बन्धन के अयोग्य व्यक्ति का दण्ड ३५७ नापने, तौलने में बेईमानी करने का दण्ड ,, मिलावट करने पर दण्ड ,, घटिया वस्तु अधिक मूल्य पर विक्रय का दण्ड ३५८ ठगी और बनावटी कस्तूरी बेचने का दण्ड ,, शिल्पियों को पीड़ित करने वाले व्यापारियों को दण्ड ३५९ आयातित वस्तु को अनिश्चित मूल्य पर बेचने का दण्ड ,, राजा द्वारा मूल्य का निर्धारण ,, विक्रय में लाभ का अंश ३६० मूल्य के निर्धारण का आधार ,, (२१) विक्रीयासंप्रदानप्रकरण विक्रीयासंप्रदान का स्वरूप ३६० विक्रीयासंप्रदान के दो भेद ,, मूल्य लेकर सौदा न देने वाले का दण्ड ३६१ क्रेता के सौदा न लेने पर दूसरे के हाथ विक्रय ,,