भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 782 में से

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पृष्ठ 36

( ३० ) मन्वत्रिविष्णुहारीत याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः । यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥ पराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ । शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः ॥ १. ३-५॥ आन्वीक्षिकी अर्थात् दर्शनशास्त्र एवं दण्डनीति का उल्लेख भी हुआ है— श्वरन्ध्रगोप्ताऽऽन्वीक्षिक्यां दण्डनीत्यां तथैव च। विनीतस्त्वथ वार्तायां त्रय्यां चैव नराधिपः ॥ १. ३११॥ सूत्रों, स्मृतियों, धर्मशास्त्रों का नामतः उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु सामा- न्यतः इनकी चर्चा याज्ञवल्क्यस्मृति में मिलती है। याज्ञवल्क्यस्मृति में शुक्लयजुर्वेद की वाजसनेयी-संहिता के अनेक मन्त्रों का उल्लेख है और विवेचित विषयों की दृष्टि से पारस्करगृह्यसूत्र से भी इसका संबन्ध है। पो० काणे के अनुसार "स्मृति के कुछ अंश बृहदारण्यकोपनिषद् के केवल अन्वय मात्र हैं।" इस प्रकार याज्ञवल्क्यस्मृति का संबन्ध याज्ञवल्क्य के नाम से ख्यात रचनाओं के साथ तथा शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा के साथ भी दिखाई पड़ता है। गरुडपुराण और अग्निपुराण में याज्ञवल्क्यस्मृति के समान बहुत सी बातें उपलब्ध होती हैं। शंखलिखितधर्मसूत्र में भी याज्ञवल्क्य का उल्लेख है। विद्वानों का विचार है कि याज्ञवल्क्यस्मृति का मुख्य स्मृतिभाग ७०० ई० से अपरिवर्तित चला आ रहा है।¹ याज्ञवल्क्यस्मृति का समय— याज्ञवल्क्यस्मृति के समय के विषय में वेबेर का मत है : "इस रचना के लिए प्राचीनतम सीमा दूसरी शताब्दी ई० के आसपास की मानी जा सकती है, कारण, इसमें मुद्रा के अर्थ में नानक शब्द का प्रयोग है और जैसा कि विल्सन ने अनुमान किया है यह शब्द कनेर्कि के सिक्कों से लिया गया है, जिसने ४० ई० में शासन किया था। दूसरी ओर इस समय की निचली सीमा छठीं या सातवीं शताब्दी रखी जा सकती है, कारण, विल्सन के अनुसार इस स्मृति के अंशों को भारत के अनेक भागों में शिलालेखों में उद्धृत किया गया है।² याकोबी ने याज्ञवल्क्यस्मृति का समय बारह ग्रहों की संख्या के आधार पर चतुर्थ शताब्दी ई० के बाद माना है।³ प्रो० काणे ने याज्ञवल्क्यस्मृति के समय के विषय में जो निष्कर्ष निकाले हैं उनके अनुसार इस स्मृति के समय की निचली सीमा नवीं शताब्दी के बाद की नहीं हो सकती। कारण— २. काणे, वही, पृ० ५१ । १. भारतीय साहित्य, अनु० उमेशचन्द्र पाण्डेय, पृ० २७८ । ३. वही, पृ० २७८, टिप्पणी २ ।

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