याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१ टीकाकार विश्वरूप नवीं शताब्दी के हैं। २. विश्वरूप ने अपने पहले के कई भाष्यकारों का उल्लेख किया है, जिन्होंने याज्ञवल्क्यस्मृति पर टीकायें लिखी हैं। ३. शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र के भाष्य में याज्ञवल्क्यस्मृति ३. २२६ का निर्देश किया है। अतः 'याज्ञवल्क्यस्मृति को हम ई० पू० पहली शताब्दी तथा ईसा के बाद की तीसरी शताब्दी के बीच कहीं रख सकते हैं।'१ वर्णित विषय— याज्ञवल्क्यस्मृति का आरम्भ मुनियों के प्रश्न से होता है। योगीश्वर याज्ञवल्क्य मिथिला को सुशोभित कर रहे थे। मुनियों ने उनकी पूजा की और कहा कि आप वर्णों, आश्रमों और दूसरे (अनुलोम, प्रतिलोम, संकर जातियों) का धर्म हमें पूरी तरह से समझाइये। योगीश्वरं याज्ञवल्क्यं संपूज्य मुनयोऽब्रुवन् । वर्णाश्रमेतराणां नो ब्रूहि धर्मानशेषतः ॥ १।१॥ और तब याज्ञवल्क्य उस देश में किये जाने वाले धर्म का प्रतिपादन करते हैं, जिस देश में काले मृग स्वच्छन्द विचरण करते हैं। यस्मिन् देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्धर्मान्निबोधत ॥ इस उपक्रम के बाद याज्ञवल्क्यस्मृति आरम्भ होती है, और बीच-बीच में पृच्छालु मुनिगण शंका करते हैं जिनका समाधान याज्ञवल्क्य करते चलते हैं। यह स्मृति लगभग समान विस्तार के तीन अध्यायों में विभक्त है। संक्षेप में इस स्मृति में वर्णित विषयों को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है— आचाराध्याय—चौदह विद्याएं, एवं धर्म के उपादान। संस्कार-जन्म से विवाह तक। उपनयन और उसका समय। ब्रह्मचारी के कर्त्तव्य एवं निषिद्ध कर्म। विवाह, विवाह की योग्यता, सपिण्ड संबन्ध का नियम। अन्तर्जातीय विवाह, आठ प्रकार के विवाह। क्षेत्रज पुत्र और पुनर्विवाह। गृहस्थ के कर्त्तव्य। पंच महायज्ञ, अतिथि सत्कार, मधुपर्क। चारों वर्णों के कर्त्तव्य। आचार के दस सिद्धान्त, गृहस्थ की जीवनवृत्ति। स्नातक के कर्त्तव्य। अनध्याय, भक्ष्याभक्ष्य का नियम, पवित्रीकरण के नियम। दान के नियम, पात्र एवं वस्तुएँ। श्राद्ध के नियम, इसका समय, श्राद्ध में बुलाने जाने योग्य ब्राह्मण, श्राद्ध की विधि एवं दक्षिणा। ग्रह शान्ति। राजधर्म और दण्ड। व्यवहाराध्याय—न्याय करने वाले व्यक्ति, न्याय करने वाली परिषद् के सदस्य। जमानत, ब्याज की दर, ऋण, बन्धक के प्रकार। साक्षी की पात्रता, शपथ, लेखप्रमाण। दिव्य। धन का विभाजन, स्त्री का भाग, पुत्रों के प्रकार और १. काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, अनु० आचार्य काश्यप, पृ० ५३।